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Saturday, July 4, 2026

त्योहार दो दिन क्यों पड़ने लगे हैं? (सरल शास्त्रीय कारण) Why are festivals falling on two days? (Simple Scriptural reasons)

त्योहार दो दिन क्यों पड़ने लगे हैं? (सरल शास्त्रीय कारण)

Why are festivals falling on two days? (Simple Scriptural reasons)

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


परिचय

पिछले कुछ वर्षों में एक बात अक्सर देखने को मिलती है—त्योहार दो अलग-अलग दिनों में मनाए जा रहे हैं। कभी जन्माष्टमी दो दिन, कभी एकादशी दो दिन, तो कभी रक्षाबंधन को लेकर भ्रम।

असल में त्योहार नहीं बदले हैं, बल्कि उनके निर्णय के नियम और गणना-पद्धति में विविधता है।


1. हर त्योहार का निर्णय एक जैसा नहीं होता

हिंदू पंचांग में हर पर्व एक ही नियम से नहीं तय होता।

कुछ उदाहरण:

  • कुछ पर्व सूर्योदय (उदयातिथि) से तय होते हैं
  • कुछ पर्व रात्रि (निशीथ काल) से
  • कुछ प्रदोष काल या विशेष समय से

👉 इसलिए अलग-अलग पंचांग अलग दिन बता सकते हैं।


2. चंद्र तिथि कभी निश्चित समय पर नहीं बदलती

चंद्र तिथि (जैसे अष्टमी, एकादशी आदि) किसी भी समय शुरू या समाप्त हो सकती है।

इसलिए स्थिति ऐसी बनती है:

  • एक पंचांग के अनुसार आज तिथि है
  • दूसरे के अनुसार वही तिथि अगले दिन सूर्योदय पर है

👉 यही “दो दिन वाले त्योहार” का मुख्य कारण है।


3. विशेष काल का महत्व (सबसे बड़ा कारण)

कुछ प्रमुख पर्वों में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है:

  • 🌙 जन्माष्टमी → मध्यरात्रि (निशीथ)
  • 🔱 महाशिवरात्रि → पूरी रात्रि
  • 🪔 दीपावली / होलिका दहन → प्रदोष काल
  • 🧵 रक्षाबंधन → भद्रा समाप्त होने के बाद

👉 जब “दिन” और “रात्रि/विशेष काल” अलग दिनों में आते हैं, तो त्योहार दो दिन दिखाई देता है।


4. पंचांग गणना में तकनीकी अंतर

आज के पंचांग अलग-अलग आधारों पर बनते हैं:

  • पारंपरिक गणना पद्धति
  • आधुनिक खगोलीय (द्रिक) गणना
  • क्षेत्रीय परंपराएँ

👉 बहुत छोटे अंतर भी तिथि बदल सकते हैं।


5. परंपरा का अंतर भी एक कारण है

कुछ व्रतों में अलग-अलग परंपराएँ मान्य हैं:

  • स्मार्त परंपरा (गृहस्थ धर्मशास्त्र आधारित)
  • वैष्णव परंपरा (आचार्य-परंपरा आधारित)

👉 इसलिए एक ही पर्व दो अलग दिन मनाया जा सकता है।


निष्कर्ष

त्योहार वास्तव में दो नहीं हुए हैं।
अंतर सिर्फ इतना है कि—

👉 हर पर्व को देखने और तय करने के नियम अलग हैं
👉 और आज की गणना अधिक सटीक और विविध हो गई है

इसलिए सही समझ यह है:

त्योहार एक ही हैं, लेकिन उन्हें तय करने के दृष्टिकोण कई हैं।


आचार्य विजय कुमार शुक्ल 

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र 

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Sunday, October 20, 2024

दीपावली पूजन 2024 dipawali pujan 2024

 दीपावली पूजन 2024







माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस बार दो दिन मनाएं दीपावली पर्व

दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष प्रदोष व्यापिनी अमावस्या को मनाई जाती है। 

