अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) क्यों लगता है? जानिए इसका ज्योतिषीय एवं धार्मिक रहस्य
सनातन धर्म में जब भी अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास आता है, तब लोगों के मन में यह जिज्ञासा अवश्य होती है कि आखिर यह अतिरिक्त मास क्यों आता है?
क्या इसका कोई खगोलीय कारण है या केवल धार्मिक मान्यता?
वास्तव में अधिक मास का आधार पूर्णतः ज्योतिषीय एवं खगोलीय गणना पर आधारित है।
सिद्धांत ज्योतिष में सूर्य एवं चन्द्रमा की गति के अंतर के कारण ही अधिक मास की उत्पत्ति मानी गई है।
सौर मास और चन्द्र मास क्या होते हैं?
सौर मास
सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक का समय सौर मास कहलाता है।
अर्थात जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहते हैं।
मध्यम मान के अनुसार —
एक सौर मास में लगभग
30 दिन, 10 घंटे और 30 मिनट होते हैं।
चन्द्र मास
एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक का समय चन्द्र मास कहलाता है।
मध्यम मान के अनुसार —
एक चन्द्र मास में लगभग
29 दिन, 13 घंटे और 44 मिनट होते हैं।
सौर मास और चन्द्र मास का अंतर
यदि दोनों की तुलना करें तो —
सौर मास और चन्द्र मास में लगभग
20 घंटे 46 मिनट का अंतर होता है।
यह अंतर प्रत्येक महीने बढ़ता रहता है।
सिद्धांत ज्योतिष के अनुसार जब यह अंतर इतना अधिक हो जाता है कि एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच सूर्य की कोई संक्रांति नहीं पड़ती, तब वह चन्द्र मास अधिक मास कहलाता है।
इसी को सामान्य भाषा में मलमास भी कहा जाता है।
अधिक मास को मलमास क्यों कहा गया?
सौर और चन्द्र मासों की इस विसंगति के कारण उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त मास को प्राचीन काल में “मलमास” कहा गया।
क्योंकि यह सामान्य गणना से अतिरिक्त एवं असंतुलित माना जाता था।
इसी कारण इस मास में —
❌ विवाह
❌ गृह प्रवेश
❌ मुंडन
❌ यज्ञोपवीत
❌ नए शुभ कार्य
आदि वर्जित माने गए हैं।
पुरुषोत्तम मास नाम कैसे पड़ा?
पुराणों के अनुसार जब इस अतिरिक्त मास को कोई देवता स्वीकार नहीं कर रहे थे, तब यह मास भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में गया।
भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और कहा कि —
“यह मास अब मेरा प्रिय मास होगा और इसमें जप, तप, दान, भक्ति एवं धर्म कार्य करने वालों को विशेष पुण्य प्राप्त होगा।”
तभी से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।
पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?
✅ भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण की पूजा
✅ गीता एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ
✅ दान-पुण्य एवं सेवा
✅ मंत्र जाप एवं ध्यान
✅ सत्संग एवं भजन-कीर्तन
इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल अक्षय माना गया है।
निष्कर्ष
अधिक मास केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह सूर्य और चन्द्रमा की गति के वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय अंतर का परिणाम है।
सनातन धर्म ने इस खगोलीय व्यवस्था को आध्यात्मिक साधना से जोड़कर इसे पुरुषोत्तम मास का दिव्य स्वरूप प्रदान किया है।
“हरि स्मरण, हरि आराधन — पुरुषोत्तम मास में जीवन बने पावन।”
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
🔹 जन्म कुंडली विश्लेषण
🔹 वास्तु परामर्श
🔹 वैदिक पूजा एवं अनुष्ठान
🔹 ग्रह शांति एवं विशेष उपाय
📞 मोबाइल: 08574763197
📍 पता: योगेन्द्र विहार खाड़ेपुर, नौबस्ता कानपुर नगर-21
ज्योतिष मार्गदर्शन • अनुष्ठान सेवा • समाधान आपका, संकल्प हमारा

No comments:
Post a Comment