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Thursday, August 6, 2026

रुद्राभिषेक: अनुष्ठान नहीं, आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा Rudrabhishek: Not a ritual, but a journey from the soul to the divine

रुद्राभिषेक: अनुष्ठान नहीं, आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा

Rudrabhishek: Not a ritual, but a journey from the soul to the divine

एक वैदिक चिंतन

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


आज रुद्राभिषेक को लेकर समाज में दो प्रवृत्तियाँ समानांतर रूप से दिखाई देती हैं। एक ओर शास्त्रोक्त वैदिक परंपरा है, जिसमें मंत्र, विधि, श्रद्धा और आत्मचिंतन को प्रधानता दी जाती है। दूसरी ओर अनुष्ठानों को अधिक भव्य, आकर्षक और दृश्यात्मक बनाने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

समय के साथ परिवर्तन स्वाभाविक है, किन्तु प्रत्येक परिवर्तन यह प्रश्न भी पूछता है कि क्या हम मूल उद्देश्य को सुरक्षित रख पा रहे हैं?

मेरे विचार से यही प्रश्न आज रुद्राभिषेक के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है।

रुद्राभिषेक का उद्देश्य क्या है?

यदि रुद्राभिषेक को केवल भगवान शिव पर जल चढ़ाने का अनुष्ठान मान लिया जाए, तो उसका अर्थ बहुत सीमित रह जाएगा।

वास्तव में रुद्राभिषेक मनुष्य को स्वयं को जानने की साधना है।

शिवलिंग केवल पूजनीय देवस्वरूप ही नहीं, बल्कि परम चेतना और आत्मतत्त्व का भी प्रतीक माना गया है। उपनिषदों में आत्मा के सूक्ष्म, प्रकाशमय स्वरूप का वर्णन मिलता है। इसी दृष्टि से शिवलिंग हमें बाहर से भीतर की यात्रा करने की प्रेरणा देता है।

जब हम शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, तब केवल पत्थर का अभिषेक नहीं करते, बल्कि अपने अंतःकरण को पवित्र करने का संकल्प लेते हैं।

रुद्राभिषेक का सम्पूर्ण विधान एक जीवन-दर्शन है

शास्त्रोक्त रुद्राभिषेक में सबसे पहले श्रीगणेश, माता गौरी, भगवान कार्तिकेय, वीरभद्र, कुबेर, कीर्तिमुख, नागदेवता, नंदीश्वर तथा शिवगणों का पूजन किया जाता है। इसके पश्चात् भगवान महादेव के एकादश रुद्र, पंचाक्षर स्वरूप, द्वादश ज्योतिर्लिंग, अष्टदिकों में स्थित स्वरूपों तथा अन्य दिव्य रूपों की आराधना की जाती है।

यह हमें बताता है कि जीवन अकेले नहीं चलता। परिवार, समाज, प्रकृति, देवशक्तियाँ और समस्त सृष्टि परस्पर जुड़ी हुई हैं।

इसके बाद दूध, दधि, घृत, मधु, शर्करा और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, अबीर-गुलाल आदि अर्पित किए जाते हैं।

यह सब जीवन के सुख, समृद्धि, सौंदर्य, मधुरता और पूर्णता का प्रतीक है।

किन्तु अंत में भगवान शिव को भस्म अर्पित की जाती है।

यहीं रुद्राभिषेक का सबसे बड़ा संदेश छिपा है।

भस्म का संदेश

भस्म हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में चाहे जितना वैभव प्राप्त हो जाए, चाहे जितनी उपलब्धियाँ मिल जाएँ, चाहे जितना सम्मान और सुख मिल जाए—अंततः यह शरीर और इससे जुड़ी सभी वस्तुएँ नश्वर हैं।

भगवान शिव स्वयं भस्म धारण करते हैं। यह मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन के सत्य का बोध है।

भस्म हमें सिखाती है कि जीवन का आनंद लो, अपने कर्तव्यों का पालन करो, परिवार का सम्मान करो, धर्मपूर्वक धन अर्जित करो, किन्तु अहंकार और आसक्ति को अपने ऊपर शासन मत करने दो।

यही वैराग्य है और यही मोक्ष की दिशा है।

अनेकता से एकत्व

रुद्राभिषेक में हम अनेक देवताओं का पूजन करते हैं, किन्तु अंततः सब कुछ शिवमय हो जाता है।

यही सृष्टि का नियम है।

जीवन एक बिंदु से प्रारम्भ होता है, अनेक रूपों में विस्तार पाता है और अंततः उसी परम चेतना में विलीन हो जाता है।

रुद्राभिषेक इसी सत्य का सजीव प्रतीक है।

क्या रुद्राभिषेक केवल एक आयोजन बनता जा रहा है?

यहीं आज का सबसे बड़ा चिंतन है।

भव्य आयोजन, सुंदर सजावट, मधुर संगीत और भक्तिमय वातावरण श्रद्धा को बढ़ाएँ, तो उनका स्वागत है।

किन्तु यदि रुद्राभिषेक का मूल्य उसकी सजावट से तय होने लगे, यदि वैदिक मंत्रों की अपेक्षा मंच-सज्जा अधिक महत्वपूर्ण हो जाए, यदि कृत्रिम श्रृंगार ही श्रद्धा का मापदंड बन जाए, तो हमें रुककर विचार करना होगा।

धर्म का उद्देश्य लोगों को चमत्कृत करना नहीं, बल्कि उनके अंतःकरण को जागृत करना है।

यदि रुद्राभिषेक हमें शिव से नहीं, केवल दृश्य प्रभाव से जोड़ रहा है, तो उसके मूल उद्देश्य पर पुनर्विचार आवश्यक है।

हमारी विनम्र प्रार्थना

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर का विनम्र मत है कि रुद्राभिषेक को उसके वैदिक स्वरूप, शास्त्रीय मर्यादा और आध्यात्मिक संदेश के साथ समझा और कराया जाना चाहिए।

भगवान शिव का सपरिवार पूजन, वैदिक मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, श्रद्धापूर्वक अभिषेक और अंत में भस्म का स्मरण—यही मनुष्य को जीवन का वास्तविक ज्ञान प्रदान करता है।

यह लेख किसी परंपरा, किसी आचार्य या किसी संस्था की आलोचना नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में रुद्राभिषेक अपनी आत्मा खो दे और केवल एक आकर्षक धार्मिक आयोजन बनकर रह जाए।

यदि हम उसके बाहरी स्वरूप के साथ-साथ उसके भीतरी अर्थ को भी समझ लें, तो रुद्राभिषेक केवल पूजा नहीं रहेगा, बल्कि जीवन जीने की एक कला बन जाएगा।

निष्कर्ष

रुद्राभिषेक हमें सिखाता है—

  • जीवन एक बिंदु से प्रारम्भ होता है।
  • जीवन अनेक अनुभवों में विस्तार पाता है।
  • जीवन धर्मपूर्वक भोग का भी अवसर देता है।
  • अंततः सब कुछ भस्म होकर उसी परम शिव में विलीन हो जाता है।

इसीलिए रुद्राभिषेक का उद्देश्य केवल अभिषेक करना नहीं, बल्कि स्वयं को शिवत्व की ओर ले जाना है।

जब पूजा आत्मचिंतन बन जाती है, तब रुद्राभिषेक पूर्ण होता है।

जब जीवन शिवमय हो जाता है, तभी रुद्राभिषेक सफल होता है।

॥ हर हर महादेव ॥


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Wednesday, July 8, 2026

गुप्त नवरात्रि : साधना, आत्मशक्ति और देवी उपासना का दिव्य पर्व Gupt Navratri: A divine festival of meditation, self-power and worship of the Goddess

गुप्त नवरात्रि : साधना, आत्मशक्ति और देवी उपासना का दिव्य पर्व

Gupt Navratri: A divine festival of meditation, self-power and worship of the Goddess

✍️ आचार्य विजय कुमार शुक्ल 

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


गुप्त नवरात्रि क्या है?

भारतीय सनातन परम्परा में वर्ष भर चार नवरात्रियाँ आती हैं, जिनमें चैत्र और शारदीय नवरात्रि सर्वसाधारण के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं, जबकि आषाढ़ और माघ मास की नवरात्रियाँ गुप्त नवरात्रि के नाम से जानी जाती हैं।

"गुप्त" शब्द का अर्थ है—आंतरिक, एकांत या गोपनीय। इस नवरात्रि में बाह्य आडंबर से अधिक आत्मशुद्धि, मनोनिग्रह, मंत्र-जप, ध्यान और देवी साधना का विशेष महत्व माना गया है।


गुप्त नवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश

गुप्त नवरात्रि हमें यह सिखाती है कि वास्तविक शक्ति केवल बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि आंतरिक साधना, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण में निहित होती है।

जिस प्रकार बीज मिट्टी के भीतर रहकर वृक्ष बनने की तैयारी करता है, उसी प्रकार साधक भी मौन साधना के माध्यम से अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का आधार तैयार करता है।


देवी उपासना का महत्व

इन नौ दिनों में आदिशक्ति के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है। श्रद्धालु अपनी परम्परा और गुरु-परम्परा के अनुसार देवी के विविध रूपों का पूजन, मंत्र-जप और पाठ करते हैं।

शास्त्रों में शक्ति उपासना को—

  • आत्मबल की वृद्धि,
  • मानसिक स्थिरता,
  • आध्यात्मिक उन्नति,
  • और धर्ममय जीवन का आधार माना गया है।

साधना का वास्तविक स्वरूप

गुप्त नवरात्रि केवल विशेष अनुष्ठानों का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण का भी पर्व है।

इन दिनों श्रद्धानुसार—

  • प्रातः एवं सायंकाल देवी पूजन,
  • दुर्गा सप्तशती या देवी स्तोत्रों का पाठ,
  • मंत्र-जप,
  • सात्त्विक आहार,
  • ब्रह्मचर्य एवं संयम,
  • दान एवं सेवा

का विशेष महत्व माना गया है।


क्या केवल तांत्रिक साधना ही गुप्त नवरात्रि का उद्देश्य है?

