Monday, May 18, 2026

पुरुषोत्तम मास : भक्ति, पुण्य और आत्मशुद्धि का दिव्य अवसर purushottam mas

पुरुषोत्तम मास : भक्ति, पुण्य और आत्मशुद्धि का दिव्य अवसर 



सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व बताया गया है। इसे अधिक मास,मलमास भी कहा जाता है। यह मास भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित माना जाता है और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पुण्यदायी होता है। मान्यता है कि इस पवित्र मास में किए गए जप, तप, दान, पूजा और सेवा का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है।
पुराणों के अनुसार जब अन्य महीनों ने इस अतिरिक्त मास को स्वीकार नहीं किया, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” का सम्मान प्रदान किया। तभी से यह माह विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।


पुरुषोत्तम मास का महत्व

पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और सकारात्मक परिवर्तन का अवसर भी है।
इस महीने में व्यक्ति अपने जीवन के दोषों को दूर कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।

इस पावन मास में —
✅ पापों का क्षय होता है।
✅ मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
✅ परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है।
✅ भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए 

1️⃣ भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण की पूजा करें

प्रतिदिन भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या श्रीराम का पूजन करें। तुलसी अर्पित करें और दीप जलाएं।

2️⃣ मंत्र जाप करें

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का नियमित जाप अत्यंत शुभ माना गया है।

3️⃣ धार्मिक ग्रंथों का पाठ

गीता, विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भागवत कथा एवं रामचरितमानस का पाठ करें या सुनें।

4️⃣ दान-पुण्य करें

अन्नदान, 

वस्त्रदान, 

गौसेवा, 

जलसेवा एवं 

दीपदान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

5️⃣ व्रत एवं सात्विक जीवन अपनाएं

इस माह में सात्विक भोजन करें और मन, वचन एवं कर्म की शुद्धता बनाए रखें।

6️⃣ सेवा एवं सत्संग करें

जरूरतमंदों की सहायता करें और भजन-कीर्तन एवं सत्संग में भाग लें।


पुरुषोत्तम मास में क्या नहीं करना चाहिए 

❌ मांस, मदिरा एवं तामसिक भोजन का सेवन न करें।
❌ क्रोध, झूठ, चुगली एवं अपशब्दों से बचें।
❌ किसी का अपमान या दिल दुखाने वाले कार्य न करें।
❌ लोभ, अहंकार एवं अनैतिक कार्यों से दूर रहें।
❌ व्यर्थ विवाद और नकारात्मक विचारों से बचें।
❌ आलस्य एवं समय की बर्बादी न करें।


पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक संदेश

यह मास हमें सिखाता है कि जीवन में भक्ति, सेवा, संयम और सदाचार का कितना महत्व है।
यदि व्यक्ति इस माह में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान की आराधना करता है, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आते हैं।

“हरि स्मरण, हरि आराधन — पुरुषोत्तम मास में जीवन बने पावन।” 




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आजकल के ज्योतिषीय उपाय : एक गंभीर चिंतन Astrological Remedies of Today: A Contemplation

 

आजकल के ज्योतिषीय उपाय : एक गंभीर चिंतन

Astrological Remedies of Today: A Contemplation



आज के समय में यूट्यूब, सोशल मीडिया और विभिन्न डिजिटल मंचों पर ज्योतिषीय उपायों की बाढ़-सी आ गई है।
हर दिन हमें ऐसे अनेक वीडियो, पोस्ट और विज्ञापन देखने को मिलते हैं जिनमें “गारंटीड उपाय”, “100% सफलता”, “24 घंटे में चमत्कार”, “सिर्फ अमीर लोग करते हैं यह उपाय” जैसी बातें कही जाती हैं।

कुछ लोग तो उपायों के परिणाम की सौ, दो सौ या पाँच सौ प्रतिशत तक गारंटी देने लगते हैं।
कहीं कहा जाता है कि “यह वस्तु घर में रख दीजिए और धन वर्षा शुरू हो जाएगी”, तो कहीं “यह छोटा-सा टोटका आपकी किस्मत बदल देगा” जैसी बातें सुनने को मिलती हैं।

प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ज्योतिष का उद्देश्य यही है?
क्या केवल कुछ वस्तुएँ, कुछ अनुष्ठान या कुछ प्रतीकात्मक क्रियाएँ बिना कर्म और प्रयास के जीवन को बदल सकती हैं?

