विशेष मुहूर्त विचार : ज्वालामुखी योग, बिछुड़ा चन्द्र एवं धावड़ योग
vishesh muhurt vichar : jwalamukhi yog, bichhuda chandra evam dhavad yog
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
मुहूर्त-विचार में केवल तिथि, वार और नक्षत्र को अलग-अलग देखना पर्याप्त नहीं माना जाता। विभिन्न तिथि–नक्षत्र एवं ग्रहस्थितियों से बनने वाले विशेष योग भी कार्य की सफलता अथवा बाधा का संकेत देते हैं। इसी क्रम में ज्वालामुखी योग, बिछुड़ा चन्द्र तथा धावड़ योग का अपना विशेष महत्व है।
1. ज्वालामुखी योग
कुछ विशेष तिथि और नक्षत्रों का संयोग ज्वालामुखी योग कहलाता है।
| तिथि | नक्षत्र |
|---|---|
| प्रतिपदा | मूल |
| पंचमी | भरणी |
| अष्टमी | कृत्तिका |
| नवमी | रोहिणी |
| दशमी | आश्लेषा |
अर्थात् जब उपर्युक्त तिथि में संबंधित नक्षत्र का संयोग हो, तब उस समय को ज्वालामुखी योग माना जाता है।
फल-विचार
इस योग को सामान्यतः नेष्टफल सूचक माना गया है। अतः महत्वपूर्ण शुभ कार्यों के लिए ऐसे समय का चयन करते समय विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
हालाँकि मुहूर्त-विचार में किसी एक योग को देखकर अंतिम निर्णय नहीं किया जाना चाहिए। यदि उसी समय रवियोग, सर्वार्थसिद्धि योग, अमृत सिद्ध योग आदि प्रबल शुभ योग भी उपस्थित हों, तो ज्वालामुखी योग का नेष्ट प्रभाव न्यून अथवा नगण्य माना जा सकता है।
इसलिए वास्तविक मुहूर्त निर्धारण में समग्र पंचांग एवं आवश्यकतानुसार जन्मपत्रिका का विचार उचित है।
2. बिछुड़ा चन्द्र
वृश्चिक राशि में स्थित चन्द्रमा, अर्थात् चन्द्रमा के अपनी नीच राशि वृश्चिक में गोचर करने के समय को बिछुड़ा चन्द्र संज्ञा से संबोधित किया गया है।
इस काल का विचार विशेष रूप से ऐसे कार्यों में किया जाता है जिनमें मानसिक स्थिरता, निर्णय क्षमता और कार्य की निरंतरता महत्वपूर्ण हो।
ज्योतिषीय दृष्टि से
चन्द्रमा मन, भावनाओं, मानसिक स्थिति और निर्णय क्षमता का प्रमुख कारक माना जाता है। वृश्चिक में चन्द्रमा नीच होने के कारण इस अवधि में मानसिक चंचलता, संशय अथवा भावनात्मक उतार-चढ़ाव का विचार किया जाता है।
इसलिए महत्वपूर्ण कार्यों के लिए केवल बिछुड़ा चन्द्र देखकर निर्णय न लेते हुए तिथि, वार, नक्षत्र, लग्न तथा अन्य शुभ-अशुभ योगों का भी समग्र विचार करना चाहिए।
संदर्भ: निर्णय सागर, मार्गशीर्ष कृष्ण, संवत् 2083 (2026–27)
3. धावड़ योग
धावड़ योग की गणना एक विशेष गणितीय विधि से की जाती है।
गणना सूत्र
सूर्य नक्षत्र से चन्द्रमा के दिन नक्षत्र तक की संख्या × 3 + तिथि संख्या
प्राप्त संख्या को 7 से भाग दें।
यदि भाग देने पर शेष 3 प्राप्त हो, तो उस दिन धावड़ योग माना जाता है।
सूत्र रूप में
[(सूर्य नक्षत्र से दिन नक्षत्र तक की संख्या × 3) + तिथि संख्या] ÷ 7
शेषफल = 3 → धावड़ योग
फल
धावड़ योग को सर्वकार्य में शुभ फल प्रदान करने वाला योग माना गया है। इसलिए पंचांग में इसकी स्थिति मिलने पर सामान्य शुभ कार्यों के लिए इसका विचार किया जा सकता है।
फिर भी विवाह, गृहप्रवेश, प्रतिष्ठा, उपनयन, महत्वपूर्ण व्यापारिक आरंभ आदि विशिष्ट संस्कारों के लिए केवल धावड़ योग पर्याप्त नहीं है। ऐसे अवसरों पर संपूर्ण मुहूर्त-विचार आवश्यक होता है।
संदर्भ: निर्णय सागर, श्रावण कृष्ण, संवत् 2083 (2026–27)
मुहूर्त-विचार का मूल सिद्धांत
इन योगों से एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि मुहूर्त केवल एक योग देखकर निर्धारित नहीं किया जाता।
किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के लिए सामान्यतः विचार किया जाना चाहिए—
- तिथि
- वार
- नक्षत्र
- योग एवं करण
- चन्द्रमा की स्थिति
- लग्न एवं ग्रह स्थिति
- शुभ-अशुभ योग
- कार्य की प्रकृति
- आवश्यकता होने पर यजमान की जन्मपत्रिका
अर्थात् किसी दिन ज्वालामुखी योग बन रहा हो तो उसे देखकर तत्काल पूरे दिन को अशुभ घोषित करना उचित नहीं होगा। उसी प्रकार धावड़ योग बन रहा हो तो केवल उसके आधार पर प्रत्येक कार्य को स्वतः श्रेष्ठ नहीं माना जाना चाहिए।
विशेष टिप्पणी
मुहूर्त का फल कार्य की प्रकृति, समय की वास्तविक ग्रहस्थिति तथा यजमान की जन्मपत्रिका के अनुसार न्यूनाधिक हो सकता है। अतः महत्वपूर्ण कार्यों के लिए व्यक्तिगत मुहूर्त-विचार अधिक उपयोगी रहता है।
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
ज्योतिष • मुहूर्त • कर्मकाण्ड • अनुष्ठान • वैदिक मार्गदर्शन
संदेश:
शुभ कार्य के लिए केवल शुभ दिन नहीं, बल्कि उचित समय का चयन भी महत्वपूर्ण है।।
Releted topic -