आज अनेक लोग गुप्त नवरात्रि को केवल तांत्रिक साधना से जोड़कर देखते हैं, जबकि यह धारणा पूर्णतः उचित नहीं है।

यद्यपि कुछ विशिष्ट साधनाएँ गुरु के निर्देशन में की जाती हैं, किन्तु सामान्य श्रद्धालु भी पूर्ण श्रद्धा और शास्त्रोक्त विधि से देवी उपासना कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

शक्ति उपासना का मूल उद्देश्य सदैव आत्मकल्याण और लोककल्याण ही रहा है।


ज्योतिषीय दृष्टि

ज्योतिषीय परम्परा में गुप्त नवरात्रि को मनोबल, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करने का श्रेष्ठ अवसर माना गया है।

यदि किसी व्यक्ति के जीवन में मानसिक अशांति, भय, निर्णयहीनता या निराशा की स्थिति हो, तो इन दिनों श्रद्धापूर्वक देवी आराधना, मंत्र-जप और सत्कर्म उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकते हैं।


किन बातों का रखें विशेष ध्यान?

  • साधना सदैव श्रद्धा और शास्त्रसम्मत विधि से करें।
  • किसी भी विशेष मंत्र या अनुष्ठान को योग्य गुरु के मार्गदर्शन के बिना न करें।
  • अंधविश्वास और चमत्कार की अपेक्षा से बचें।
  • सात्त्विकता, विनम्रता और सेवा भाव बनाए रखें।
  • शक्ति का उपयोग सदैव धर्म और लोककल्याण के लिए करें।

निष्कर्ष

गुप्त नवरात्रि बाहरी प्रदर्शन का नहीं, बल्कि भीतर की शक्ति को जागृत करने का पर्व है। यह हमें स्मरण कराती है कि जब मन श्रद्धा, संयम और साधना से प्रकाशित होता है, तभी जीवन में वास्तविक शक्ति का उदय होता है।

माँ भगवती की कृपा से सभी साधकों के जीवन में धर्म, विवेक, आत्मबल, शांति और मंगल का प्रकाश फैले—इसी शुभकामना के साथ।

॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर

"ज्योतिष, धर्म एवं शास्त्रसम्मत परामर्श के माध्यम से जीवन को सही दिशा देने का विनम्र प्रयास।"

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गुप्त नवरात्रि : शक्ति साधना, आत्मशुद्धि और देवी उपासना का शास्त्रसम्मत पर्व Gupt Navratri: Scriptural festival of Shakti Sadhana, self-purification and Goddess worship


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गुप्त नवरात्रि : शक्ति साधना, आत्मशुद्धि और देवी उपासना का शास्त्रसम्मत पर्व Gupt Navratri: Scriptural festival of Shakti Sadhana, self-purification and Goddess worship

गुप्त नवरात्रि : शक्ति साधना, आत्मशुद्धि और देवी उपासना का शास्त्रसम्मत पर्व

Gupt Navratri: Scriptural festival of Shakti Sadhana, self-purification and Goddess worship 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

(देवीमाहात्म्य, मार्कण्डेय पुराण)

✍️ आचार्य विजय कुमार शुक्ल 

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


भूमिका

भारतीय सनातन परम्परा में नवरात्रि केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, साधना और आदिशक्ति की उपासना का पावन अवसर है। सामान्यतः चैत्र और शारदीय नवरात्रि सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, किन्तु आषाढ़ एवं माघ मास में आने वाली नवरात्रियाँ गुप्त नवरात्रि के नाम से जानी जाती हैं।

'गुप्त' शब्द का आशय केवल रहस्य या गोपनीयता नहीं है। इसका गूढ़ अर्थ है—अंतर्मुख होकर आत्मशुद्धि, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण की साधना करना। यही इस पर्व का वास्तविक स्वरूप है।


गुप्त नवरात्रि का शास्त्रीय आधार

यद्यपि "गुप्त नवरात्रि" शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख सभी प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता, तथापि देवीमाहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), देवीभागवत महापुराण तथा शाक्त तंत्रग्रंथों में शक्ति-उपासना, मंत्र-जप, देवी-पूजन और साधना का विस्तृत विधान वर्णित है।

शाक्त परम्पराओं में आषाढ़ और माघ मास को विशेष साधना का समय माना गया है। इसलिए गुप्त नवरात्रि का महत्व शास्त्र और परम्परा—दोनों के समन्वित अध्ययन से समझना चाहिए।


गुप्त नवरात्रि का वास्तविक उद्देश्य

आज अनेक लोग गुप्त नवरात्रि को केवल तांत्रिक साधना या रहस्यमय सिद्धियों से जोड़कर देखते हैं, जबकि शास्त्रीय दृष्टि इससे कहीं अधिक व्यापक है।

इस पर्व का मूल उद्देश्य है—

  • आत्मशुद्धि,
  • मन एवं इन्द्रियों का संयम,
  • देवी के प्रति श्रद्धा,
  • मंत्र-जप एवं ध्यान,
  • धर्ममय जीवन का अभ्यास,
  • तथा लोककल्याण की भावना।

शक्ति की उपासना का लक्ष्य अहंकार नहीं, आत्मबल है; चमत्कार नहीं, चरित्र का निर्माण है।


गुप्त नवरात्रि में शास्त्रोक्त विधान

गृहस्थ श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और परम्परा के अनुसार निम्न विधान कर सकते हैं—

  • शुभ मुहूर्त में घटस्थापना
  • देवी का आवाहन एवं संकल्प।
  • प्रतिदिन दीप, धूप, पुष्प एवं नैवेद्य से पूजन।
  • दुर्गा सप्तशती, देवी कवच अथवा अन्य देवी-स्तोत्रों का पाठ।
  • गुरु से प्राप्त मंत्र अथवा सामान्य देवी मंत्रों का जप।
  • यथाशक्ति हवन एवं पूर्णाहुति।
  • अन्नदान, सेवा और सत्कर्म।

यदि विस्तृत अनुष्ठान संभव न हो, तो भी श्रद्धा, सात्त्विकता और नियमित देवी-स्मरण से उपासना पूर्ण मानी जाती है।


दशमहाविद्याएँ और गुप्त नवरात्रि

गुप्त नवरात्रि का संबंध अनेक शाक्त परम्पराओं में दशमहाविद्याओं की उपासना से भी माना जाता है। महाकाली, तारा, त्रिपुरसुन्दरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला—ये आदिशक्ति के दस दिव्य स्वरूप हैं।

इनकी विशिष्ट साधनाएँ योग्य गुरु की दीक्षा और मार्गदर्शन में ही की जानी चाहिए। सामान्य श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक इनका स्मरण और पूजन कर सकते हैं।


गृहस्थ के लिए श्रेष्ठ साधना

यदि कोई साधक इन नौ दिनों में—

  • सत्य और मधुर वाणी का पालन करे,
  • सात्त्विक भोजन ग्रहण करे,
  • क्रोध, लोभ और अहंकार पर नियंत्रण रखे,
  • माता-पिता एवं गुरु का सम्मान करे,
  • निर्धनों की सहायता करे,
  • प्रतिदिन माँ भगवती का स्मरण एवं प्रार्थना करे,

तो यही गुप्त नवरात्रि की सर्वोत्तम साधना है।


प्रचलित भ्रांतियाँ

गुप्त नवरात्रि के संबंध में कुछ भ्रांतियों से बचना आवश्यक है—

  • यह केवल तांत्रिकों का पर्व नहीं है।
  • बिना गुरु के गूढ़ साधनाएँ नहीं करनी चाहिए।
  • किसी के अहित के उद्देश्य से किया गया कोई भी अनुष्ठान धर्मसम्मत नहीं है।
  • सोशल मीडिया पर बताए जाने वाले अप्रमाणित उपायों पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए।

व्यावहारिक संदेश

गुप्त नवरात्रि हमें सिखाती है कि यदि हम अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर पर विजय पाने का प्रयास करें, तो वही देवी की सच्ची आराधना है।

साधना का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपने विचार, व्यवहार और चरित्र को भी पवित्र बनाना है।


निष्कर्ष

गुप्त नवरात्रि बाहरी प्रदर्शन का नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा का पर्व है। यह हमें स्मरण कराती है कि जब मन श्रद्धा से भरता है, बुद्धि विवेक से प्रकाशित होती है और जीवन धर्म के मार्ग पर चलता है, तभी माँ भगवती की कृपा का वास्तविक अनुभव होता है।

"शक्ति की उपासना का सर्वोच्च फल अलौकिक सिद्धियाँ नहीं, बल्कि आत्मसंयम, निर्मल अंतःकरण और धर्ममय जीवन है।"


शास्त्रीय उद्धरण

भगवद्गीता (9.26)

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

भावार्थ: ईश्वर भक्ति से अर्पित किए गए सरलतम उपहार को भी प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हैं। उपासना में बाह्य वैभव नहीं, श्रद्धा ही प्रधान है।


सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥


शास्त्रीय टिप्पणी

इस लेख में प्रस्तुत जानकारी देवीमाहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), देवीभागवत महापुराण, भगवद्गीता तथा शाक्त परम्पराओं में उपलब्ध शास्त्रीय सिद्धांतों के आधार पर संकलित की गई है। विशिष्ट मंत्र, तांत्रिक साधना अथवा गूढ़ अनुष्ठान सदैव योग्य गुरु एवं आचार्य के मार्गदर्शन में ही करने चाहिए।


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Wednesday, May 27, 2026

एकादशी, प्रदोष व्रत, चतुर्थी, पूर्णिमा एवं अमावस्या व्रत कैलेंडर 2026-27 | संवत् 2083 सम्पूर्ण सूची Ekadashi, Pradosh Vrat, Chaturthi, Purnima and Amavasya Vrat Calendar 2026-27 | Samvat 2083 Complete List

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4. संवत् 2083 धार्मिक व्रत कैलेंडर: पूर्णिमा, अमावस्या, प्रदोष एवं गणेश चतुर्थी


5. हिन्दू पंचांग 2026-27: सभी प्रमुख व्रत और उपवास तिथियाँ



संवत् 2083 एवं सन् 2026-27 में आने वाली सभी एकादशी, प्रदोष व्रत, संकष्टी/चतुर्थी, पूर्णिमा और अमावस्या की सम्पूर्ण तिथि सूची देखें। धार्मिक व्रत, पूजा एवं शुभ मुहूर्त हेतु विस्तृत पंचांग जानकारी।



हिन्दू धर्म में एकादशी, प्रदोष व्रत, चतुर्थी, पूर्णिमा और अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व माना गया है। संवत् 2083 एवं वर्ष 2026-27 के लिए यहाँ सभी प्रमुख व्रतों एवं तिथियों की सम्पूर्ण सूची दी जा रही है, जिससे श्रद्धालुजन अपने व्रत, पूजा एवं अनुष्ठान की तैयारी सरलता से कर सकें।

श्री गणेश चतुर्थी व्रत 2026-27


एकादशी व्रत 2026-27


प्रदोष व्रत 2026-27


अमावस्या और पूर्णिमा 2026-27




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Monday, May 25, 2026

नवतपा 2026: क्या है नवतपा, इसका धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व Navtapa 2026: What is Navtapa, its religious, astrological and scientific significance

 

नवतपा 2026: क्या है नवतपा, इसका धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व



भारतीय संस्कृति में प्रकृति और ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मौसम के प्रत्येक परिवर्तन को केवल प्राकृतिक घटना नहीं माना, बल्कि उसे धर्म, ज्योतिष और मानव जीवन से भी जोड़ा। इन्हीं विशेष कालों में से एक है “नवतपा”

नवतपा वह समय होता है जब सूर्य की गर्मी अपने चरम पर होती है। यह केवल भीषण गर्मी का संकेत नहीं, बल्कि आने वाले मानसून, कृषि, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक साधना से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। लोकमान्यता है कि यदि नवतपा अच्छी तरह “तपे”, तो वर्षा भी अच्छी होती है।


नवतपा क्या है?

“नवतपा” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—

  • नव अर्थात नौ
  • तपा अर्थात तपन या गर्मी

अर्थात लगातार नौ दिनों तक पड़ने वाली तीव्र गर्मी को नवतपा कहा जाता है। यह तब प्रारम्भ होता है जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है।

भारतीय ज्योतिष में रोहिणी नक्षत्र को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जब सूर्य इस नक्षत्र में आता है, तब पृथ्वी पर तापमान तेजी से बढ़ता है और गर्मी अपने चरम पर पहुँच जाती है।


नवतपा 2026 कब से कब तक है?

वर्ष 2026 में नवतपा लगभग 25 मई 2026 से 2 जून 2026 तक रहेगा।
हालाँकि विभिन्न पंचांगों में समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।


नवतपा का ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य आत्मा, ऊर्जा और तेज का कारक ग्रह है। वहीं रोहिणी नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा हैं। सूर्य और रोहिणी का यह संयोग पृथ्वी पर अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है।

लोकज्योतिष में कहा गया है—

“रोहिणी तपे, तो सावन झरे।”

अर्थात यदि नवतपा के दिनों में तेज गर्मी पड़े, तो वर्षा अच्छी होने की संभावना बढ़ जाती है।

यदि इन दिनों:

  • बादल छाए रहें,
  • बारिश हो जाए,
  • या तापमान सामान्य रहे,

तो मानसून कमजोर माना जाता है।


नवतपा का धार्मिक महत्व

भारतीय परंपरा में नवतपा को तप, संयम और साधना का विशेष समय माना गया है। इस दौरान सूर्य उपासना और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है।

नवतपा में किए जाने वाले शुभ कार्य

  • सूर्य देव को अर्घ्य देना
  • गायत्री मंत्र का जप
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ
  • जल से भरे मटके दान करना
  • पंखा, छाता और शीतल वस्तुओं का दान
  • गरीबों और जरूरतमंदों को जल पिलाना
  • पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करना

धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि भीषण गर्मी में किसी प्यासे को जल पिलाना महान पुण्य का कार्य होता है।


नवतपा का वैज्ञानिक महत्व

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो नवतपा का सीधा संबंध मानसून से है। इस समय सूर्य की किरणें भारतीय भूभाग पर अधिक सीधी पड़ती हैं, जिससे भूमि अत्यधिक गर्म हो जाती है।

भूमि और समुद्र के तापमान में यही अंतर आगे चलकर मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है। इसलिए नवतपा की गर्मी को अच्छी वर्षा के लिए आवश्यक माना जाता है।


किसानों के लिए नवतपा का महत्व

ग्रामीण भारत में नवतपा को कृषि का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। किसान इन दिनों के तापमान और मौसम को देखकर आने वाली वर्षा का अनुमान लगाते हैं।

लोकमान्यताएँ

संकेत परिणाम
तेज लू चलना अच्छी वर्षा
अत्यधिक गर्मी भरपूर मानसून
बादल और बूंदाबांदी कमजोर वर्षा
धूल भरी आँधी मौसम परिवर्तन

नवतपा में स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखें?

क्योंकि यह वर्ष का सबसे गर्म समय माना जाता है, इसलिए स्वास्थ्य संबंधी सावधानियाँ बहुत आवश्यक हैं।

जरूरी सावधानियाँ

  • अधिक मात्रा में पानी पिएँ
  • दोपहर में धूप से बचें
  • हल्का और सुपाच्य भोजन करें
  • बेल का शरबत, सत्तू, छाछ और नींबू पानी लें
  • सिर ढककर बाहर निकलें
  • शरीर में पानी की कमी न होने दें

नवतपा में सूर्य उपासना के उपाय

यदि कुंडली में सूर्य कमजोर हो या आत्मविश्वास की कमी महसूस होती हो, तो नवतपा में सूर्य साधना विशेष फलदायी मानी जाती है।

सरल उपाय

  • प्रतिदिन तांबे के पात्र से सूर्य को जल अर्पित करें
  • “ॐ घृणि सूर्याय नमः” मंत्र का 108 बार जप करें
  • गेहूँ और गुड़ का दान करें
  • रविवार को लाल वस्त्र धारण करें

इन उपायों से आत्मबल, स्वास्थ्य और मान-सम्मान में वृद्धि होने की मान्यता है।



निष्कर्ष

नवतपा केवल भीषण गर्मी का समय नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, कृषि, मानसून और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। भारतीय परंपरा ने इसे मौसम परिवर्तन के साथ-साथ तप, संयम और सेवा का भी विशेष काल माना है।

इस समय यदि हम सूर्य उपासना, दान-पुण्य और स्वास्थ्य सावधानियों का पालन करें, तो यह अवधि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन ला सकती है।


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Monday, May 18, 2026

पुरुषोत्तम मास : भक्ति, पुण्य और आत्मशुद्धि का दिव्य अवसर purushottam mas

पुरुषोत्तम मास : भक्ति, पुण्य और आत्मशुद्धि का दिव्य अवसर 



सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व बताया गया है। इसे अधिक मास,मलमास भी कहा जाता है। यह मास भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित माना जाता है और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पुण्यदायी होता है। मान्यता है कि इस पवित्र मास में किए गए जप, तप, दान, पूजा और सेवा का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है।
पुराणों के अनुसार जब अन्य महीनों ने इस अतिरिक्त मास को स्वीकार नहीं किया, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” का सम्मान प्रदान किया। तभी से यह माह विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।


पुरुषोत्तम मास का महत्व

पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और सकारात्मक परिवर्तन का अवसर भी है।
इस महीने में व्यक्ति अपने जीवन के दोषों को दूर कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।

इस पावन मास में —
✅ पापों का क्षय होता है।
✅ मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
✅ परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है।
✅ भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए 

1️⃣ भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण की पूजा करें

प्रतिदिन भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या श्रीराम का पूजन करें। तुलसी अर्पित करें और दीप जलाएं।

2️⃣ मंत्र जाप करें

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का नियमित जाप अत्यंत शुभ माना गया है।

3️⃣ धार्मिक ग्रंथों का पाठ

गीता, विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भागवत कथा एवं रामचरितमानस का पाठ करें या सुनें।