यह विषय केवल आलोचना का नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन का है।


ज्योतिष का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

भारतीय परंपरा में ज्योतिष को “वेदचक्षु” कहा गया है — अर्थात् वह ज्ञान जो जीवन की दिशा देखने और समझने में सहायता करे।

ज्योतिष का उद्देश्य व्यक्ति को निष्क्रिय बनाना नहीं, बल्कि उसे सही समय, सही दिशा और सही निर्णय का बोध कराना है।

जब मनुष्य जीवन में ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ—

  • पर्याप्त प्रयासों के बाद भी मार्ग स्पष्ट नहीं होता,
  • मन भ्रमित हो जाता है,
  • परिस्थितियाँ प्रतिकूल लगने लगती हैं,
  • और व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है,

तब ज्योतिष उसे परिस्थिति का विश्लेषण और मार्गदर्शन प्रदान करता है।

यह हमें बताता है कि—

  • कौन-सा समय धैर्य रखने का है,
  • कब अधिक प्रयास आवश्यक है,
  • किन क्षेत्रों में सावधानी रखनी चाहिए,
  • और किन मानसिक प्रवृत्तियों को सुधारने की आवश्यकता है।

अर्थात् ज्योतिष दिशा देता है, लेकिन चलना मनुष्य को स्वयं पड़ता है।


क्या उपाय वास्तव में कार्य करते हैं?

यह प्रश्न स्वाभाविक है।
उत्तर है — हाँ, उपाय कार्य कर सकते हैं, लेकिन उनका स्वरूप और उद्देश्य समझना आवश्यक है।

उपायों का प्रभाव मुख्यतः तीन स्तरों पर होता है:

1. मानसिक स्तर

मंत्र, जप, पूजा, ध्यान और साधना मन को स्थिर करते हैं।
भय, तनाव और नकारात्मकता कम होने लगती है।
जब मन संतुलित होता है, तब व्यक्ति बेहतर निर्णय लेने में सक्षम होता है।

2. आध्यात्मिक स्तर

उपाय व्यक्ति में श्रद्धा, विनम्रता, धैर्य और आत्मविश्वास विकसित करते हैं।
वे हमें यह अनुभव कराते हैं कि जीवन केवल भौतिक प्रयासों तक सीमित नहीं है।

3. कर्म और व्यवहार स्तर

दान, सेवा, संयम, अनुशासन और सदाचार जैसे उपाय व्यक्ति के व्यवहार को परिष्कृत करते हैं।
यही परिवर्तन अंततः जीवन में सकारात्मक परिणाम लाते हैं।


समस्या कहाँ उत्पन्न हो रही है?

समस्या तब शुरू होती है जब उपायों को कर्म का विकल्प बना दिया जाता है।

आजकल अनेक स्थानों पर ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि—

  • मेहनत की आवश्यकता नहीं,
  • आत्मचिंतन की आवश्यकता नहीं,
  • केवल विशेष अनुष्ठान या वस्तु ही सब बदल देगी।

यह दृष्टिकोण व्यक्ति को धीरे-धीरे निष्क्रिय बना देता है।

यदि कोई छात्र पढ़ाई छोड़कर केवल उपायों पर निर्भर हो जाए, तो क्या वह सफल हो सकता है?
यदि कोई रोगी चिकित्सा छोड़कर केवल टोटकों पर विश्वास करे, तो क्या यह उचित होगा?

भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है—

“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”

अर्थात् कार्य केवल कल्पना या इच्छा से नहीं, बल्कि प्रयास से सिद्ध होते हैं।


“गारंटी वाले उपाय” कितने उचित?

जीवन अनेक कारकों से प्रभावित होता है—

  • कर्म,
  • परिस्थिति,
  • शिक्षा,
  • मानसिकता,
  • स्वास्थ्य,
  • परिवार,
  • समाज,
  • और समय।

ऐसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति यदि जीवन की जटिल समस्याओं के लिए “100% गारंटी” देने लगे, तो यह अत्यधिक सरलीकरण है।

ज्योतिष संभावनाओं और प्रवृत्तियों का विज्ञान है, पूर्ण नियंत्रण का दावा नहीं।

इसलिए एक जागरूक व्यक्ति को ऐसे दावों से सावधान रहना चाहिए जो भय, लालच या चमत्कार के आधार पर निर्णय करवाना चाहते हों।


उपाय कब और कैसे किए जाने चाहिए?

