Sunday, April 18, 2021

सफल व्यापारी और ज्योतिषSuccessful Businessman and Astrology

 सफल व्यापारी और ज्योतिष

Successful Businessman and Astrology 

हर व्यक्ति का अपना व्यवसाय शुरू करने का एक सपना होता है। उनमें कुछ तो आगे बढ़ जाते हैं और कुछ पीछे रह जाते हैं।आज हम ज्योतिष के माध्यम से जानेंगे कि सफतापूर्वक व्यवसाय में कौन कौन ग्रह जिम्मेदार हैं।

जाने कौन-कौन से ग्रह बनाते हैं आपको बिजनेस मैन?

हर व्यक्ति हर काम नहीं कर सकता है। सबकी अलग-अलग कार्यक्षमता व मानसिक स्थिति होती है। उसी के अनुरूप अपना कार्यक्षेत्र चुनना चाहिए। कुछ लोगों को जॉब करना अच्छा लगता है तो कुछ को जॉब देना अच्छा लगता है। लोगों को आप जॉब तभी दे सकते जब आप बिजनेस करेंगे और बिजनेस में आप सफल तभी हो सकते है जब कुण्डली में बिजनेस से सम्बन्धित ग्रह, भाव व योग प्रबल हो।
दशम भाव व दशमेश का सम्बन्ध आपकी जीविका से होता है। द्वितीय, द्वतीयेश व एकादश भाव, एकादशेश का भी कुण्डली में मजबूत होना आवश्यक होता है। क्योंकि द्वतीय व द्वतीयेश का सम्बन्ध धन से होता है एंव एकादशेश व एकादश भाव का सम्बन्ध लाभ से होता है। व्यापार में धन व लाभ का विशेष महत्व है। धन नहीं होगा तो बिजनेस कर पाना मुश्किल है और धन अच्छे से नहीं आयेगा तो बिजनेस करने से फायदा क्या।

यदि एकादश भाव व एकादशेश बलवान नहीं है तो व्यापार में लाभ नहीं होगा। वैसे मूलतः व्यापार के लिए बुध व बृहस्पति ग्रह का शुभ होना अच्छा माना जाता है लेकिन व्यापार किस चीज से सम्बन्धित है। इसके लिए प्रत्येक ग्रह की अलग-अलग क्षेत्र में विशेष भूमिका है।

1-यदि आप राजनीति, चिकित्सा क्षेत्र, विद्युत विभाग, होटल मैनेजमेन्ट, रेलवे विभाग, आभूषण खरीदना-बेचना, रत्न बेचना, विद्युत उपकरण, मेडिकल स्टोर, जनरल स्टोर, कपड़े का कार्य, वाहनों का क्रय-विक्रय, पुस्तक भण्डार, अनाजों का खरीदना-बेचना आदि इस प्रकार के व्यवसाय करने के लिए जन्मपत्री में सूर्य ग्रह शुभ व बलवान आवश्यक है।

2-यदि आप बागवानी का कार्य, कृषि कार्य, तरल पदार्थो का व्यापार, आयुर्वेदिक दवाओं का व्यापार, बिजली की दुकान, मोटर पार्टस पेट्रोल पम्प, कोल्ड्र डिंक, पानी, संगीत एकाडिमी, होटल, रेस्टोरेन्ट, मिटटी का कार्य, ठेकेदारी, किसी भी क्षेत्र में दलाली, कैरोािन आयल, प्रकाशन,दूध की डेरी आदि व्यवसाय करना चाहते है तो कुण्डली में चन्द्रमा का बलवान होना बहुत जरूरी है।

3-अगर आप कम्यूटर के क्षेत्र में साफ्टवेयर, हार्डवेयर, इलेक्ट्रानिक, भूमि, मेडिकल, पेट्रोल पम्प, सर्जरी का सामान, कोर्ट-कचहरी, ठेकेदारी, मेडिकल की दुकान, धर्म उपदेशक, औषधि निर्माण कारखाना, आदि किसी प्रकार का बिजनेस करना चाहते है तो उसके लिए मंगल ग्रह का मजबूत होना जरूरी है और साथ में मंगल का दशम, दशमेश व लाभ भाव से सम्बन्ध होना आवश्यक है।

