Tuesday, February 5, 2019

Mahamrityunjay Mantra

                       महामृत्युञ्जय मंत्र

भूतभावन भगवान शिव अपने भक्तों की भक्ति से जल्द प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए ऐसे कई मंत्र हैं, जिनका नित्य जप/अनुष्ठान कर मनोकामनाएं पूरी की जा सकती हैं।

शिवपुराणआदि ग्रन्थों में ऐसे कई मंत्रों का वर्णन किया गया है, जो मानव  के कल्याण हेतु बहुत ही प्रभावी हैं।

शिव को जल्द प्रसन्न करने का सबसे प्रभावशाली मंत्र है- महामृत्युञ्जय मंत्र। इस मंत्र का जप करने से वैभव व ऐश्वर्य की कामना पूरी होती है,साथ ही रोगनिवारण की अद्भुत क्षमता इस मंत्र में होती है।

महामृत्युञ्जय मंत्र Mahamrityunjay Mantra-

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

यह ऐसा चमत्कारी मंत्र है, जिसके नित्य जप से कुंडली में मौजूद दोष दूर हो जाते हैं। इस मंत्र के जप से मांगलिक दोष, नाड़ी दोष, कालसर्प दोष, बुरी नजर दोष, रोग, दुःस्वप्न, वैवाहिक जीवन की समस्याएं, संतान बाधा आदि समस्या भी दूर होती हैं।

जो जातक भक्तिपूर्वक इस मंत्र का जाप करते हैं, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता, उम्र बढ़ती है। इस मंत्र को जीवन प्रदाता भी कहा गया है।
इस मंत्र का नित्य जप व शिव पूजन करने से स्वास्थ उत्तम बना रहता है। अगर किसी बीमारी से पीड़ित हैं, तो वह रोग दूर हो जाता है। यदि आर्थिक समस्या बनी रहती है, धन हानि होती है, व्यापार में लाभ नहीं होता, तो इस मंत्र का जाप करने से धन-दौलत और वैभव प्राप्त होता है।

इस मंत्र का निरंतर जप करने वाले जातकों को समाज में उच्च स्थान मिलता है। समाज में सम्मान बना रहता है, ख्याति फैलती है, नौकरी या व्यवसाय में तरक्की होती है, जीवन में आनंद की प्राप्ति होती है व सुख-समृद्धि बढ़ती है।

ऐसे जातक जो निःसंतान है। वह प्रतिदिन शिव को जल अर्पित करने के साथ-साथ इस मंत्र का जाप करें, तो जल्द सुंदर संतान की प्राप्ति होगी। धन-हानि हो रही हो या मनोबल कमजोर हो गया हो तो महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।

शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र का जप करने के लिए ब्रम्हमुहूर्त का समय सबसे उत्तम माना गया है, लेकिन अगर आप इस समय मंत्र जप नहीं कर पाते हैं, तो सुबह उठकर स्नान कर साफ कपडे़ पहने, फिर कम से कम पांच बार(पाँच माला) रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जप करें।

अगर कुंडली में किसी भी तरह से मृत्यु दोष या मारकेश है, तो इस मंत्र का जप करें। इस मंत्र का जप करने से किसी भी तरह की महामारी से बचा जा सकता है, पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद से भी बचता है।

इस मंत्र में आरोग्यकर शक्तियां है, जिसके जप से ऐसी ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो आपको मृत्यु के भय से मुक्त कर देती है, इसीलिए इसे मोक्ष दायक भी कहा गया है। इस मंत्र के जप से शिव की कृपा प्राप्त होती है।

आपको व्यापार में घाटा हो रहा है, तो महामृत्युजंय मंत्र का जप करें, लाभ होने लगेगा। भविष्य पुराण में कहा गया है कि महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से अच्छा स्वास्थ्य, धन, समृद्धि और लंबी उम्र मिलती है।

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नमक के कुछ अद्भुत प्रयोग Some amazing use of salt

 एक ऐसी वस्तु जिसका प्रयोग हम भोजन में नियमित रूप से करते हैं।जिसके बिना एक दिन भी रहना मुश्किल होता है।लेकिन क्या आप जानते हैं कि  भोजन और औषधि प्रयोग के अलावा भी इसका प्रयोग किया जाता है?
यदि नही तो -