4️⃣ दान-पुण्य करें

अन्नदान, 

वस्त्रदान, 

गौसेवा, 

जलसेवा एवं 

दीपदान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

5️⃣ व्रत एवं सात्विक जीवन अपनाएं

इस माह में सात्विक भोजन करें और मन, वचन एवं कर्म की शुद्धता बनाए रखें।

6️⃣ सेवा एवं सत्संग करें

जरूरतमंदों की सहायता करें और भजन-कीर्तन एवं सत्संग में भाग लें।


पुरुषोत्तम मास में क्या नहीं करना चाहिए 

❌ मांस, मदिरा एवं तामसिक भोजन का सेवन न करें।
❌ क्रोध, झूठ, चुगली एवं अपशब्दों से बचें।
❌ किसी का अपमान या दिल दुखाने वाले कार्य न करें।
❌ लोभ, अहंकार एवं अनैतिक कार्यों से दूर रहें।
❌ व्यर्थ विवाद और नकारात्मक विचारों से बचें।
❌ आलस्य एवं समय की बर्बादी न करें।


पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक संदेश

यह मास हमें सिखाता है कि जीवन में भक्ति, सेवा, संयम और सदाचार का कितना महत्व है।
यदि व्यक्ति इस माह में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान की आराधना करता है, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आते हैं।

“हरि स्मरण, हरि आराधन — पुरुषोत्तम मास में जीवन बने पावन।” 




प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर

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Thursday, February 26, 2026

होलिका दहन holika dahan 2026




 होलिका दहन 2026

संवत् 2082 में फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी के दिन अर्थात 02 मार्च 2026 को प्रदोष काल में पूर्णिमा और संपूर्ण रात्रि में भद्रा की व्याप्ति है। दूसरे दिन पूर्णिमा सूर्यास्त से पूर्व समाप्त हो रही है किंतु पूर्णिमा की व्याप्ति साढ़े तीन प्रहर से अधिक है और प्रतिपदा तिथि वृद्धि गामी है, इसलिए शास्त्रवचन के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा के दिन  अर्थात 03 मार्च 2026 को होना चाहिए था।
परंतु 3 मार्च के दिन ग्रस्तोदित चंद्र ग्रहण है और ग्रहण काल तथा प्रदोष से पूर्व ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है।
ऐसी स्थिति में धर्मसिंधु के अनुसार होलिका दहन पूर्व दिन ही करना चाहिए। 
दूसरे दिन में ग्रस्तोदय ग्रहण हो और प्रदोष काल में पूर्णिमा ना हो तो पूर्व दिन ही होलिका दहन पूजा करें।
साढे तीन प्रहर से अधिक पूर्णिमा और प्रतिपदा वृद्धिगामी होते हुए भी धर्मसिंधु में दिए हुए ग्रहण विचार के वचनानुसार होलिका दहन 02 मार्च 2026 को प्रदोष काल में करना शास्त्र सम्मत होगा।
इस दिन भद्रा सायंकाल 05:56 से मध्य रात्रि के बाद रात्रि शेष 29:29 मिनट अर्थात 03 तारीख की सुबह 05:29 तक रहेगी।
भद्रा के संबंध में शास्त्रों में लिखा गया है कि यदि भद्रा निशीथ काल अर्थात मध्यरात्रि के बाद तक रहे तो फिर भद्रा में ही प्रदोष के समय भद्रा का मुख छोड़कर होलिका का दहन करें।
इस वर्ष प्रदोष में भद्रा का मुख नहीं रहेगा इससे प्रदोष वेला में सूर्यास्त से 02 घंटे 24 मिनट तक या रात्रि में 26:37 से पूर्व होलिका दहन करना शास्त्रोक्त है।

भद्रा का पुच्छकाल 25:27 से 26:37 तक भी श्रेष्ठ रहेगा।

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Saturday, February 14, 2026

महाशिवरात्रि: आत्मबोध, साधना और शिवतत्व का महापर्व shivratri parva

 

🌙 महाशिवरात्रि : आत्मबोध, साधना और शिवतत्व का महापर्व



प्रस्तुतकर्ता: प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
सेवा, साधना, संस्कार और सनातन चेतना का आध्यात्मिक केंद्र।


महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का दिव्य अवसर है। 

यह रात्रि अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की यात्रा का प्रतीक है। 

शिव का अर्थ है — कल्याण, मंगल और चेतना तथा रात्रि का अर्थ है — अंतरमुखी साधना। 

इस प्रकार महाशिवरात्रि का भावार्थ है — चेतना के कल्याण की रात्रि।


🔱 शिव का तात्त्विक स्वरूप
भगवान शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक तत्व (Cosmic Consciousness) हैं। 

वे सृष्टि के मूल स्रोत हैं —
आदि योगी — योग विज्ञान के प्रथम गुरु
महाकाल — समय के भी अधिपति
नीलकंठ — विष को धारण करने वाले
औघड़ — माया और भोग से परे स्थित
डमरू नाद ब्रह्म का प्रतीक है, त्रिशूल त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) का नियंत्रण है और जटा में बहती गंगा शुद्ध चेतना का प्रवाह है।


🌑 महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य
शास्त्रों के अनुसार इस रात्रि पृथ्वी की ऊर्जा प्रवाह दिशा विशेष रूप से उत्तरमुखी होती है, जिससे ध्यान, साधना और तप की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। इसी कारण यह रात्रि योगियों, साधकों और तपस्वियों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है।
यह रात्रि हमें सिखाती है —
मौन का महत्व
आत्मचिंतन
इंद्रिय संयम
मन की शुद्धि
अहंकार का विसर्जन


🕉️ शिवलिंग का रहस्यात्मक अर्थ
शिवलिंग केवल एक पूज्य प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि और चेतना का संतुलन बिंदु है —
आधार = शक्ति (प्रकृति)
लिंग = शिव (चेतना)
अर्थात शिव-शक्ति का एकत्व ही सृष्टि का मूल आधार है।


🙏 व्रत और जागरण का वास्तविक भाव
व्रत का अर्थ केवल उपवास नहीं, बल्कि —
विचारों का उपवास
विकारों का त्याग
नकारात्मकता से विरक्ति
सत्संकल्प की स्थापना


जागरण का अर्थ है — अंतरचेतना का जागरण।
🌸 महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश
"शिव मंदिर में नहीं, चित्त में स्थित हैं।
शिव मूर्ति नहीं, मौन में प्रकट होते हैं।
शिव बाह्य नहीं, अंतरात्मा में अनुभव होते हैं।"


🕯️ आधुनिक जीवन में शिवतत्व की प्रासंगिकता
आज के तनावग्रस्त जीवन में शिव का स्वरूप हमें सिखाता है —
स्थिरता
धैर्य
वैराग्य
संतुलन
करुणा
मौन की शक्ति


🌼 उपसंहार
महाशिवरात्रि केवल पूजन का पर्व नहीं, यह आत्मिक जागरण का महापर्व है। यह रात्रि हमें बाह्य संसार से हटकर अंतर संसार की यात्रा कराती है। जब मन शांत होता है, अहंकार गलता है और चेतना स्थिर होती है — तभी शिव का साक्षात्कार होता है।
"शिव बाहर नहीं मिलते, शिव भीतर जागते हैं।
शिव खोज नहीं, अनुभूति हैं।
शिव साधना नहीं, स्वयं की पहचान हैं।"
🔱 हर हर महादेव 🔱


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
सनातन संस्कृति • आध्यात्मिक साधना • ज्योतिष • अनुष्ठान • सेवा
📿 शिवतत्व से जीवन शिवमय बने — यही हमारा उद्देश्य है

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Tuesday, September 2, 2025

चन्द्रग्रहण 2025 lunar eclipse 2025

 भारत में दृश्य खग्रास  चन्द्रग्रहण 

सितम्बर 2025 में होने वाले चन्द्रग्रहण का विवरण 




दिनांक 07 सितंबर 2025 भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा रविवार को भारतीय समयानुसार रात्रि 09 बजकर 57 मिनट से देर रात 01 बजकर 27 मिनट तक होने वाला खग्रास चन्द्रग्रहण संपूर्ण भारत में दिखाई देगा।
भारत के सभी शहरों व गांवों से इसका प्रारम्भ, मध्य तथा मोक्ष स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगा।


यह दक्षिण-पश्चिम की ओर से ग्रसित होकर उत्तर- पूर्व की ओर मोक्ष को प्राप्त होगा।


इस ग्रहण को भारत के साथ-साथ नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, तुर्की, इजरायल, सऊदी अरब समेत पूरा मिडिल ईस्ट,  

जिंबाम्बे, अंगोला, अल्जीरिया, मिश्र, सूडान समेत पूरा अफ्रीकी प्रायद्वीप,

यूक्रेन, फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड, ब्रिटेन, ग्रीस, नार्वे, स्वीडन समेत पूरा यूरोप,

रूस, कजाकिस्तान, कोरिया, थाईलैंड, जापान, म्यांमार, बैंकॉक, मलेशिया, फिलिपींस, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, चीन आदि पूर्वी देशों से (केवल उत्तरी व दक्षिण अमेरिका छोड़कर) अन्य सभी देशों से देखा जा सकेगा। 


सूतक - खग्रास चन्द्रग्रहण का सूतक दिन में 12 बजकर 57 मिनट से प्रारम्भ हो जाएगा। सूतक में बाल, वृद्ध, रोगी वह आसक्तजनों को छोड़कर अन्य किसी को भोजन शयनादि नहीं करना चाहिए।

यह ग्रहण पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र और कुम्भ राशि में हो रहा है अतः इनमें जन्म लेने वाले जातकों पर भारी अर्थात् कष्टकारी होता है।


इसके लिए यथाशक्ति दान पुण्य करना शुभ रहता है।

अतः ग्रहण स्पर्श के समय स्नान मध्य में हवन और पूजन तथा ग्रहण मोक्ष के समय श्रद्धा से अन्न,वस्त्र, धन आदि का दान और ग्रहण सर्वमुक्त होने पर पुनः स्नान करना चाहिए।