उपायों का प्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से होना चाहिए।

उपाय तब सार्थक होते हैं जब—

  • वे व्यक्ति को मानसिक शक्ति दें,
  • आत्मविश्वास बढ़ाएँ,
  • सकारात्मक कर्म के लिए प्रेरित करें,
  • और जीवन में अनुशासन तथा संतुलन लाएँ।

सच्चा उपाय वह है जो व्यक्ति को जागरूक बनाए, आश्रित नहीं।


आने वाले समय की चुनौती

यदि ज्योतिष केवल चमत्कार बेचने का माध्यम बन गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ उसके वास्तविक ज्ञान और गहराई को भूल जाएँगी।

तब दो स्थितियाँ उत्पन्न होंगी—

  1. लोग अंधविश्वास में फँसेंगे,
  2. या पूरी ज्योतिष परंपरा को ही अस्वीकार कर देंगे।

दोनों ही स्थितियाँ दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

इसलिए आवश्यकता है कि—

  • ज्योतिष को जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत किया जाए,
  • भय नहीं, विवेक दिया जाए,
  • उपायों के साथ कर्म का महत्व समझाया जाए,
  • और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाया जाए।

निष्कर्ष

ज्योतिष का उद्देश्य मनुष्य को भाग्यवाद में डुबाना नहीं, बल्कि जीवन के प्रति जागरूक बनाना है।

उपाय तभी सार्थक हैं जब वे—

  • मन को स्थिर करें,
  • जीवन में सकारात्मकता लाएँ,
  • और व्यक्ति को श्रेष्ठ कर्म की ओर प्रेरित करें।

ईश्वर भी उसी की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करने का साहस रखता है।

इसलिए आवश्यकता चमत्कार खोजने की नहीं, बल्कि सही दिशा, सही चिंतन और सही कर्म की है।
तभी ज्योतिष और कर्मकांड वास्तव में मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।।


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Saturday, May 16, 2026

दक्षिणा : केवल धन नहीं, समाज की श्रद्धा का दर्पण Dakshina: Not just money, it is a mirror of society's faith

 

दक्षिणा : केवल धन नहीं, समाज की श्रद्धा का दर्पण

Dakshina: Not just money, it is a mirror of society's faith



आज समाज में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है।
जब किसी घर में विवाह, यज्ञोपवीत, गृहप्रवेश या अन्य धार्मिक आयोजन होता है, तब लोग सजावट, भोजन, होटल, फोटोग्राफी और मनोरंजन पर लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। हर व्यवस्था में उत्साह और सम्मान दिखाई देता है।

लेकिन जब बात आचार्य की दक्षिणा की आती है, तब अक्सर लोग संकोच करने लगते हैं। कई बार तो स्थिति ऐसी होती है कि पूरे आयोजन का सबसे कम महत्व उसी व्यक्ति को मिलता है, जिसने वैदिक मंत्रों और संस्कारों के माध्यम से उस अनुष्ठान को पूर्ण किया।

यह केवल आर्थिक विषय नहीं है। यह समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है।


दक्षिणा वास्तव में क्या है?

बहुत से लोग दक्षिणा को केवल “पंडित जी की फीस” समझते हैं।
लेकिन सनातन परंपरा में दक्षिणा का अर्थ केवल धन देना नहीं है।

दक्षिणा है—

  • श्रद्धा,
  • कृतज्ञता,
  • गुरु सम्मान,
  • और विद्या के प्रति आदर।

जब कोई आचार्य वेद-मंत्रों के साथ विवाह, यज्ञोपवीत, कथा या अन्य संस्कार सम्पन्न करता है, तब वह केवल कुछ धार्मिक क्रियाएँ नहीं कर रहा होता, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी वैदिक परंपरा को जीवित रख रहा होता है।

इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि बिना श्रद्धा और दक्षिणा के यज्ञ और संस्कार पूर्ण नहीं माने जाते।


समाज में यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?

1. धर्म अब संस्कार से अधिक आयोजन बनता जा रहा है

आज बहुत से लोगों के लिए धार्मिक कार्यक्रम आध्यात्मिक संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रदर्शन बनते जा रहे हैं।

इसलिए लोगों का ध्यान अधिकतर उन चीज़ों पर होता है जो दिखाई दें—

  • सजावट,
  • मंच,
  • भोजन,
  • कपड़े,
  • वीडियो और फोटो।

लेकिन मंत्रों की शक्ति, विधि की पवित्रता और संस्कारों का आध्यात्मिक प्रभाव दिखाई नहीं देता।
इसी कारण उनका महत्व भी कम समझा जाने लगा।


2. आचार्य के तप और अध्ययन को लोग समझ नहीं पाते

एक योग्य आचार्य बनने के पीछे वर्षों का—

  • वेद अध्ययन,
  • संस्कृत ज्ञान,
  • साधना,
  • उच्चारण अभ्यास,
  • और नियमबद्ध जीवन