इस वर्ष संवत् 2081 में कार्तिक अमावस्या 31.10 .2024 गुरुवार को दिन में 03:54 से प्रारंभ होकर अगले दिन 01 .11.2024 शुक्रवार को सायंकाल 06:17 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।


इस स्थिति में अमावस्या तिथि दोनो ही दिन प्रदोष काल में व्याप्त रहेगी।


कुछ ग्रंथकारों के अनुसार यदि कार्तिक मास की अमावस्या दोनों ही दिन प्रदोष काल में व्याप्त हो,तो ऐसी स्थिति में प्रतिपदा युक्त अमावस्या का ग्रहण करना अधिक श्रेष्ठ होता है।
इस तर्क के पीछे कारण पितृ कार्य भी है पितृ देव पूजन करने के बाद ही लक्ष्मी पूजन करना उचित कहा गया है।


पितृ देव पूजन से तात्पर्य है प्रातः काल में अभ्यंग स्नान, देव पूजन और अपराह्न में पार्वण कर्म,तत्पश्चात लक्ष्मी पूजन।


यदि दीपावली एक दिन पूर्व अर्थात 31 अक्टूबर को मनाई जाए तो यह सभी कर्म लक्ष्मी पूजन के बाद होंगे जो विपरीत दिशा निर्देश है। 


कारण  31 अक्टूबर 2024 को दोपहर बाद 03:54 मिनट से अमावस्या तिथि प्रारंभ हो रही है इसलिए यह कार्य शास्त्रोक्त नहीं होगा अतः दूसरे दिन ही अर्थात् 01नवम्बर 2024को दीपावली का पर्व शास्त्र नियम के अधीन मानना उचित रहेगा,ऐसा कुछ पंचांगकर्ताओं का मत है।


किन्तु यह सारे नियम व्यापारियों और जन सामान्य को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।
कार्तिक अमावस्या की रात्रि साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।


कार्तिक अमावस्या की रात्रि में निशीथ कालीन वेला में साधक विशेष आराधनाएं,मंत्रानुष्ठान, पाठकर्म, श्रीयन्त्र आदि का निर्माण,यंत्रों की प्रतिष्ठा,महालक्ष्मी की विशेष पूजा आदि करते हैं।
उनके मत के अनुसार रात्रिकालीन अमावस्या ही श्रेष्ठ है।


तो ऐसी स्थिति में  उनके लिए 31 अक्टूबर 2024 को ही दीपावली पर्व मनाना उचित रहेगा।


इस प्रकार अलग अलग मतानुसार दोनों ही दिन लक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ माना जाएगा।


यह विशेष बात है कि इस बार हमें दो दिन लक्ष्मी पूजन के प्राप्त होंगें।


इसे माता लक्ष्मी की कृपा समझें और श्रद्धाभाव से पूजनलाभ प्राप्त करें न कि किसी संसय में पड़े।



दीपावली पर्व का विवरण:-


29/10/2024 भौम प्रदोष व्रत, धनतेरस, यमदीपदान, धन्वंतरि जयंती पर्व।


30/10/2024 मास शिवरात्रि, नरक चतुर्दशी, दीपदान।


31/10/2024 हनुमद्दर्शन,प्रदोष काल में लक्ष्मी गणेश स्थापना पूजन,दीपावली पर्व,(अखण्ड दीप स्थापन करें) रात्रिकालीन साधना।


01/11/2024 प्रदोष काल में पुनः लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका (अखण्ड दीप स्थापन पूर्ण)।


02/11/2024 अन्नकूट, गोवर्धन पूजा, बलि पूजा।


03/11/2024 भाई दूज,यमद्वितीया, चित्रगुप्त पूजा, चन्द्र दर्शन।

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Saturday, July 6, 2024

देवताओं का पूजनक्रम और उनसे प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ The order of worship of the gods and the main benefits derived from them

 