विशेष - ग्रहण के दिन रात्रि में स्नान- दानादि का निषेध नहीं होता है- 

चन्द्रग्रहणे तथा रात्रौ स्नानं दानं प्रशस्यते।।



सूर्य और चन्द्र ग्रहण विवरण सन् 2025-26 Solar and Lunar Eclipse Details 2025-26

सूर्य और चन्द्र ग्रहण विवरण सन् 2025-26

Solar and Lunar Eclipse Details 2025-26



३० मार्च २०२५ से १९ मार्च २०२६ तक विक्रम सम्वत् २०८२ में समस्त भूमण्डल पर दो सूर्यग्रहण तथा दो चन्द्रग्रहण होंगे।


जिनमें से भारतीय भूभाग पर ०७ सितम्बर २०२५ भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा रविवार को होने वाला खग्रास चन्द्रग्रहण तथा ०३ मार्च २०२६ फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा मंगलवार को होने वाला खग्रास चन्द्रग्रहण ही दिखाई देंगे।
जिनका सूतक तथा ग्रहण विधान माना जाएगा।


अन्य दो सूर्यग्रहण का भारत में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ये दोनों सूर्यग्रहण भारत में भी दिखाई देंगे।

Youtube link-

 http://youtube.com/post/UgkxqUKapZ9meM-ZUZ5TfWU9gNU6taJWPquP?si=ogePVGm7lVoPYvRi

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Monday, September 1, 2025

महालय श्राद्ध पक्ष 2025 mhalaya shradha paksha 2025

महालय श्राद्ध पक्ष 2025
mhalaya shradha paksha 2025

महालय श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) 7 सितंबर 2025 से शुरू होकर 21 सितंबर 2025 तक चलेगा।


यह पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन  कृष्ण अमावस्या तक रहता है। इस प्रकार इसमें कुल सोलह तिथियां होती हैं।


इस दौरान हर दिन विशेष श्राद्ध किया जाता है, जैसे कि पूर्णिमा श्राद्ध, प्रतिपदा श्राद्ध, द्वितीया श्राद्ध, भरणी श्राद्ध, मघा श्राद्ध इत्यादि।


अंतिम दिन को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है, जिस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती।


श्राद्ध 2025 में प्रमुख तिथियां निम्नलिखित हैं:-


पितृपक्ष की शुरुआत 7 सितंबर पूर्णिमा से होगी और 21 सितंबर को अमावस्या तिथि पर पितृपक्ष समाप्त होगा।


पूर्णिमा तिथि श्राद्ध - 7 सितंबर 2025 रविवार (दिन में 12:57 तक कर लें, उसके पश्चात ग्रहण का सूतक काल आरम्भ हो जाएगा)


पितृपक्ष 2025 में श्राद्ध की तिथियां


07 सितंबर 2025 रविवार पूर्णिमा श्राद्ध
08 सितंबर 2025 सोमवार प्रतिपदा श्राद्ध
09 सितंबर 2025 मंगलवार द्वितीया श्राद्ध
10 सितंबर 2025 बुधवार तृतीया व चतुर्थी श्राद्ध
11 सितंबर 2025 गुरुवार चतुर्थी/पंचमी व महा भरणी श्राद्ध
12 सितंबर 2025 शुक्रवार षष्ठी श्राद्ध
13 सितंबर 2025 शनिवार सप्तमी श्राद्ध
14 सितंबर 2025 रविवार अष्टमी श्राद्ध
15 सितंबर 2025 सोमवार नवमी श्राद्ध
16 सितंबर 2025 मंगलवार दशमी श्राद्ध
17 सितंबर 2025 बुधवार एकादशी श्राद्ध
18 सितंबर 2025 गुरुवार द्वादशी श्राद्ध
19 सितंबर 2025 शुक्रवार त्रयोदशी व मघा श्राद्ध
20 सितंबर 2025 शनिवार चतुर्दशी श्राद्ध
21 सितंबर 2025 रविवार सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध पितृ विसर्जन


श्राद्ध पक्ष की अवधि कुल 15 दिन की होती है और यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए महत्वपुर्ण माना जाता है। 

इस दौरान पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध के अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं, जिससे पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं।


Youtube पर देखें:- http://youtube.com/post/Ugkx0aI3_kpa9BXvxRA2mm20-mhZhx8S-ui7?si=wt4N7D7ADHeln-5Z

Wednesday, March 12, 2025

होलिका दहन 2025 शुभ मुहूर्त Holika Dahan 2025 auspicious time

होलिका दहन 2025 शुभ मुहूर्त





हिन्दू पञ्चाङ्ग के अनुसार होलिका दहन 13 मार्च 2025 गुरुवार को होगा।


होलिका दहन करने का शुभ मुहूर्त 13 मार्च को रात 11 बजकर 28 मिनट से लेकर देर रात 12 बजकर 06 मिनट तक है।




Tuesday, December 24, 2024

कुम्भ पर्व 2025 Kumbh parva 2025 कुम्भ मेला kumbh mela

 कुम्भ महापर्व का सुयोग प्रयागराज 



कुम्भ पर्व की पौराणिक कथा

एक बार देवताओं और राक्षसों ने मिलकर अमृत कलश के लिए समुद्र मंथन किया। जिसमें सबसे पहले विष निकला जिसे भगवान शंकर ने धारण किया। 

उसके बाद अन्य वस्तुऐं निकलती गई अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।

इस दौरान अमृत को पाने के लिए राक्षस दौड़े तो उस संघर्ष के दौरान अमृत की कुछ बूंदे प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक में गिर गए।

देवताओं ने भगवान विष्णु की सहायता से अमृत का पान किया और अमर हो गए।

तब से इन स्थानों पर कुम्भ पर्व मनाने का प्रचलन प्रारंभ हुआ। 


मकरे च दिवानाथे वृष राशि गते गुरौ।
प्रयागे कुम्भ योगो वै माघमासे विद्युछये।।

निरयन गति से भ्रमण करता हुआ सूर्य जब मकर राशि में तथा गुरु वृष राशि में होता है। 

तब माघ मास की अमावस्या के दिन तीर्थनायक प्रयागराज में श्री गंगाजी के तट पर कुम्भ योग का सुयोग बनता है।

पद्मपुराण के अनुसार संवत 2081 माघ कृष्ण प्रतिपदा मंगलवार 14 जनवरी सन 2025 से माघी शुक्ल पूर्णिमा बुधवार तारीख 12 फरवरी 2025 तक कुम्भ महापर्व का सुयोग चालू रहेगा।

वेद,पुराण,धर्मग्रंथ,श्री रामचरितमानस के व्रत पर्वोत्सवों का महत्वपूर्ण स्थान है।

मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष) की प्राप्ति बिना व्रत नियम आदि के कोई भी प्राणी प्राप्त नहीं कर सकता है।पर्वोत्सवों के बिना सब नीरस सा प्रतीत होने लगता है।


कुम्भ पर्व पर साधु,सन्यासी,योगीजन, तपस्वी, महात्मा, महामण्डलेश्वर अपने-अपने अनुयायी संरक्षकों के साथ मिलकर शाही स्नान करते हैं।

भविष्य पुराण के अनुसार कुम्भ पर्व पर जो नर नारी, सद्गृहस्थी, साधु, सन्यासी,महात्मा, तपस्वी, योगी,वैरागी मौनव्रत रहते हुए श्रीगंगा,यमुना, सरस्वती के पावन संगम, त्रिवेणीघाट,प्रयागराज में स्नान करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।जो सैकड़ों मील दूर रहते हुए भी जय गंगे मैय्या कहते हुए मगन होकर स्नान करता है वह पापमुक्त होकर श्रीविष्णुलोक को जाता है।


माघ मास में ऊनी वस्त्र कम्बल आदि दान करने का सहस्र गुणा अधिक पुण्यफल प्राप्त होता है।


ध्यान रखें:-त्रिवेणी संगम पर एक अक्षय वट वृक्ष है, जिसका कभी क्षय नही होता है।उसके दर्शन मात्र से प्राणी धन्य हो जाते हैं।वंश वृद्धि का संयोग बनता है।अतः वट वृक्ष के दर्शन/प्रणाम करके अवश्य आना चाहिए।

कुम्भ महापर्व का संयोग श्रीगंगा, यमुना, सरस्वती के संगम त्रिवेणी घाट प्रयागराज में 12 वर्ष बाद बनता है।

ऐसे परम पुण्य प्रदायक योगों में मेले बहुत लगते हैं।

कौन सा ऐसा प्राणी होगा जो पुण्यार्जन से चूक जाए।

ऐसे में जनसामान्य, सद्गृहस्थी महानुभाव स्त्री- पुरुष बालगोपाल दर्शन का लाभ प्राप्त करके अपने को धन्य समझें। सामान्य दिनों में स्नान आदि पुण्य अर्जन कर लिया करें।तो उनका भी उतना ही कल्याण हो सकता है जितना विशेष रूप से स्नान करने वाले जनों का।


कुम्भ महापर्व के प्रमुख स्नान दिन तथा सामान्य तिथियाँ


इस वर्ष माघ मकर संक्रांति के साथ प्रारम्भ होकर मकरान्त के साथ ही समाप्ति 12 फरवरी 2025 बुधवार को समाप्त हो जाएगा। ऐसा संयोग कई वर्ष बीतने के बाद बना है। चान्द्र  सौर मास एक साथ चल रहे हैं। माघ में स्नानादि के लिए पर्वदिन सुनिश्चित हैं।