4- पर्यटन, टेलीफोन, तम्बाकू, पान मसाला, कत्था, किमाम, पुस्तक के थोक विक्रेता, दूर संचार विभाग की ठेकेदारी, रेलवे के पार्टो का कारखाना, चूडि़यों का व्यापार, कपड़े का व्यापार, हरी वस्तुओं का व्यापार, मार्केटिंग का बिजनेस तथा फर्नीचर आदि का व्यवसाय आपके लिए लाभप्रद रहेगा। इसके लिए बुध ग्रह का शुभ व ताकतवर होना बहुत जरूरी है तभी आप सफल हो पायेंगे।

5-यदि आप सम्पादन कार्य, थोक विक्रेता, पूजन भण्डार, पान की दुकान, मिठाई की दुकान, इत्र का कार्य, फिल्म मेकर, भूमि का क्रय व विक्रय, आभूषण के विक्रेता, पीली वस्तुओं का व्यापार, वक्ता, नेता, शिक्षा और शेयर आदि का व्यवसाय करना चाहते है तो गुरू ग्रह का कुण्डली में मजबूत होना जरूरी है।

6- अगर आप रेस्टोरेन्ट, सौन्दर्य प्रसाधन, शिल्प कार्य, साहित्य, फिल्म विज्ञापन, परिवहन विभाग की ठेकेदारी, वस्त्रों का व्यापार, हीरे का बिजनेस, सफेद वस्तुओं का कार्य, खनिज कार्य, पेन्टिंग, निर्माण कार्य, परिवहन विभाग, पर्यटन विभाग, रेसलिंग, टीवी शो, थियेटर, आदि से सम्बन्धित व्यवसाय करने के लिए शुक्र ग्रह का शुभ व बलवान आवश्यक होता है।

7-यदि आप, ज्योतिष का कार्य, कर्मकाण्ड, लोहे का, वकालत, खनिज विभाग, तकनीकी कार्य, कृषि कार्य, काली वस्तुओं का व्यापार जैसे- तिलहन, काले तिल आदि, ट्रांसपोर्ट का कार्य, मुर्गी पालन, लकड़ी का कार्य, बिजली का कार्य, लोहे का कार्य, शिल्प कला का कार्य, कृषि कार्य, वाहन की ऐजेन्सी, मोटर पाटर््स आदि के व्यवसाय करने के लिए शनि का शुभ और ताकतवर होना अति-आवश्यक है।

नोट-ग्रहों के बलवान होने के साथ-साथ ग्रह किसी पाप भाव में पड़ा न हो, पाप ग्रहों से दृष्ट न हो, अस्त न हो, निर्बल न हो, नीच का न हो। द्वतीयेश, द्वतीय भाव, लाभ भाव, लाभेश, दशमेश व दशम भाव के साथ ग्रह सम्बन्ध होकर शुभ योग का निर्माण कर रहा हो तभी आप एक सफल व्यवसायिक या बिजनेस मैन बन सकते है।

श्रीशिवाष्टोत्तरशतनामावलिःShree Shishvashtottara Shantnamavali:

 श्रीशिवाष्टोत्तरशतनामावलिः 


Shree Shishvashtottara Shantnamavali:

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥ 


ॐ अस्य श्रीशिवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमन्त्रस्य नारायणऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीसदाशिवो देवता । गौरी उमा शक्तिः । श्रीसाम्बसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ 


अथ ध्यानम् । 


शान्ताकारं शिखरिशयनं नीलकण्ठं सुरेशं विश्वधारं स्फटिकसदृशं शुभ्रवर्णं शुभाङ्गम् । गौरीकान्तं त्रितयनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे शम्भुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ 