आईये जानते हैं नमक के कुछ प्रयोग
Let's know some uses of salt

हमारे यहां मांगलिक कार्यों में सबसे पहले घर में नमक लाया जाता है क्योंकि साबुत नमक घर में रखना बहुत शुभ माना जाता है।


जब शादी में सबसे पहले गणेश स्थापना के पूर्व भी जो पूजा सामग्री रखी जाती है उसमें साबुत नमक भी जरुर रखा जाता है। वास्तु के अनुसार ऐसी मान्यता है कि साबुत नमक में सकारात्मक ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करने की क्षमता होती है।


साथ ही यह नकारात्मक उर्जा को घर से दूर करता है। इसलिए घर में कोई भी शुभ काम करने जा रहे हों तो नमक डालकर पोंछा जरूर लगाएं।

घर में हमेशा साबुत नमक जरुर रखना चाहिए क्योंकि इससे घर से कई तरह के वास्तुदोष दूर हो जाते हैं। इसीलिए घर के जिस भी कोने में वास्तुदोष दूर करने के लिए वहां एक काँच या मिट्टी के प्याले में भरकर साबुत नमक रखा जाता है।

मन में खिन्नता, उदासी,भय, चिंता होने से, दोनों हाथों में साबुत नमक भर कर कुछ देर रखे रहें, फिर वॉशबेसिन में डाल कर पानी से बहा दें। नमक इधर-उधर न फेंकें। नमक हानिकारक चीजों को नष्ट करता है।

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Monday, February 4, 2019

मौनी अमावस्या Mauni Amavasya

मौनी अमावस्या Mauni Amavasya


हमारे धर्मग्रंथों में माघ मास को बेहद पवित्र और धार्मिक माह  माना जाता है ।
इस मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है।
सूर्य के मकर राशि में रहते हुए मौनी अमावस्या का पड़ना अपने आप में एक महा संयोग है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों और सरोवरों में देवी देवताओ का वास होता है।

चन्द्रमा को मन का स्वामी माना गया है और अमावस्या को चन्द्रदर्शन नहीं होते, जिससे मन की स्थिति कमज़ोर होती है। इसलिए इस दिन मौन व्रत रखकर मन को संयम में रखने का विधान बनाया गया है।
मौनी अमावस्या का भी यही संदेश है कि इस दिन मौन व्रत धारण कर मन को संयमित किया जाये। मन ही मन ईश्वर के नाम का स्मरण किया जाये उनका जाप किया जाये। यह एक प्रकार से मन को साधने का पर्व है।

यदि किसी के लिये मौन रहना संभव न हो तो वह अपने विचारों में किसी भी प्रकार की मलिनता न आने दे, किसी के प्रति कोई कटुवचन न निकले तो भी मौनी अमावस्या का व्रत उसके लिये सफल होता है।
प्रात:काल पवित्र तीर्थ स्थलों पर स्नान किया जाता है। स्नान के बाद तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, वस्त्रादि किसी ब्राह्मण को दान दिया जाता है।

● इस दिन पितरों का तर्पण करने से भी उन्हें शांति मिलती है।
● इस दिन किया गया गंगा स्नान अश्वमेध यज्ञ के फल के सामान पुण्य फलदायी होता है।

● शास्त्रानुसार इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्त्र गौ दान का पूण्य मिलता है।

● शास्त्रो के अनुसार पीपल की परिक्रमा करने से ,सेवा पूजा करने से, पीपल की छाया से,स्पर्श करने से समस्त पापो का नाश,अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है व आयु में वृद्धि होती है।किन्तु सामान्य दिनों में केवल शनिवार के दिन ही पीपल वृक्ष का स्पर्श किया जाता है।

● पीपल के पूजन में दूध, दही, तिल मिश्रितमिठाई, फल, फूल,जनेऊ, का जोड़ा चढाने से और घी का दीप दिखाने से भक्तो की सभी मनोकामनाये पूरी होती है।
कहते है की पीपल के मूल में भगवान् विष्णु तने में शिव जी तथा अग्र भाग में ब्रह्मा जी का निवास है।इसलिए सोमवार को यदि अमावस्या हो तो पीपल के पूजन से अक्षय पूण्य लाभ तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