देवताओं का पूजनक्रम और उनसे प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ
The order of worship of the gods and the main benefits derived from them

गन्ध,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्य आदि अर्पित करने से होने वाले लाभ
Benefits of offering fragrance, flowers, incense, lamps, offerings etc



कहा गया है कि "देवो भूत्वा देवं यजेत्"देवता की तरह बनकर देवता की पूजा अर्चना करनी चाहिए।
अर्थात् चित्त के द्वारा उस आराध्य देव की छवि अपने हृदय में धारण करके आराध्य देव की पूजा अर्चना की जाय तो वह पूजा विशेष फल देने वाली होती है।


हमारे आराध्य देव हमारी किसी भी सेवा को यूँही नही लेते हैं हम जो भी वस्तु उनको अर्पण करते हैं या चढ़ाते हैं, उसका भी फल प्राप्त होता है।


हम नित्य पूजनादि में देवताओं को वस्त्र,फलादि वस्तुएं अर्पण करते हैं।इनका एक क्रम होता है तो आइए जानते हैं कि उनसे प्राप्त होने वाले लाभ/फल क्या है?


सर्वप्रथम हम पूजन की तैयारी करने के बाद आराध्य देव का ध्यान आवाहन करते हैं-


1-ध्यान/आवाहन-देवसानिध्य।
देवता की मूर्ति को अपने ह्रदय में धारण करते हुए उन्हें पूजन हेतु निमंत्रित किया जाना आवाहन कहलाता है, इससे देवता का सानिध्य प्राप्त होता है।


2-आसन-स्थिरता की प्राप्ति।आवाहन के पश्चात देवता को सामने उपस्थित आसन पर स्थित होने की प्रार्थना करनी चाहिए,इससे स्थिरता की प्राप्ति होती है।


3-पाद्य- अर्थात् देवता के स्वागत हेतु उनके पादप्रक्षालन से पातक नष्ट होते हैं।


4-अर्घ्य-अनर्घ्य अर्थात् मन की दुविधा को मिटाता है।


5-आचमन -सुचित्त सुखी,आंच मन की मिटती है,अर्थात् मन के क्लेश मिटते हैं।


6-स्नान-मल नाश अर्थात् व्याधि हरण।


7-वस्त्र-आराध्य देव के निमित्त वस्त्र अर्पित करने से आयुष्य वर्धन होता है।


8-उपवीत-अर्थात् यज्ञोपवीत आराध्य देव को अर्पित करने से ब्रह्मवेत्ता होता है या ईश्वर के सानिध्य का मार्ग प्रशस्त होता है। 


9-आभूषण-अर्पित करने से धन और ऐश्वर्य प्राप्ति होती है।


10-गन्ध-रोली,चन्दन, कुमकुम, इत्र आदि के अर्पण करने से काम अर्थात् मनोकामना पूर्ति होती है।


11-अक्षत-आराध्य देव को अक्षत(साबुत चावल)अर्पित करने से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।


12-नाना पुष्प-आराध्य देव को विभिन्न प्रकार के पुष्प अर्पित करने से राज्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


13-धूप-आराध्य देव को उत्तम औषधियों से निर्मित सुगंधित धूप अर्पित करने से पापों का नाश होता है।


14-दीप-दीपो मृत्युविनाशनः अर्थात् अज्ञान रूपी अंधकार का विनाश होता है।


15-नैवेद्य-"सर्वमानस्तु तृप्तिरतोभवेत्"अर्थात् फल मिष्ठान आदि अर्पण करने से तृप्ति की अनुभूति होती है,और समाज में सम्मान की प्राप्ति होती है।


16-ताम्बूल-अर्थात् पान सुपाड़ी लौंग इलायची आदि के अर्पण करने से कीर्ति या प्रसिद्धि की प्राप्ति होती है।


17-दक्षिणा-द्रव्य अर्थात् धन के रूप में दक्षिणा अर्पण करने से पूर्ति की प्राप्ति होती है,इससे पूजन पूर्ण होता है।