होता है।

लेकिन समाज केवल पूजा के कुछ घंटे देखता है, उसके पीछे का जीवनभर का तप नहीं।




3. दिखावे की संस्कृति बढ़ गई है

आज समाज उसी चीज़ का मूल्य अधिक समझता है जो उसे तुरंत दिखाई दे।

इसलिए—

  • बैंड वालों का भुगतान तय होता है,
  • फोटोग्राफर का पैकेज तय होता है,
  • सजावट का बजट तय होता है।

लेकिन आचार्य सम्मान को कई बार “जो उचित लगे” पर छोड़ दिया जाता है।

यह स्थिति समाज की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है।


4. धार्मिक शिक्षा का अभाव

नई पीढ़ी को यह समझाया ही नहीं गया कि दक्षिणा केवल पैसा नहीं, बल्कि गुरु और विद्या के प्रति सम्मान की परंपरा है।

जब ज्ञान कम होगा, तो श्रद्धा भी धीरे-धीरे कम होने लगेगी।


एक विचारणीय स्थिति

आज कई स्थानों पर नाई, माली, बैंड वाले या अन्य सेवाकारों को—

  • न्योछावर,
  • उपहार,
  • अतिरिक्त राशि

सम्मानपूर्वक दी जाती है।

उनका सम्मान होना चाहिए, क्योंकि हर कार्य सम्माननीय है।
लेकिन प्रश्न यह है कि—

क्या संस्कार सम्पन्न कराने वाले आचार्य का सम्मान भी उसी गंभीरता से हो रहा है?

यदि पूरे आयोजन की आत्मा वैदिक संस्कार हैं, तो उनके प्रतिनिधि आचार्य का सम्मान सबसे अंत में क्यों रह जाता है?


दक्षिणा का उचित मानक क्या होना चाहिए?

शास्त्रों में दक्षिणा का कोई निश्चित “रेट” नहीं बताया गया, क्योंकि यह श्रद्धा और सामर्थ्य का विषय है।

फिर भी वर्तमान समय में एक संतुलित दृष्टि यह हो सकती है कि—

किसी भी धार्मिक आयोजन के कुल बजट का लगभग 5% से 15% भाग आचार्य सम्मान और धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए होना चाहिए।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात राशि नहीं, भावना है।

शास्त्र कहते हैं—

“श्रद्धया देयम्।”

अर्थात श्रद्धा से दिया जाए।


इस स्थिति में सुधार कैसे हो?

1. दक्षिणा को “फीस” नहीं, “आचार्य सम्मान” कहा जाए

भाषा बदलने से भावना बदलती है।


2. समाज को संस्कारों का अर्थ समझाया जाए

जब लोग समझेंगे कि मंत्र और संस्कार केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का आध्यात्मिक आधार हैं, तब सम्मान भी बढ़ेगा।


3. आचार्य वर्ग भी गरिमामय संतुलन रखे

आचार्य को अत्यधिक व्यवहारिक भी नहीं होना चाहिए और इतना संकोची भी नहीं कि समाज उसे हल्के में लेने लगे।

गरिमा, स्पष्टता और विद्वता—इन तीनों का संतुलन आवश्यक है।


4. नई पीढ़ी को शिक्षित करना होगा

यदि बच्चों को गुरु, विद्या और संस्कार का सम्मान नहीं सिखाया जाएगा, तो आने वाले समय में धर्म केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।


वास्तविक चिंता क्या है?

समस्या केवल कम दक्षिणा की नहीं है।
वास्तविक चिंता यह है कि समाज धीरे-धीरे—

  • गुरु,
  • विद्या,
  • संस्कार,
  • और धर्म की गहराई

से दूर होता जा रहा है।

यदि विद्या का सम्मान कम होगा, तो भविष्य में योग्य आचार्य भी कम होते जाएँगे।
और तब संस्कार केवल बाहरी आयोजन बनकर रह जाएँगे।


निष्कर्ष

दक्षिणा केवल धन नहीं है।
यह समाज की श्रद्धा का दर्पण है।

सजावट किसी आयोजन को भव्य बना सकती है,
लेकिन संस्कारों को पवित्र बनाने का कार्य केवल मंत्र, विद्या और श्रद्धा ही करती है।

इसलिए दक्षिणा को खर्च नहीं,
बल्कि धर्म, गुरु और संस्कृति के प्रति सम्मान के रूप में देखना चाहिए।