●13 जनवरी 2025 सोमवार पौषी पूर्णिमा माघस्नान प्रारंभ


● 14 जनवरी 2025 मंगलवार मकरसंक्रांति, प्रथम शाही स्नान


● 17 जनवरी 2025 शुक्रवार गणेशचतुर्थी, सामान्य स्नान


● 25 जनवरी 2025 शनिवार षट्तिला एकादशी व्रत,सामान्य स्नान


● 29 जनवरी 2025 बुधवार मौनी अमावस्या द्वितीय शाही स्नान


● 02 फरवरी 2025 रविवार वसन्त पंचमी, तृतीय शाही स्नान


● 04 फरवरी 2025 मंगलवार भानुसप्तमी, सामान्य स्नान


● 08 फरवरी 2025 शनिवार जया एकादशी व्रत,सामान्य स्नान


● 12 फरवरी 2025 बुधवार माघी पूर्णिमा, सामान्य स्नान


● 26 फरवरी 2025 बुधवार महाशिवरात्रि सामान्य स्नान

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Friday, October 25, 2024

A reflection on the dilemma of Diwali festival 2024 दीपावली पर्व 2024 के असमंजस पर एक चिंतन

 A reflection on the dilemma of Diwali festival 2024
दीपावली पर्व 2024 के असमंजस पर एक चिंतन




इस वर्ष दीपावली पर्व पर जितनी अधिक चर्चा की गयी उतना ही अधिक संशय उत्पन्न होता चला गया।
इसलिए कुछ विचार और उनके साथ ही कुछ प्रश्न भी उत्पन्न हो गए, उन्ही के ऊपर अपने विचार व्यक्त करते हुए मैंने अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है।


जिस प्रकार सभी विद्वानों ने इस वर्ष दीपावली पूजन के विषय में अपने-अपने मत प्रस्तुत किए कि दीपावली किस आधार पर 31 अक्टूबर 2024 को माननी चाहिए और किस आधार पर 01 नवंबर 2024 को माननी चाहिए।


सभी विद्वत्जन किन्हीं ना किन्हीं धर्म ग्रंथो और उनमें दिए गए सूत्रों का आधार लेकर के बता रहे हैं।
जिससे यह स्पष्ट होता है कि अपनी-अपनी जगह पर दोनों ही ठीक है,क्योंकि धर्म शास्त्रों के सूत्र दोनों ही तरफ निर्णय दे रहे हैं।


अब मुख्य विषय यह है कि इनमें से कौन अधिक सही है यह निर्णय विद्वानों/पंचांगकर्ताओं/पंचांग के संपादकों को करना चाहिए था।
ना कि केवल अपना-अपना मत देना या अपना-अपना नजरिया बताने की आवश्यकता है।


चाहे वह विद्वत् परिषद हो, धर्मसभा हो, धर्मस्थल हो या व्यक्तिगत रूप से कोई भी ज्योतिष/आचार्य हो,
सभी को सम्मिलित रूप से अपना एक निर्णय देना चाहिए कि क्या 31अक्टूबर 2024 को दीपावली पर्व मानने पर 01 नवंबर 2024 को अंझा अर्थात् त्यौहार में एक दिन का अंतर/अंतराल/फासला/अवकाश रहेगा।
या फिर जन सामान्य इस बार दोनों ही दिन दीपावली पर्व को मनाकर माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करके और अधिक आनंदित/समृद्ध होंगे?

क्योंकि दीपावली पर्व तो धनतेरस से प्रारम्भ होकर द्वितीया तिथि तक चलता है।


एक प्रश्न और उठता है, कि पंचांगों का अस्तित्व यहां पर क्या रह जाता है?


कोई पंचांग 31 अक्टूबर को दीपावली बताता है तो कोई पंचांग 01 नवंबर 2024 को दीपावली पर्व बताता है,यही स्थिति विद्वानों की भी है, 

तो हमारे यहां ऐसा कोई साधन नहीं है?

जिससे यह स्पष्ट हो सके कि दीपावली पर्व वास्तव में कब है?


मेरे अपने मत के अनुसार तो कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या(दीपावली पर्व)को लेकर जितने भी सूत्र/शास्त्र वचन कहे गए हैं उन सबको एकत्र करके सभी विद्वानों/धर्म परिषद/सभाओं को स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए और उसका स्पष्ट रूप से पालन होना चाहिए।


और फिर उन निर्देशों पर सबसे पहले पंचांगकर्ताओं/पंचांग संपादक गण को ध्यान देना होगा।


जिससे पंचांग जब प्रकाशित हो तभी सारे व्रत-पर्व स्पष्ट हों जिससे जनमानस में किसी भी व्रत-पर्व आदि को लेकर किसी भी प्रकार की भ्रांति उत्पन्न न हो।


और पंचांग की स्थिति भी स्पष्ट रहे।
हमारे समाज में तिथि/व्रत/पर्व आदि के निर्णय में मुख्य निर्णायक भूमिका पंचांग की ही होनी चाहिए।


मैंने जनसामान्य की भूमिका में अपना विचार व्यक्त किया है,अगर कोई त्रुटि हुई हो तो विद्वत् जन मुझे क्षमा करेंगें।


वैसे मैं तो दोनों ही दिन दीपावली पर्व पर पूजन करूँगा, अखण्ड दीप स्थापन करके माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सार्थक प्रयास करूंगा।

और ऐसा ही सबको करने के लिए प्रेरित भी करुंगा।


निवेदन है कि सभी त्यौहारों को उनके वास्तविक स्वरूप में श्रद्धा के साथ एकजुट होकर मनाएं।और देवकृपा के लाभार्थी बने।


।।जय श्री कृष्ण।।

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माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस बार दो दिन मनाएं दीपावली पर्व

दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष प्रदोष व्यापिनी अमावस्या को मनाई जाती है। 

इस वर्ष संवत् 2081 में कार्तिक अमावस्या 31.10 .2024 गुरुवार को दिन में 03:54 से प्रारंभ होकर अगले दिन 01 .11.2024 शुक्रवार को सायंकाल 06:17 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।


इस स्थिति में अमावस्या तिथि दोनो ही दिन प्रदोष काल में व्याप्त रहेगी।


कुछ ग्रंथकारों के अनुसार यदि कार्तिक मास की अमावस्या दोनों ही दिन प्रदोष काल में व्याप्त हो,तो ऐसी स्थिति में प्रतिपदा युक्त अमावस्या का ग्रहण करना अधिक श्रेष्ठ होता है।
इस तर्क के पीछे कारण पितृ कार्य भी है पितृ देव पूजन करने के बाद ही लक्ष्मी पूजन करना उचित कहा गया है।


पितृ देव पूजन से तात्पर्य है प्रातः काल में अभ्यंग स्नान, देव पूजन और अपराह्न में पार्वण कर्म,तत्पश्चात लक्ष्मी पूजन।


यदि दीपावली एक दिन पूर्व अर्थात 31 अक्टूबर को मनाई जाए तो यह सभी कर्म लक्ष्मी पूजन के बाद होंगे जो विपरीत दिशा निर्देश है। 


कारण  31 अक्टूबर 2024 को दोपहर बाद 03:54 मिनट से अमावस्या तिथि प्रारंभ हो रही है इसलिए यह कार्य शास्त्रोक्त नहीं होगा अतः दूसरे दिन ही अर्थात् 01नवम्बर 2024को दीपावली का पर्व शास्त्र नियम के अधीन मानना उचित रहेगा,ऐसा कुछ पंचांगकर्ताओं का मत है।


किन्तु यह सारे नियम व्यापारियों और जन सामान्य को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।
कार्तिक अमावस्या की रात्रि साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।


कार्तिक अमावस्या की रात्रि में निशीथ कालीन वेला में साधक विशेष आराधनाएं,मंत्रानुष्ठान, पाठकर्म, श्रीयन्त्र आदि का निर्माण,यंत्रों की प्रतिष्ठा,महालक्ष्मी की विशेष पूजा आदि करते हैं।
उनके मत के अनुसार रात्रिकालीन अमावस्या ही श्रेष्ठ है।


तो ऐसी स्थिति में  उनके लिए 31 अक्टूबर 2024 को ही दीपावली पर्व मनाना उचित रहेगा।


इस प्रकार अलग अलग मतानुसार दोनों ही दिन लक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ माना जाएगा।


यह विशेष बात है कि इस बार हमें दो दिन लक्ष्मी पूजन के प्राप्त होंगें।


इसे माता लक्ष्मी की कृपा समझें और श्रद्धाभाव से पूजनलाभ प्राप्त करें न कि किसी संसय में पड़े।



दीपावली पर्व का विवरण:-


29/10/2024 भौम प्रदोष व्रत, धनतेरस, यमदीपदान, धन्वंतरि जयंती पर्व।


30/10/2024 मास शिवरात्रि, नरक चतुर्दशी, दीपदान।


31/10/2024 हनुमद्दर्शन,प्रदोष काल में लक्ष्मी गणेश स्थापना पूजन,दीपावली पर्व,(अखण्ड दीप स्थापन करें) रात्रिकालीन साधना।


01/11/2024 प्रदोष काल में पुनः लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका (अखण्ड दीप स्थापन पूर्ण)।


02/11/2024 अन्नकूट, गोवर्धन पूजा, बलि पूजा।


03/11/2024 भाई दूज,यमद्वितीया, चित्रगुप्त पूजा, चन्द्र दर्शन।

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Tuesday, June 25, 2024

Shukra Uday 2024 शुक्र उदय कब होंगे?