अथ नामावलिः । 


ॐ शिवाय नमः । ॐ महेश्वराय नमः । ॐ शम्भवे नमः । ॐ पिनाकिने नमः । ॐ शशिशेखराय नमः । ॐ वामदेवाय नमः । ॐ विरूपाक्षाय नमः । ॐ कपर्दिने नमः । ॐ नीललोहिताय नमः । ॐ शङ्कराय नमः । १०


 ॐ शूलपाणिने नमः । ॐ खट्वाङ्गिने नमः । ॐ विष्णुवल्लभाय नमः । ॐ शिपिविष्टाय नमः । ॐ अम्बिकानाथाय नमः । ॐ श्रीकण्ठाय नमः । ॐ भक्तवत्सलाय नमः । ॐ भवाय नमः । ॐ शर्वाय नमः । ॐ त्रिलोकेशाय नमः । २० 


ॐ शितिकण्ठाय नमः । ॐ शिवाप्रियाय नमः । ॐ उग्राय नमः । ॐ कपालिने नमः । ॐ कामारये नमः । ॐ अन्धकासुरसूदनाय नमः । ॐ गङ्गाधराय नमः । ॐ ललाटाक्षाय नमः । ॐ कलिकालाय नमः । ॐ कृपानिधये नमः । ३०


 ॐ भीमाय नमः । ॐ परशुहस्ताय नमः । ॐ मृगपाणये नमः । ॐ जटाधराय नमः । ॐ कैलासवासिने नमः । ॐ कवचिने नमः । ॐ कठोराय नमः । ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः । ॐ वृषाङ्गाय नमः । ॐ वृषभारूढाय नमः । ४० 


ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमः । ॐ सामप्रियाय नमः । ॐ स्वरमयाय नमः । ॐ त्रयीमूर्तये नमः । ॐ अनीश्वराय नमः । ॐ सर्वज्ञाय नमः । ॐ परमात्मने नमः । ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः । ॐ हविषे नमः । ॐ यज्ञमयाय नमः । ५० 


ॐ सोमाय नमः । ॐ पञ्चवक्त्राय नमः । ॐ सदाशिवाय नमः । ॐ विश्वेश्वराय नमः । ॐ वीरभद्राय नमः । ॐ गणनाथाय नमः । ॐ प्रजापतये नमः । ॐ हिरण्यरेतसे नमः । ॐ दुर्धर्षाय नमः । ॐ गिरिशाय नमः । ६० 


ॐ अनघाय नमः । ॐ भुजङ्गभूषणाय नमः । ॐ भर्गाय नमः । ॐ गिरिधन्वने नमः । ॐ गिरिप्रियाय नमः । ॐ कृत्तिवाससे नमः । ॐ पुरारातये नमः । ॐ भगवते नमः । ॐ प्रमथाधिपाय नमः । ॐ मृत्युञ्जयाय नमः । ७०


 ॐ सूक्ष्मतनवे नमः । ॐ जगद्व्यापिने नमः । ॐ जगद्गुरुवे नमः । ॐ व्योमकेशाय नमः । ॐ महासेनजनकाय नमः । ॐ चारुविक्रमाय नमः । ॐ रुद्राय नमः । ॐ भूतपतये नमः । ॐ स्थाणवे नमः । ॐ अहिर्बुध्न्याय नमः । ८० 


ॐ दिगम्बराय नमः । ॐ अष्टमूर्तये नमः । ॐ अनेकात्मने नमः । ॐ सात्त्विकाय नमः । ॐ शुद्धविग्रहाय नमः । ॐ शाश्वताय नमः । ॐ खण्डपरशवे नमः । ॐ रजसे नमः । ॐ पाशविमोचनाय नमः । ॐ मृडाय नमः । ९० 


ॐ पशुपतये नमः । ॐ देवाय नमः । ॐ महादेवाय नमः । ॐ अव्ययाय नमः । ॐ हरये नमः । ॐ भगनेत्रभिदे नमः । ॐ अव्यक्ताय नमः । ॐ दक्षाध्वरहराय नमः । ॐ हराय नमः । ॐ पूषादन्तभिदे नमः । १०० 