क्योंकि जिस समाज में आचार्य और विद्या का सम्मान बना रहता है,
वही समाज अपनी संस्कृति और आत्मा को सुरक्षित रख पाता है।

Releted topic:-रामरक्षास्तोत्रम् ramraksha stotra

Sunday, May 10, 2026

Mother's Day: Mother and Nature – Two Divine Forces of Life

मातृ दिवस : माँ और प्रकृति — जीवन की दो दिव्य शक्तियाँ



भारतीय संस्कृति में “माता” को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि वह प्रेम, त्याग, संस्कार और संरक्षण का प्रतीक होती है। इसी प्रकार हमारी प्रकृति भी संपूर्ण सृष्टि की पालनकर्ता माता है, जो बिना किसी स्वार्थ के हमें अन्न, जल, वायु और जीवन प्रदान करती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के आरंभ में आदिशक्ति ने प्रकृति का रूप धारण कर संसार की रचना की। धरती माँ ने अन्न दिया, नदियों ने जीवनदायिनी जलधारा दी और वृक्षों ने प्राणवायु देकर जीवों का पालन किया। ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को “जगत जननी” कहा, क्योंकि उसी की गोद में सम्पूर्ण जीवन फलता-फूलता है।

जिस प्रकार प्रकृति हमें हर परिस्थिति में संभालती है, उसी प्रकार हमारी जन्मदात्री माँ भी अपने प्रेम और त्याग से हमारे जीवन को दिशा देती है। माँ अपने बच्चों के सुख के लिए हर कठिनाई सह लेती है और प्रकृति भी बिना किसी भेदभाव के सभी का पालन करती रहती है। इसलिए भारतीय परंपरा में माँ और प्रकृति दोनों को पूजनीय माना गया है।

आज आधुनिक जीवन में मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। वृक्षों की कटाई, जल का दुरुपयोग और पर्यावरण प्रदूषण प्रकृति माता को आहत कर रहे हैं। जैसे हम अपनी माँ का सम्मान करते हैं, वैसे ही प्रकृति की रक्षा करना भी हमारा कर्तव्य है।

इस मातृ दिवस पर केवल अपनी माँ को उपहार देने तक सीमित न रहें, बल्कि प्रकृति माता के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करें। एक पौधा लगाएँ, जल संरक्षण करें और पर्यावरण को स्वच्छ रखने का संकल्प लें। यही माँ और प्रकृति — दोनों के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

माँ का आशीर्वाद और प्रकृति का संरक्षण — यही सुख, शांति और समृद्ध जीवन का आधार है।

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Sunday, March 8, 2026

रामरक्षास्तोत्रम् ramraksha stotra

रामरक्षास्तोत्रम्



विनियोगः-


अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचन्द्रो देवता। अनुष्टुप् छन्दः। सीता शक्तिः। श्रीमान् हनुमान् कीलकं। श्री सीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोत्रजपे विनियोगः।


जल को धरती पर छोड़कर भगवान राम का ध्यान करें


ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं,
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
 

वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं,
नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ।।

श्रीरामरक्षा स्तोत्र पाठ

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् । 
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।। 1।।


ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
 जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ।।2।।


सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।3।।


रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। 
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।। 4।।


कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।।5।।


जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। 
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ।।6।।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्। 
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।7।।


सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
 ऊरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ।।8।।


जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः।
 पादौ विभीषणश्रीद:पातु रामोऽखिलं वपुः।।9।।


एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
 स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ।।10।।

पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः।
 न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।11।।


रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
 नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।12।।


जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
 यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।13।।


वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। 
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।।14।।


आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
 तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।।15।।


आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ।।16।।

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ। 
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ।।17।।


फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। 
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।।18।।


शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। 
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ।।19।


आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा-
वक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
 रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा-
वग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ।।20।।


सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। 
गच्छन् मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः।।21।।


रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। 
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ।।22।।


वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः। 
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः।।23।।


इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः। 
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः।।24।।


रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्। 
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरा:।।25।।


रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं 
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
 वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्।।26।।


रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। 
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ।।27।।


श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।श्रीराम राम शरणं भव राम राम।।28।।


श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
 श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
 श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
 श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ।।29।।


माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ।।30।।


दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा। 
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ।।31।।


लोकाभिरामं रणरंगधीरं

राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
 
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
 
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ।।32।।


मनोजवं मारुततुल्यवेगं
 
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
 
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
 
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ।।33।।


कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
 
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ।।34।।


आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। 
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।35।।


भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्।
 तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ।।36।।


रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे 
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् 
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर।।37।।


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। 
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ।।38।।


।।इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌।।


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