लोग धैर्य क्यों खो देते हैं?
Why do people lose patience?
भय, लालच, असंतोष, सफलता और बदलते जीवन-सिद्धांतों का एक गहन चिंतन
मनुष्य के जीवन में धैर्य का स्थान उसी प्रकार है, जैसे वृक्ष के लिए जड़ का। जड़ दिखाई नहीं देती, किन्तु वही वृक्ष को स्थिरता प्रदान करती है। उसी प्रकार धैर्य भी बाहरी उपलब्धियों से अधिक, मनुष्य के आंतरिक जीवन का आधार है।
किन्तु आज ऐसा प्रतीत होता है कि धैर्य धीरे-धीरे दुर्लभ होता जा रहा है। लोग शीघ्र परिणाम चाहते हैं, शीघ्र सफलता चाहते हैं, शीघ्र सम्मान चाहते हैं और कभी-कभी तो बिना पर्याप्त प्रयास के भी सब कुछ तुरंत प्राप्त करना चाहते हैं।
ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है—आखिर लोग धैर्य क्यों खो देते हैं?
क्या इसका कारण भय है? लालच है? असंतोष है? या फिर सफलता स्वयं भी कभी-कभी धैर्य की शत्रु बन जाती है?
धैर्य क्या है?
धैर्य केवल प्रतीक्षा का नाम नहीं है।
प्रतीक्षा तो विवशता भी हो सकती है, किन्तु धैर्य विश्वास से उत्पन्न होता है।
धैर्य वह शक्ति है जो कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को विचलित नहीं होने देती। यह वह आंतरिक स्थिरता है जो व्यक्ति को समय, परिस्थितियों और परिणामों के उतार-चढ़ाव के बीच संतुलित बनाए रखती है।
धैर्यवान व्यक्ति समय का सम्मान करता है, क्योंकि वह जानता है कि प्रकृति में प्रत्येक फल का अपना एक निश्चित समय होता है।
भय : जब भविष्य वर्तमान को निगलने लगता है
धैर्य खोने का सबसे सामान्य कारण भय है।
भय असफलता का हो सकता है, आर्थिक हानि का हो सकता है, संबंधों के टूटने का हो सकता है या समाज में सम्मान कम हो जाने का भी हो सकता है।
जब व्यक्ति भविष्य की आशंकाओं में उलझ जाता है, तब उसका मन वर्तमान से हट जाता है। वह प्रतीक्षा नहीं कर पाता। उसे हर समस्या का समाधान तुरंत चाहिए होता है।
यहीं से अधैर्य जन्म लेता है।
लालच : आवश्यकता से अधिक पाने की बेचैनी
मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित हैं, किन्तु इच्छाएँ असीमित हो सकती हैं।
जब इच्छा आवश्यकता से आगे बढ़ जाती है, तब लालच जन्म लेता है।
लालच व्यक्ति को यह विश्वास नहीं करने देता कि जो कुछ उसे मिलना है, वह उचित समय पर मिलेगा। वह परिणामों को अपनी इच्छा के अनुसार शीघ्र प्राप्त करना चाहता है।
और जब ऐसा नहीं होता, तब धैर्य टूट जाता है।
असंतोष : जो है, उसमें सुख न देख पाना
कुछ लोगों के जीवन में अभाव कम और असंतोष अधिक होता है।
उन्हें जो प्राप्त है, वह पर्याप्त नहीं लगता। उनका ध्यान सदैव उस पर रहता है जो उनके पास नहीं है।
असंतोष मन को निरंतर बेचैन रखता है और बेचैन मन कभी धैर्यवान नहीं हो सकता।
तुलना : दूसरों की यात्रा में स्वयं को खो देना
आज का युग तुलना का युग बन गया है।
लोग अपने जीवन की तुलना दूसरों की सफलता, धन, प्रतिष्ठा और लोकप्रियता से करने लगे हैं।
किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का प्रारब्ध, कर्म और जीवन-पथ भिन्न होता है।
जब तुलना बढ़ती है, तब धैर्य घटता है।
क्योंकि व्यक्ति अपने मार्ग पर चलना छोड़कर दूसरों की गति से स्वयं को मापने लगता है।
सफलता के बाद बदलते सिद्धांत
यह जीवन का एक अत्यंत रोचक और कभी-कभी दुखद पक्ष भी है।
हम सभी ने ऐसे लोगों को देखा है जिनकी ईमानदारी, विनम्रता और सिद्धांतों की कभी प्रशंसा की जाती थी। संघर्ष के दिनों में वे धैर्यवान और संवेदनशील दिखाई देते थे।
किन्तु समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, सफलता मिली, प्रतिष्ठा मिली और धीरे-धीरे उनके व्यवहार में भी परिवर्तन दिखाई देने लगा।
प्रश्न यह नहीं है कि वे बदल गए।
प्रश्न यह है कि वे क्यों बदल गए?