●  इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के पेड़ की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन आदि से पूजा और पीपल के चारो और 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है और हर परिक्रमा में कोई भी तिल मिश्रित मिठाई या फल चढाने से विशेष लाभ होता है। ये सभी 108 फल या मिठाई परिक्रमा के बाद ब्राह्मण या निर्धन  को दान करे। इस प्रक्रिया को कम से कम 3 सोमवतीअमावस्या तक करने से सभी समस्याओ से मुक्ति मिलती है।इस प्रदक्षिणा से पितृ दोष का भी निश्चित समाधान होता है।

●  इस दिन जो भी स्त्री तुलसी या माँ पार्वती पर सिंदूर चढ़ा कर अपनी मांग में लगाती है वह अखंड सौभाग्यवती बनी रहती है।

●  जिन जातको की जन्म पत्रिका में कालसर्प दोष है।वे लोग यदि सोमवती अमावस्या पर चांदी के बने नाग-नागिन की विधिवत पूजा कर उन्हें नदी में प्रवाहित करे,शिव जी पर कच्चा दूध चढाये,पीपल पर मीठा जल चढ़ा कर उसकी परिक्रमा करें,धुप दीप दिखाए,ब्राह्मणों को यथा शक्ति दान दक्षिणा दे कर उनका आशीर्वाद ग्रहण करे तो निश्चित ही काल सर्प दोष की शांति होती है।

●  इस दिन जो लोग व्यवसाय में परेशानी उठा रहे है,वे पीपल के नीचे तिल के तेल का दिया जलाकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र का कम से कम 5 माला जप करे तो व्यवसाय में आ रही दिक्कते समाप्त होती है।इस दिन अपने पितरों के नाम से पीपल का वृक्ष लगाने से जातक को सुख, सौभग्य,पुत्र की प्राप्ति होती है,एव पारिवारिक कलेश दूर होते है।

●  इस दिन पवित्र नदियो में स्नान, ब्राह्मण भोज, गौ दान, अन्नदान, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्त्व माना गया है,इस दिन गंगा स्नान का भी विशिष्ट महत्त्व है। माँ गंगा या किसी पवित्र सरोवर में स्नान कर शिव-पार्वती एवं तुलसी का विधिवत पूजा करें।

● भगवान् शिव पर बेलपत्र, बेल फल, मेवा, तिल मिश्रित मिठाई, जनेऊ का जोड़ा आदि चढ़ा कर ॐ नमः शिवाय की 11 माला करने से असाध्य कष्टो में भी कमी आती है।

● प्रातः काल शिव मंदिर में सवा किलो साबुत चांवल और तिल अथवा तिल मिश्रित मिष्ठान दान करे।

● सूर्योदय के समय सूर्य को जल में लाल फूल,लाल चन्दन डाल कर गायत्री मन्त्र जपते हुए अर्घ देने से दरिद्रता दूर होती है।

●  सोमवती मौनीअमावस्या को तुलसी के पौधे की ॐ नमो नारायणाय जपते हुए  108 बार परिक्रमा करने से दरिद्रता दूर होती है।

●  जिन लोग का चन्द्रमा कमजोर है वो गाय को दही और चांवल खिलाये अवश्य ही मानसिक शांति मिलेगी।

●  मन्त्र जप,साधना एवं दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

● इस दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, कानूनी विवाद, आर्थिक परेशानियो और पति-पत्नी सम्बन्धि विवाद के समाधान के लिए किये गए उपाय अवश्य ही सफल होते है।

● इस दिन धोबी-धोबन को भोजन कराने,उनके बच्चों को किताबे मिठाई फल और दक्षिणा देने से सभी मनोरथ पूर्ण होते है।

● मौनीअमावस्या को भांजा,ब्राह्मण, और ननद को मिठाई, फल,खाने की सामग्री देने से उत्तम फल मिलाता है।

● इस दिन अपने आसपास के वृक्ष पर बैठे कौओं और जलाशयों की मछलियों को (चावल और घी मिलाकर बनाए गए) लड्डू दीजिए। यह पितृ दोष दूर करने का उत्तम उपाय है।

● मौनीअमावस्या के दिन दूध से बनी खीर दक्षिण दिशा में (पितृ की फोटो के सम्मुख) कंडे की धूनी लगाकर पितृ को अर्पित करने से भी पितृ दोष में कमी आती है।

● मौनीअमावस्या के समय जब तक सूर्य चन्द्र एक राशि में रहे, तब कोई भी सांसरिक कार्य जैसे-हल चलाना, दांती, गंडासी, लुनाई, जोताई, आदि तथा इसी प्रकार से गृह कार्य भी नहीं करने चाहिए।