ॐ अव्यग्राय नमः । ॐ सहस्राक्षाय नमः । ॐ सहस्रपदे नमः । ॐ अपवर्गप्रदाय नमः । ॐ अनन्ताय नमः । ॐ तारकाय नमः । ॐ परमेश्वराय नमः । ॐ त्रिलोचनाय नमः । १०८


 ॥ इति श्रीशिवाष्टोत्तरशतनामावलिः ॥

Friday, April 16, 2021

संस्कृत में गिनती Count in sanskrit

 पुल्लिंग स्त्रीलिंग नपुंसकलिंग

1-एकः, एका, एकम्

2-द्वौ,द्वे, द्वे

3-त्रयः,तिस्त्रः, त्रीणि

4-चत्वारः, चतस्त्रः,चत्वारि

*****************************

विभक्ति, पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग

प्रथमा-एकः-एका-एकम्

द्वितीया-एकम्-एकाम्-एकम्

तृतीया-एकेन-एकया-एकेन

चतुर्थी-एकस्मै-एकस्यै-एकस्मै

********************************


संस्कृत में गिनती Count in sanskrit



1-एकः

2-द्वौ

3-त्रयः

4-चत्वारः

5-पञ्च

6-षट्

7-सप्त

8-अष्ट

9-नव

10-दश

11-एकादश

12-द्वादश

13-त्रयोदश

14-चतुर्दश

15-पञ्चदश

16-षोडश

17-सप्तदश

18-अष्टादश

19-नवदश,एकोनविंशति:

20-विंशतिः

21-एकविंशतिः

22-द्वाविंशतिः

23-त्रयोविंशतिः

24-चतुर्विंशति:

25-पञ्चविंशतिः

26-षड्विंशतिः

27-सप्तवंशतिः

28-अष्टाविंशतिः

29-नवविंशतिः

30-त्रिंशत्

31-एकत्रिंशत्

32-द्वात्रिंशत्

33-त्रयस्त्रिंशत्

34-चतुस्त्रिंशत्

35-पञ्चत्रिंशत्

36-षट्त्रिंशत्

37-सप्तत्रिंशत्

38-अष्टात्रिंशत्

39-नवत्रिंशत्, एकोनचत्वारिंशत्

40-चत्वारिंशत्

41-एकचत्वारिंशत्

42-द्विचत्वारिंशत्

43-त्रयश्चत्वारिंशत्

44-चतुश्चत्वारिंशत्

45-पञ्चचत्वारिंशत्

46-षट्चत्वारिंशत्

47-सप्तचत्वारिंशत्

48-अष्टचत्वारिंशत्

49-नवचत्वारिंशत्,एकोनपञ्चाशत्

50-पञ्चाशत्

51-एकपञ्चाशत्

52-द्विपञ्चाशत्

53-त्रिपञ्चाशत्

54-चतुःपञ्चाशत्

55-पञ्चपञ्चाशत्

56-षट्पञ्चाशत्

57-सप्तपञ्चाशत्

58-अष्टपञ्चाशत्

59-नवपञ्चाशत्,एकोनषष्टि

60-षष्टि:

61-एकषष्टि:

62-द्विषटिः, द्विषष्टि:

63-त्रिषष्टि:

64-चतुष्षष्टि:

65-पञ्चषष्टि:

66-षट्षष्टि:

67-सप्तषटिः

68-अष्टषष्टि:

69-नवषष्टि:

70-सप्ततिः

71-एकसप्ततिः

72-द्विसप्ततिः

73-त्रिसप्ततिः

74-चतुस्सप्ततिः

75-पञ्चसप्ततिः

76-षट्सप्ततिः

77-सप्तसप्ततिः

78-अष्टसप्ततिः

79-नवसप्ततिः,एकोनाशीतिः

80-अशीतिः

81-एकाशीतिः

82-द्वयशीतिः

83-त्र्यशीतिः

84-चतुशीतिः

85-पञ्चाशीतिः

86-षडशीतिः

87-सप्ताशीतिः

88-अष्टाशीतिः

89-नवाशीतिः, एकोननवतिः

90-नवतिः

91-एकनवतिः

92-द्विनवतिः

93-त्रिणवीतिः

94-चतुर्णवतिः

95-पञ्चनवतिः

96-षण्णवतिः

97-सप्तनवतिः

98-अष्टानवतिः

99-नवनवतिः,एकोनशतम्

100-शतम्

Saturday, February 27, 2021

जानें हनुमान चालीसा में हनुमानजी का नाम कितनी बार आता है? Know how many times Hanumanji's name appears in Hanuman Chalisa?