संघर्ष मनुष्य को झुकना सिखाता है।
संघर्ष उसे लोगों का महत्व समझाता है।
संघर्ष उसे प्रतीक्षा करना सिखाता है।
किन्तु सफलता के बाद कभी-कभी व्यक्ति यह मान बैठता है कि जो कुछ उसने प्राप्त किया है, वह केवल उसके अपने प्रयासों का परिणाम है।
यहीं से अहंकार का प्रवेश आरम्भ होता है।
और अहंकार का पहला प्रभाव धैर्य पर पड़ता है।
उसे प्रतीक्षा कठिन लगने लगती है।
उसे परामर्श अनावश्यक लगने लगता है।
उसे लगता है कि अब वह परिस्थितियों से ऊपर उठ चुका है।
किन्तु वास्तव में यही वह क्षण होता है जहाँ चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा आरम्भ होती है।
क्या सफलता व्यक्ति को बदल देती है?
हर बार नहीं।
कई बार सफलता व्यक्ति को नहीं बदलती, बल्कि उसके भीतर छिपी हुई प्रवृत्तियों को उजागर कर देती है।
संघर्ष में अनेक कमियाँ परिस्थितियों के कारण दब जाती हैं।
सफलता उन्हें प्रकट होने का अवसर दे देती है।
इसीलिए कहा जा सकता है कि—
संघर्ष व्यक्ति की क्षमता को प्रकट करता है, जबकि सफलता उसके चरित्र को प्रकट करती है।
प्रकृति का मौन संदेश
यदि हम प्रकृति को ध्यान से देखें तो वह हमें धैर्य का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाती है।
बीज बोते ही वृक्ष नहीं बन जाता।
नदी स्रोत से निकलते ही समुद्र तक नहीं पहुँच जाती।
सूर्योदय और सूर्यास्त भी अपने निश्चित समय पर ही होते हैं।
प्रकृति कभी जल्दबाजी नहीं करती, फिर भी उसके सभी कार्य पूर्ण होते हैं।
केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो समय को पीछे छोड़ देने की इच्छा करता है।
और यही इच्छा उसे अधैर्य की ओर ले जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से धैर्य
आध्यात्मिक दृष्टि से धैर्य का मूल आधार विश्वास है।
- स्वयं पर विश्वास
- अपने कर्म पर विश्वास
- और ईश्वर की व्यवस्था पर विश्वास
जब यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि प्रत्येक कर्म का फल उचित समय पर अवश्य प्राप्त होगा, तब मन शांत होने लगता है।
तब व्यक्ति परिणामों की चिंता से अधिक अपने कर्मों की गुणवत्ता पर ध्यान देता है।
और यही धैर्य का वास्तविक स्वरूप है।
निष्कर्ष
लोग धैर्य भय के कारण खोते हैं, लालच के कारण खोते हैं, असंतोष के कारण खोते हैं, तुलना के कारण खोते हैं और कभी-कभी सफलता के कारण भी खो देते हैं।
किन्तु इन सभी कारणों के पीछे एक ही मूल कारण छिपा होता है—मन का अपनी जड़ों से दूर हो जाना।
जो व्यक्ति समय के नियम, कर्म के सिद्धांत और जीवन की स्वाभाविक गति को समझ लेता है, उसके भीतर धैर्य स्वयं विकसित होने लगता है।
तब वह जान जाता है कि—
हर बीज का अपना समय है, हर फल की अपनी ऋतु है और हर कर्म का अपना परिणाम है।
चिंतन सूत्र
"डर कहता है — अभी चाहिए।
लालच कहता है — और चाहिए।
अहंकार कहता है — मेरे अनुसार चाहिए।
लेकिन धैर्य कहता है — उचित समय पर मिलेगा।"
"संघर्ष में व्यक्ति की क्षमता प्रकट होती है, किन्तु सफलता में उसका चरित्र प्रकट होता है।"
आचार्य विजय कुमार शुक्ला
— प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र
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