मौनी अमावस्या की कथा
The story of Mauni Amavasya

कांचीपुरी में देवस्वामी नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। पुत्री का नाम गुणवती था। ब्राह्मण ने सातों पुत्रों को विवाह करके बेटी के लिए वर खोजने अपने सबसे बड़े पुत्र को भेजा। उसी दौरान किसी पण्डित ने पुत्री की जन्मकुण्डली देखी और बताया- "सप्तपदी होते-होते यह कन्या विधवा हो जाएगी।" तब उस ब्राह्मण ने पण्डित से पूछा- "पुत्री के इस वैधव्य दोष का निवारण कैसे होगा?" पंडित ने बताया- "सोमा का पूजन करने से वैधव्य दोष दूर होगा।" फिर सोमा का परिचय देते हुए उसने बताया- "वह एक धोबिन है। उसका निवास स्थान सिंहल द्वीप है। उसे जैसे-तैसे प्रसन्न करो और गुणवती के विवाह से पूर्व उसे यहाँ बुला लो।" तब देवस्वामी का सबसे छोटा लड़का बहन को अपने साथ लेकर सिंहल द्वीप जाने के लिए सागर तट पर चला गया। सागर पार करने की चिंता में दोनों एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। उस पेड़ पर एक घोंसले में गिद्ध का परिवार रहता था। उस समय घोंसले में सिर्फ़ गिद्ध के बच्चे थे। गिद्ध के बच्चे भाई-बहन के क्रिया-कलापों को देख रहे थे। सायंकाल के समय उन बच्चों (गिद्ध के बच्चों) की माँ आई तो उन्होंने भोजन नहीं किया। वे माँ से बोले- "नीचे दो प्राणी सुबह से भूखे-प्यासे बैठे हैं। जब तक वे कुछ नहीं खा लेते, तब तक हम भी कुछ नहीं खाएंगे।" तब दया और ममता के वशीभूत गिद्ध माता उनके पास आई और बोली- "मैंने आपकी इच्छाओं को जान लिया है। इस वन में जो भी फल-फूल, कंद-मूल मिलेगा, मैं ले आती हूं। आप भोजन कर लीजिए। मैं प्रात:काल आपको सागर पार कराकर सिंहल द्वीप की सीमा के पास पहुंचा दूंगी।" और वे दोनों भाई-बहन माता की सहायता से सोमा के यहाँ जा पहुंचे। वे नित्य प्रात: उठकर सोमा का घर झाड़कर लीप देते थे।

एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से पूछा- "हमारा घर कौन बुहारता है, कौन लीपता-पोतता है?" सबने कहा- "हमारे सिवाय और कौन बाहर से इस काम को करने आएगा?" किंतु सोमा को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन उसने रहस्य जानना चाहा। वह सारी रात जागी और सब कुछ प्रत्यक्ष देखकर जान गई। सोमा का उन बहन-भाई से वार्तालाप हुआ। भाई ने सोमा को बहन संबंधी सारी बात बता दी। सोमा ने उनकी श्रम-साधना तथा सेवा से प्रसन्न होकर उचित समय पर उनके घर पहुंचने का वचन देकर कन्या के वैधव्य दोष निवारण का आश्वासन दे दिया। किंतु भाई ने उससे अपने साथ चलने का आग्रह किया। अधिक आग्रह करने पर सोमा उनके साथ चल दी। चलते समय सोमा ने बहुओं से कहा- "मेरी अनुपस्थिति में यदि किसी का देहान्त हो जाए तो उसके शरीर को नष्ट मत करना। मेरा इन्तजार करना।" और फिर सोमा बहन-भाई के साथ कांचीपुरी पहुंच गई। दूसरे दिन गुणवती के विवाह का कार्यक्रम तय हो गया। सप्तपदी होते ही उसका पति मर गया। सोमा ने तुरन्त अपने संचित पुण्यों का फल गुणवती को प्रदान कर दिया। तुरन्त ही उसका पति जीवित हो उठा। सोमा उन्हें आशीर्वाद देकर अपने घर चली गई। उधर गुणवती को पुण्य-फल देने से सोमा के पुत्र, जामाता तथा पति की मृत्यु हो गई। सोमा ने पुण्य फल संचित करने के लिए मार्ग में अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की छाया में विष्णु जी का पूजन करके 108 परिक्रमाएं कीं। इसके पूर्ण होने पर उसके परिवार के मृतक जन जीवित हो उठे।
निष्काम भाव से सेवा का फल मधुर होता है, यही मौनी अमावस्या के व्रत का लक्ष्य है।
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Sunday, February 3, 2019