जानें हनुमान चालीसा में हनुमानजी का नाम कितनी बार आता है?
Know how many times Hanumanji's name appears in Hanuman Chalisa?

हनुमान चालीसा में हनुमानजी का हनुमान नाम चार बार आया है।

सभी नाम कुल मिलाकर 27 बार आये हैं।

1-पवन कुमार

2-ज्ञान गुण सागर

3-कपीस

4-रामदूत

5-अतुलित बल धाम

6-अंजनि पुत्र

7-पवनसुत

8-महाबीर 2

9-बजंरगी

10-कञ्चन वर्ण

11-संकरसुवन

12-केसरी नंदन

13-तेजप्रताप

14-जगवंदन

15-विद्यावान

16-असुर निकंदन

17-राम दुलारे

18-हनुमत 2

19-बलबीरा

20-पवनतनय

21-हनुमान 4

22-विक्रम


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घबराहट Nervousness

Thursday, February 25, 2021

जानें ज्योतिष के आधार पर आपके पास कितनी धन-संपत्ति होगी? Know how much wealth you will have based on astrology?

 जानें ज्योतिष के आधार पर आपके पास कितनी धन-संपत्ति होगी?

Know how much wealth you will have based on astrology?



अधिकतर लोगों के मन में यह सवाल उत्पन्न होता है कि हमारे पास कितनी धन संपत्ति होगी?

हम अपने जीवन में धन के मामले में कितने समृद्ध होंगे?

क्या हमारे पास हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में धन होगा?आदि आदि न जाने कितने प्रश्न विचारों के साथ हमारे मष्तिष्क में चलते रहते हैं।इसके आंकलन के लिए सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ज्योतिष शास्त्र की है।

हम अपनी धन सम्पदा का ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से आकलन कर सकते हैं।


दूसरे भाव से सुवर्णरत्नादि कोष,लक्षाधिपति तथा विपुल सम्पदा का ज्ञान किया जाता है।गुरु कारक और मङ्गल नेष्ट होता है।


चतुर्थ भाव से पशु,वाहन भवन,कृषि,जमीन जायदाद का ज्ञान किया जाता है।चन्द्रमा कारक होता है।


अष्टम भाव से भूमिगत द्रव्य,लाटरी, तथा किसी भी प्रकार से आकस्मिक धन की प्राप्ति तथा ससुराल पक्ष आदि से लाभ की स्थिति देखी जाती है।शनि कारक होता है।


नवम भाव से भाग्य का विचार किया जाता है ताकि ये सारी सम्पदा हमे निर्विघ्न प्राप्त हो।सूर्य और गुरु कारक होते हैं।


एकादश भाव से सम्पूर्ण धनागम लाटरी आदि का लाभ देखा जाता है।गुरु कारक होता है।


इस तरह हम इन पाँच भावो और इनके कारक ग्रहों के द्वारा अपनी चल-अचल संपत्ति का आंकलन और उसका उपभोग देख सकते हैं।

इनकी जितनी अनुकूलता हमारी जन्मपत्री में होगी धन-संपत्ति की उतनी उपलब्धता सुनिश्चित है।


 


कष्ट शान्ति के लिये मन्त्र सिद्धान्त

कष्ट शान्ति के लिये मन्त्र सिद्धान्त Mantra theory for suffering peace

कष्ट शान्ति के लिये मन्त्र सिद्धान्त  Mantra theory for suffering peace संसार की समस्त वस्तुयें अनादि प्रकृति का ही रूप है,और वह...