Shukra Uday 2024

Shukrodaya 2024

शुक्र उदय कब होंगे?
वास्तव में शुक्र उदय कब होगा?
शुक्र उदय का निर्णय पञ्चांग के आधार पर या गूगल के आधार पर?
शुक्र उदय 2024 में किसका निर्णय सही है?





Shukra Uday 2024

Shukroday 2024


इस बार गर्मियों में विवाह प्रस्तावों और सभी संस्कारों पर यकायक रोक लग गई कारण गुरु और शुक्र ग्रह एक के बाद एक अस्त हो गए।

क्योंकि गूगल पर सर्च करने पर लोगों को कई अलग-अलग तारीखों की जानकारी मिल रही है, जैसे-कहीं पर 28 या 29 जून 2024 को शुक्र ग्रह का उदय बताया गया है।तो कहीं पर 02 जुलाई 2024 को तो कहीं पर 07 जुलाई 2024 को।

यह सारी जानकारी तथाकथित आचार्यो के द्वारा ही डाली गई है,ऐसा माना जाएगा क्योंकि गूगल के पास अपना तो कुछ है ही नहीं, वो तो आपके सर्च करने पर वही दिखाता है जो जानकारी उस विषय पर लोगों के द्वारा दी गई है।

अब बात करें इंटरनेट पर जानकारी की तो हम इनमे से किसी भी तारीख को सही मान लेते हैं और इंटरनेट के ही एक अंग ज्योतिष एप या सॉफ्टवेयर पर देखने में क्यों अंतर हो रहा है?
आप स्वयं देखिए कि शुक्र उदय गूगल पर दिखाई तारीखों पर क्या हम उसी तारीख की जन्मपत्री किसी भी एप पर देखेंगे तो शुक्रास्त ही दिखेगा,ऐसा कैसे सम्भव है?
क्या आपके पास इसका कोई जवाब है?
जबकि पञ्चाङ्ग में जो निर्णय दिया गया है वो गूगल पर नही दिखता।
इससे या तो पञ्चाङ्ग का महत्व ही नहीं रहा या तो फिर वो अपडेट नही किये गए।
जबकि कुछ समय पहले तक सारा निर्णय पञ्चाङ्ग से ही होता रहा है।

अब शुक्र का उदय होने जा रहा हैं। पञ्चाङ्ग निर्णय के अनुसार 05 जुलाई 2024 को शुक्र उदय होंगे और 08 जुलाई जो शुक्र का बालत्व समाप्त हो जाएगा।

शास्त्रों में पञ्चाङ्ग का बड़ा महत्व बताया गया है,नववर्ष आरम्भ में पञ्चाङ्ग श्रवण का शुभफल प्राप्त होता है।

मेरा उन सभी महानुभाव ज्योतिषाचार्य महोदय से अनुरोध है,कि जो लोग मुख्य भूमिका में हैं बड़े-बड़े संस्थानों का संचालन कर रहे हैं उन्हें अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि सर्व सम्मति से निर्णय दें।
क्योंकि जनसाधारण आचार्यगण तो अनुसरण ही करते हैं, उनकी स्थिति उन्हें उस परिवेश से बाहर नहीं निकलने देती है।
अन्यथा इस प्रकार के कन्फ्यूजन हमारी संस्कृति पर आघात करते हैं, कारण किसी को भी तथ्य समझने की आवश्यकता नहीं है उनके पास समय ही नहीं है।
अतः आप सभी से अनुरोध है कि अपनी संस्कृति को बचाए रखने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।

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Wednesday, January 10, 2024

स्मार्त और वैष्णव smart aur vaishnav

स्मार्त और वैष्णव

आज हम जानेंगें स्मार्त और वैष्णवमत के बारे में-


● स्मार्त और वैष्णव में क्या अंतर है?
● आप स्मार्त हैं या वैष्णव?
● स्मार्त और वैष्णव का भेद।


जब भी किसी त्यौहार की बात आती है तो स्मार्त और वैष्णव शब्द भी आता है।क्योंकि हमारे पञ्चाङ्ग में लगभग सभी व्रत और त्यौहारों का निर्णय स्मार्त और वैष्णव के आधार पर दिया जाता है इस प्रकार अधिकतर त्यौहार दो दिन के हो जाते हैं।


लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि स्मार्त और वैष्णव में क्या अंतर है तो आज हम आपको बताएंगे कि स्मार्त किसे कहते हैं और वैष्णव किसे कहते हैं?


● सामान्य सांसारिक नियमों को मानकर गृहस्थ आश्रम का पालन करने वाले अर्थात् सभी गृहस्थी जन स्मार्त कहे जातें हैं।श्रुति-स्मृतियों में विश्वास,वेद पुराण आदि का पठन-पाठन एवं श्रवण करने वाले लोग, पांच देवों(सूर्य,गणेश, शिव, विष्णु, दुर्गा) की उपासना करने वाले अर्थात् पञ्चदेवोपासक,भगवान शिव का पूजन करने वाले सभी स्मार्त कहे जाते हैं।


गृहस्थी स्त्रियों को हमेशा स्मार्तमत के अनुसार व्रत त्यौहार मनाने चाहिए।


● वैष्णव उन्हें कहते हैं जो भगवान विष्णु के उपासक हैं।अपने माथे पर वैष्णव संप्रदाय के अनुसार तिलक धारण करते हैं, भुजाओं पर जिन्होंने शंख-चक्र आदि चिन्ह तप्त मुद्रा से अंकित करवा रखे हैं,अथवा जिन्होंने वैष्णव धर्मगुरु से दीक्षा ली हुई होती है और उनके द्वारा बताये गए नियमों का कठोरता से पालन करते हैं।

साधु-सन्यासी, योगी, तथा विधवा स्त्रियां भी वैष्णव मत के अनुसार त्यौहार व्रत आदि किया करते हैं।



Tuesday, January 2, 2024

खरमास kharmas

खरमास

सनातन धर्म में खरमास का विशेष महत्व है। इसमें किसी भी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों का अभाव हो जाता है। खरमास के प्रारंभ होते ही हर प्रकार के मांगलिक कार्य भी स्थगित कर दिए जाते हैं।

आइए आज हम जानते हैं क्या होता खरमास और क्या है इसका महत्व....

सूर्य के धनु या फिर मीन राशि में गोचर करने की अवधि खरमास कहलाती है।
कुछ लोग खरमास और मलमास को एक ही समझते हैं, ऐसा नहीं है।
खरमास के दौरान नियमों का पालन करना जरूरी होती है।इस दौरान कुछ चीजों का उल्लेख किया गया है कि क्या करें और क्या न करें?

खरमास में क्या करें-

● खरमास के दिनों में भगवान भास्कर की पूजा और उपासना करने से साधक को सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

● कहा गया है कि खरमास में भगवान विष्णु की पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है। साथ ही घर में यश-वैभव का आगमन होता है।

● धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि इन दिनों में गौमाता, गुरुदेव,सन्तजनों की सेवा और पुराणों का श्रवण करना चाहिए इससे शुभ फल की प्राप्ति होती है।

● खरमास के दौरान नियमित रूप से भगवान भास्कर को लाल रंग युक्त जल का अर्ध्य दें। साथ ही, सूर्य मंत्र का जाप करना लाभदायी है।

● खरमास में गरीबों और जरूरतमंदों को सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करें।

खरमास में क्या न करें-

● इस समयकाल में मांगलिक कार्य नही होते हैं,इसलिए इन दिनों में कोई भी शुभ कार्य न करें।

● तामसिक भोजन से बचें।

● किसी से वाद-विवाद न करें।

● खरमास में बेटी या बहू की विदाई नहीं करनी चाहिए।

●कारोबार/व्यवसाय का श्रीगणेश न करें।

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Wednesday, September 21, 2022

हरितालिका व्रत haritalika vrat

हरितालिका व्रत

हरितालिका व्रत को हरितालिका तीज या तीजा भी कहते हैं। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को किया जाता है।इसमें हस्त नक्षत्र का संयोग अतिउत्तम होता है।हरितालिका व्रत में तृतीया तिथि में द्वितीया तिथि का योग निषेध और चतुर्थी तिथि का योग श्रेष्ठ होता है।अतः तृतीया तिथि मुहूर्त मात्र हो तो भी परा तिथि ग्रहण की जाती है।



शास्त्र में इस व्रत के लिए सधवा, विधवा,सबको आज्ञा है।
यह व्रत करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है क्योंकि जहां करवाचौथ में चन्द्र देखने के उपरांत व्रत सम्पन्न कर दिया जाता है, वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत सम्पन्न जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।

हरितालिका तीज व्रत विधि-विधान

सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियाँ मनोवांछित वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव-शंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी-शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं फिर स्नानादि कर श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी-शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
उनका स्थापन पूजन धूप दीप नैवेद्य आदि से पूजन करें।और निराहार रहें।दूसरे दिन पूर्वाह्न में पारणा करके व्रत का समापन करे।8 या 16 युग्म ब्राह्मणों को भोजन करावे। 16 सौभाग्य द्रव्य और वस्त्रादि दे।फिर स्वयं भोजन करें।
इसी दिन हरिकाली, हस्तगौरी और कोटीश्वरी आदि व्रत भी होते हैं इन सबमें पार्वती जी के पूजन का प्राधान्य है और विशेषकर इनको स्त्रियां करती हैं।

व्रत की अनिवार्यता

इस व्रत की पात्र कुमारी कन्याएँ व सुहागिन महिलाएँ दोनों ही हैं परन्तु एक बार व्रत रखने उपरांत जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखना होता है। यदि व्रती महिला गंभीर रोग की स्थिति में हो तो उसके स्थान पर दूसरी महिला या उसका पति भी इस व्रत को रख सकता है ऐसा विधान कहा गया है।