आलोचना और सफलता Criticism and success

एक बहुत पुरानी कहावत है-

"निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय"
nindak niyare raakhiye aangan kutee chhavaay"

अर्थात हमारे जीवन में निंदा/आलोचना करने वाले लोग बहुत महत्वपूर्ण है।कारण अगर कोई हमारी आलोचना नही करेगा तो हमे अपनी कमियों के अहसास भी नहीं हो पाएगा,और हमारा जीवन उद्देश्य से परे हो जाएगा।

हमारे शास्त्रों में अनेकों प्रेरणा देने वाले स्रोत हैं लेकिन हम उन्हें पढ़ते हैं कुछ समय तक याद रखा फिर भूल गए।

हमारा मन और मष्तिष्क हमेशा दूसरी दुनिया में विचरण करता रहता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि आप अपने मस्तिष्क को सकारात्मक विचार दो तो वो तुरंत ही नकारात्मक विचारों की ओर आकर्षित हो जाता है, आप बार-बार उसे अच्छा सोचने को कहते हो लेकिन वो फिर भी हर बार उल्टी दिशा में ही जाता है।

इसी तरह जब कोई हमें अच्छी बातों की ओर अग्रसर होने को कहता है तो वो बातें हमें अच्छी लगती हैं लेकिन कुछ समय बाद ही हमारे विचारों से दूर हो जाती हैं।

ठीक इसके विपरीत यदि कोई हमारी आलोचना करता है, हमारी निंदा करता है तो वो बात हमारे जेहन में अंदर तक चली जाती है और हम ठीक उसके खिलाफ हो जाते हैं।यह प्रभाव जितना अधिक होता है, जितना तीव्र होता है, हम उतनी ही तीव्रता से उसके खिलाफ काम कर रहे होते हैं और एक दिन हम उस  पड़ाव तक पहुंच चुके होते हैं जिसके न कर पाने के लिए हमारी आलोचना हुई थी।
अर्थात हम सफल हो चुके होते हैं और हमे पता भी नही चलता।

इससे ये बात सिद्ध होती है कि जीवन में निंदा करने वालों की बहुत ही आवश्यकता है, हम हर निंदा को स्वीकार करते हुए भी सफल हो जाते हैं, और यह सफलता बच्चों के खेल जैसी होती है।
इसे यूट्यूब चैनल पर देखें
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Saturday, February 2, 2019

जीवन का मुख्य रहस्य The main secret of life

जीवन का मुख्य रहस्य 

The main secret of life



गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा, है और जो होगा  वो भी अच्छा ही होगा।

भगवान श्रीकृष्ण जी ने दूसरा सूत्र यह भी बताया है कि कर्म करते जाओ फल की चिन्ता न करो।
कभी आपने विचार किया है कि कैसे?

क्या वास्तव में आपके साथ जो हुआ वो अच्छा ही हुआ ?
या जो हो रहा है वो सब अच्छा ही हो रहा है?

क्या यह सम्भव है कि हम बिना फल की चिन्ता किये ही कर्म करते जाएं?
यदि नही तो इसका अर्थ ये हुआ कि हम सब लोग अपने कर्मों का सही निर्वाहन नही कर रहें हैं।

मनुष्य अक्सर नकारात्मक विचारों (Negetive Thoughts) का स्मरण करता है। जो भी गलत घटनाएं, विचार, अनुभव है, उनका ही वह स्मरण करता रहता है, और जो भी शुभ है अर्थात सफलता उपलब्धि आदि, उसका स्मरण नहीं करता। ये मनुष्य की मुख्य भूलों (Blunders) में से एक  है कि जो भी नकारात्मक (Negetive) है,उसका वह स्मरण करता है; और जो भी विधायक है,सकारात्मक(Positive) है, उसका स्मरण नहीं करता।

किसी को शायद ही वे क्षण याद आते हों, जब आप प्रेम से भरे हुए थे,या अत्यंत उत्साहित थे,जब अपने स्वास्थ्य की कोई बहुत अदभुत ( Amazing) अनुभूति ( Sensation) की थी,या किसी क्षण बहुत शांत हो गए थे।

लेकिन आपको वे स्मरण(Remember)रोज आएंगे जब आप क्रोधित या अशांत हुए थे,जब किसी ने आपका अपमान किया था, या आपने किसी से बदला लिया था। आप उन-उन बातों को निरंतर स्मरण करते हैं, जो घातक हैं,और उनका स्मरण शायद ही होता हो, जो कि आपके जीवन के लिए विधायक हो सकती हैं।


विधायक अनुभूतियों का स्मरण बहुत बहुमूल्य है। उन-उन अनुभूतियों को निरंतर स्मरण करना चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण तो यह होगा कि अगर आप विधायक अनुभूतियों को स्मरण करते हैं, तो उन अनुभूतियों के वापस पैदा होने की संभावना आपके भीतर बढ़ जाएगी।

जो आदमी घृणा की बातों को बार-बार याद करता हो, बहुत संभावना है,कि घृणा की कोई घटना उसके जीवन में बार-बार घटेगी। जो आदमी उदासी की बातों को बार-बार स्मरण करता हो, बहुत संभव है,कि उदासी बार-बार उसके करीब आएगी।
क्योंकि उसके एक तरह के झुकाव पैदा हो जाते हैं और वही बातें उसमें पुनरुक्त हो जाती हैं। ये जो भाव हैं, स्थायी बन जाते हैं और जीवन में उन-उन भावों का बार-बार पैदा हो जाना आसान हो जाता है।

इसको अपने भीतर विचार करें कि आप किस तरह के भावों को स्मरण करने के आदी हैं। हर आदमी स्मरण करता है। किस तरह के भावों को आप स्मरण करने के आदी हैं? और यह स्मरण रखें कि अतीत के जिन भावों को आप स्मरण करते हैं, भविष्य में आप उन्हीं भावों के घटनाओं के, बीजों को बो रहे हैं और उनकी फसल को काटेंगे। अतीत का स्मरण भविष्य के लिए रास्ता बन जाता है।

जो व्यर्थ है, जिसका कोई उपयोग नहीं है, उसे याद न करें। उसका कोई मूल्य नहीं है। अगर उसका स्मरण भी आ जाए, तो रुकें और उस स्मरण को कहें कि बाहर हो जाओ, तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है। कांटों को भूल जाएं और फूलों को स्मरण रखें।

"बीती ताहि बिसारिये आगे की सुधि लेय।।"

 कांटे बहुत हैं, लेकिन फूल भी हैं। जो फूलों को स्मरण रखेगा, उसके जीवन में कांटे क्षीण होते जाएंगे और फूल बढ़ जाएंगे। और जो कांटों को स्मरण रखेगा, उसके जीवन में हो सकता है, फूल विलीन हो जाएं और केवल कांटे रह जाएं।

हम क्या स्मरण करते हैं, वही हम बनते चले जाते हैं। जिसका हम स्मरण करते हैं, वही हम हो जाते हैं। जिसका हम निरंतर विचार करते हैं, वैसा ही वातावरण हमारे लिए तैयार हो जाता है, वह विचार हमें परिवर्तित कर देता है क्योंकि इस संसार मे विचार ही सार है।और हमारा प्राण हो जाता है। इसलिए शुभ, सद, जो भी आपको श्रेष्ठ मालूम पड़े, उसे स्मरण करें और आप पाएंगे कि वो सब आपको प्राप्त होता जा रहा है।
यही आकर्षण का सिद्धांत(Attraction of Low)) है।

इस ईश्वर प्रदत्त जीवन में--इतना दरिद्र जीव कोई  नहीं है कि उसके जीवन में कोई शांति के, आनंद के, सौंदर्य के, प्रेम के क्षण न घटित हुए हों। और अगर आप उनके स्मरण में समर्थ हो गए, तो यह भी हो सकता है कि आपके चारों तरफ अंधकार हो, लेकिन आपकी स्मृति में प्रकाश हो और इसलिए चारों तरफ का अंधकार भी आपको दिखायी न पड़े। यह भी हो सकता है, आपके चारों तरफ दुख हो, लेकिन आपके भीतर कोई प्रेम की, कोई सौंदर्य की, कोई शांति की अनुभूति हो और आपको चारों तरफ का दुख भी दिखायी न पड़े। यह संभव है, यह संभव है कि बिलकुल कांटों के बीच में कोई व्यक्ति फूलों में हो। इसके विपरीत भी संभव है। और यह हमारे ऊपर निर्भर है।