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Sunday, August 7, 2022

शिवोपासना या रुद्राभिषेक shivopasana rudrabhishek

 शिवोपासना या रुद्राभिषेक




शिव की उपासना के लिए कहा गया है

"जगतः पितरौवन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ"

शिव शब्द स्वयं कल्याण वाचक है।यह शिवशक्ति दोनों का उद्बोधक भी है।शिव उच्चारण करने मात्र से विश्व के उत्पादक-पालक एवं संहारक प्रकृति पुरुषात्मक ब्रह्म का स्मरण हो जाता है।

भगवान शिव तो विश्वरूप है उनका ना कोई स्वरूप है ना कोई चिन्ह है ऐसी अवस्था में उनका पूजन कहां और कैसे किया जाए? क्योंकि पृथ्वी जल वायु तेज आकाश सूर्य चन्द्रमा आत्मा आदि सभी में शिव तत्व विद्यमान है।

चिन्तन करने पर यह समझ में आता है कि सभी में एक गोलाकृति का गुण समान रूप से विद्यमान है। अतएव उसी आकृति को चिन्ह मानकर कर उसे शिवलिंग कह कर उसकी उपासना आरम्भ हो गयी। क्योंकि शिव ने सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु दोनों को इसी रूप में दर्शन कराया था।

इसलिए संसार में लिङ्गोपासना के विविध विधान बताए गए हैं। चारों वेदों में यजुर्वेद यजन का प्रतीक है। इसी से प्रायः सभी वैदिक उपासनाएँ संपन्न होती हैं।

वैदिक-विधान में प्रायः रुद्राष्टाध्यायी का ही प्रयोग प्रचिलित है।इसका पाठ कई प्रकार से करते हुए भक्तजन शिवोपासना करते हैं।

वे अवघड़दानी महेश्वर एक ॐ के उच्चारण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं फिर वेद स्तुति करने वालों को क्या फल देंगे।अर्थात् उनकी सभी मनोकामनाओं को सहज ही पूर्ण कर देते हैं।

सर्वदोष नाश और मनोकामना पूर्ति  के लिये रुद्राभिषेक विधान

वेदों में कहा गया है कि शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है। क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं।

हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ विधान माना गया है। रूद्र शिव जी का ही एक स्वरूप हैं। रुद्राभिषेक मंत्रों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में भी किया गया है। शास्त्र और वेदों में वर्णित हैं की शिव जी का अभिषेक करना परम कल्याणकारी है।

शिव के मस्तक पर किए किया जाने वाला घटाभिषेक अग्नि द्वारा सोमपान का ही रूपक है प्रत्येक शरीर के भीतर प्रकृति की ओर से यह अभिषेक हो रहा है जब तक यह अभिषेक चल रहा है तब तक शिवत्व है। जहां यह बंद हुआ तभी शिव यम हो जाता है और संहारक बन जाता है।

शिवार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पातक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।

रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।

वैसे तो रुद्राभिषेक किसी भी दिन किया जा सकता है परन्तु त्रयोदशी तिथि,प्रदोष काल और सोमवार को रुद्राभिषेक करना परम कल्याणकारी है। श्रावण मास में किसी भी दिन किया गया रुद्राभिषेक अद्भुत व शीघ्र फल प्रदान करने वाला होता है।

रुद्राभिषेक क्या है ?

अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ है – स्नान करना अथवा कराना। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान रुद्ररूप शिव को कराया जाता है।

वर्तमान समय में अभिषेक रुद्राभिषेक के रुप में ही विश्रुत है। अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है रुद्राभिषेक। वैसे भी अपनी जटा में गंगा को धारण करने से भगवान शिव को जलधाराप्रिय कहा गया है।

रुद्राभिषेक क्यों किया जाता हैं?

रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते है उसका कारण हम सब स्वयं ही है हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं।

रुद्राभिषेक का आरम्भ कैसे हुआ ?

प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जब अपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है।

परन्तु ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि अन्त जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो हार मान लिया और लिंग का अभिषेक किया, जिससे भगवान प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक का आरम्भ हुआ।

जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है वह विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है उसे शीघ्र ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

जो व्यक्ति जिस कामना की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक करता है वह उसी प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करता है अर्थात यदि कोई पशु/वाहन प्राप्त करने की इच्छा से रुद्राभिषेक करता है तो उसे दही से अभिषेक करना चाहिए।

यदि कोई रोग दुःख आदि व्याधियों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे कुशा के जल से अभिषेक करना या कराना चाहिए।

रुद्राभिषेक पाठ एवं उसके भेद

शास्त्रों और पुराणों में पूजन के कई प्रकार बताये गए है लेकिन जब हम शिव लिंग स्वरुप महादेव का अभिषेक करते है तो उस जैसा पुण्य अश्वमेघ जैसे यज्ञों से भी प्राप्त नही होता  है।

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते हैं । संसार में ऐसी कोई वस्तु , कोई भी वैभव , कोई भी सुख , ऐसी कोई भी वास्तु या पदार्थ नही है जो हमें अभिषेक से प्राप्त न हो सके! वैसे तो अभिषेक कई प्रकार से बताये गये है ।यथा-

(1) रूपक या षडंग पाठ - रूद्र के छः अंग कहे गये है इन छह अंग का यथा विधि पाठ षडंग पाठ कहा गया है ।

इस प्रकार - सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी के दस अध्यायों का पाठ रूपक या षडंग कहलाता है ।

(2) रुद्र या एकादिशिनि - रुद्राध्याय की ग्यारह आवृति को रुद्र या एकादिशिनी कहते है रुद्रो की संख्या ग्यारह होने के कारण ग्यारह अनुवाद में विभक्त किया गया है।यह नमक-चमक के नाम से भी प्रसिद्ध है।

(3) लघुरुद्र- एकादिशिनी  की ग्यारह आवृतियों के पाठ को लघुरुद्र कहा गया है।यह लघु रूद्र अनुष्ठान एक दिन में ग्यारह ब्राह्मणों का वरण करके एक साथ संपन्न किया जा सकता है । तथा एक ब्राह्मण द्वारा अथवा स्वयं ग्यारह दिनों तक एक एकादिशिनी पाठ नित्य करने पर भी लघु रूद्र संपन्न होता है।

(4) महारुद्र -- लघु रूद्र की ग्यारह आवृति अर्थात एकादिशिनी रुद्री का 121 आवृति पाठ होने पर महारुद्र अनुष्ठान होता है । यह पाठ ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा 11 दिन तक कराया जाता है ।

(5) अतिरुद्र - महारुद्र की 11 आवृति अर्थात एकादिशिनी रुद्री का 1331 आवृति पाठ होने से अतिरुद्र अनुष्ठान संपन्न होता है ये (1)अनुष्ठानात्मक 

(2) अभिषेकात्मक 

(3) हवनात्मक , तीनो प्रकार से किये जा सकते है शास्त्रों में इन अनुष्ठानो का अत्यधिक महत्व और पुण्य लाभ बताया गया है।

रुद्राभिषेक से लाभ

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

रुद्राभिषेक अनेक पदार्थों से किया जाता है और हर पदार्थ से किया गया रुद्राभिषेक अलग फल देने में सक्षम है जो की इस प्रकार से बताया गया है-

◆जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि होती है।

◆कुशा जल से अभिषेक करने पर रोग, दुःख आदि व्याधियों का निवारण होता है।

◆दही से अभिषेक करने पर पशु,भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

◆गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

◆मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर धन वृद्धि के लिए। 

◆तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

◆इत्र मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट होते हैं ।

◆दुग्ध से अभिषेक करने से पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण होती है।

◆गंगाजल से अभिषेक करने से ज्वर ठीक हो जाता है।

◆दुग्ध शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।

◆घी से अभिषेक करने से वंश का विस्तार होता है।

◆सरसों के तेल से अभिषेक करने से रोग तथा शत्रु का नाश होता है।

◆शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से पाप क्षय अर्थात् पापों का निवारण होता है।तथा कोष की प्राप्ति होती है।

नाना प्रकार के शिवलिंग का पूजन-

शिवजी को अनन्त मानते हुए उनका पूजन विभिन्न वस्तुओं एवं नाना प्रकार के लिगों पर होता है।

◆चांदी के लिंग का पूजन करने से पितरों की मुक्ति होती है। ◆स्वर्ण लिंग से वैभव एवं सत्य लोक की प्राप्ति होती है।

◆ताम्र एवं पीतल के लिंग से पुष्टि एवं कांसे के लिंग से सुंदर यश की प्राप्ति होती है।लौह लिंग से मारण सिद्धि होती है। ◆स्तंभन के लिए हल्दी का लिंग, आयु-आरोग्यता के लिए शीशे के लिंग का पूजन करना शुभ फलदायी होता है। 

◆रत्न लिंग श्रीप्रद होता है।

◆गोमय से निर्मित लिंग का स्वयं पूजन करने से अतुल ऐश्वर्य प्राप्त होता है, किंतु दूसरे के लिए करने पर मारक होता है। इसी प्रकार से और भी अनेक अनेक प्रकार के लिंगो का वर्णन मिलता है। इनका अर्चन विभिन्न कामनाओं के लिए किया जाता है। इस पर भी पार्थिवेश्वर का पूजन सर्वप्रचिलित एवं शुगम बताया गया है इससे चतुर्वर्ग की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूज अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति होती है।

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