यह मनुष्य के ऊपर निर्भर है कि वह अपने को विचारों के साथ कहां स्थापित कर देता है,क्योंकि जो आज हमारे साथ घट रहा है हो यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम स्वर्ग में रहते हैं या नर्क में रहते हैं।

 स्वर्ग- नर्क कोई भौगोलिक स्थान नहीं हैं। वे मानसिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियां हैं। हममें से अधिकतर लोग दिन में कई बार नर्क में चले जाते हैं और कई बार स्वर्ग में आ जाते हैं। और हममें से कई लोग दिनभर नर्क में रहते हैं। और हममें से कई लोग स्वर्ग में वापस लौटने का रास्ता ही भूल जाते हैं। लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो चौबीस घंटे स्वर्ग में रहते हैं। इसी जमीन पर, इन्हीं स्थितियों में ऐसे लोग हैं, जो स्वर्ग में रहते हैं। आप भी उनमें से एक बन सकते हैं। कोई बाधा नहीं है, सिवाय कुछ सूत्रों/ नियमों को समझने के।

हमारे चित्त की स्थिति हम जैसी बनाए रखेंगे, यह दुनिया भी ठीक वैसी बन जाती है। न मालूम कौन-सा चमत्कार है कि जो आदमी भला होना शुरू होता है, यह सारी दुनिया उसे एक भली दुनिया में परिवर्तित हो जाती है। और जो आदमी प्रेम से भरता है, इस सारी दुनिया का प्रेम उसकी तरफ प्रवाहित होने लगता है।

और यह नियम इतना शाश्वत है कि जो आदमी घृणा से भरेगा, प्रतिकार में घृणा उसे उपलब्ध होने लगेगी। हम जो अपने चारों तरफ फेंकते हैं, वही हमें उपलब्ध हो जाता है। इसके सिवाय कोई रास्ता भी नहीं है।

तो हर समय उन क्षणों का स्मरण करें, जो जीवन में अदभुत थे, ईश्वरीय थे। वे छोटे-छोटे क्षण, उनका स्मरण करें और उन क्षणों पर अपने जीवन को खड़ा करें। और उन बड़ी-बड़ी घटनाओं को भी भूल जाएं, जो दुख की हैं, पीड़ा की हैं, घृणा की हैं, हिंसा की हैं। उनका कोई मूल्य नहीं है। उन्हें विसर्जित कर दें, उन्हें जीवन से हटा दें। जैसे सूखे पत्ते दरख्तों से गिर जाते हैं, वैसे जो व्यर्थ है, उसे छोड़ते चले जाएं; और जो सार्थक है और जीवंत है, उसे स्मरणपूर्वक पकड़ते चले जाएं। हर समय इसका सातत्य रहे। एक धारा मन में बहती रहे शुभ की, सौंदर्य की, प्रेम की, आनंद की।

तो आप क्रमशः पाएंगे कि जिसका आप स्मरण कर रहे हैं, वे घटनाएं बढ़नी शुरू हो गयी हैं। और जिसको आप निरंतर साध रहे हैं, उसके चारों तरफ दर्शन होने शुरू हो जाएंगे। और तब यही दुनिया बहुत दूसरे ढंग की दिखायी पड़ती है। और तब ये ही लोग बहुत दूसरे लोग हो जाते हैं। और ये ही आंखें और ये ही फूल और ये ही पत्थर एक नए अर्थ को ले लेते हैं, जो हमने कभी पहले जाना नहीं था। क्योंकि हम कुछ और बातों में उलझे हुए थे।
जब हम इस स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं तो बुरा शब्द ही हमारे लिए समाप्त हो जाता है, और फिर जो भी होता हैअच्छा ही होता है, और हम बिना किसी फल की इच्छा के कर्म करते चले जाते हैं।

कष्ट शान्ति के लिये मन्त्र सिद्धान्त

कष्ट शान्ति के लिये मन्त्र सिद्धान्त Mantra theory for suffering peace

कष्ट शान्ति के लिये मन्त्र सिद्धान्त  Mantra theory for suffering peace संसार की समस्त वस्तुयें अनादि प्रकृति का ही रूप है,और वह...