18-नीराजन-तत्पश्चात आराध्य देव की आरती करने से आत्मशुद्धि होती है।


19-प्रदक्षिणा-पुनः आराध्य देव की प्रदक्षिणा करने से पापों का हरण हो जाता है,मन में पापों के कारण उत्पन्न क्षोभ मिट जाता है।


20-दण्डप्रणाम-अपने आप को आराध्य देव को प्रणाम करके समर्पित करने से  देव का सानिध्य प्राप्त हो जाता है।


21-स्तोत्र और पुराणादि पठन-पुनः आराध्य देव के निमित्त स्तुति आदि करने से सर्वपापक्षय होकर मन निर्मल हो जाता है।


इस प्रकार जाने-अनजाने पूजन में की गई कोई भी वस्तु अर्पण करने पर उसका फल प्राप्त होता है।
हमें श्रद्धा भाव से नित ही प्रभु का पूजन करना चाहिए।

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Friday, June 9, 2023

संकटा स्तोत्र sankata stotra

संकटा स्तोत्र sankata stotra



जीवन में विविध संकटों से मुक्ति, बाधाओं/संकटों का निवारण करें इस संकटा स्तोत्र के द्वारा।       
सर्वकामना की पूर्ति हेतु प्रतिदिन संकटा स्तोत्र का पाठ करें।

संकटा-स्तोत्र

नमो काशिनी वासिनी गंग तीरे।
सदा अर्चितं चंदनं रक्त पुष्पं।।
सदा वंदितं पुजितं सर्व देवं।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो मोहिनी मोहितं भूत सैन्यै।
सदा चन्द्र बदनी हंसै विकरालम्।।
सदा मृगनयनी गुणा रूप वरणी।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो खड्गहस्ते गले रूण्डमाला।
नमो गर्जितं भूमि कंपायमानम्।।
सदा मर्दितं भूत महिषासुरेण।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो मुक्ति देवी नमो वेदमाता।
सदा योगिनी ,योगिनी , योग गम्या।।
सदा कामिनी मोहितं काम राज्यं।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो पुष्प शय्या गले मुण्डमाला।
सदा कोकिला कांचन रूप वरणी।।
सदा रणविषे शत्रु संहारकरणी।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
इदं पंचरत्नं पठेत् प्रात: काले।
हरे पाप तन के बढे धर्म ज्ञानम्।।
सदा दुख:मे कष्ट मे रक्ष पालम्।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
तू ही संकटे योगिनी योग धारय।
तू ही कामिनी मोहितं काम राज्यं।।
तू ही विश्वमाता करे खड्गधारम्।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
संकटा अष्टकम् इदं पुण्यं प्रातः काले पठेन्नर:।
तस्य पीड़ा विनिष्यन्ति सर्व काम: फलं लभेत्।।

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Tuesday, February 28, 2023

गोमय दीपदान gomay deepdan

 गोमय दीपदान gomay deepdan

यश,धन,समृद्धि, पुत्र, दीर्घायु, ग्रह दोष,अरिष्ट और बाधा नाश के लिए करें गोमय दीपदान




दीपक ज्ञान, प्रकाश, भयनाशक, विपत्तियों व अंधकार के विनाश का प्रतीक है।  गोमय दीपदान किसी भी विपत्ति के निवारणार्थ श्रेष्ठ उपाय है।
हमारे शास्त्रों में दीपदान की विशेष महिमा है।मान्यता है कि दीपदान व्रत योग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य देवमंदिर अथवा ब्राह्मण के घर में एक वर्ष तक दीपदान करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। चातुर्मास्य में दीपदान करने वाला श्रीविष्णु भगवान के धाम, कार्तिक मास में दीपदान करने वाला स्वर्गलोक तथा श्रावण मास में दीपदान करने वाला भगवान शिव के लोक को प्राप्त कर लेता है। चैत्र मास में मां भगवती के मंदिर में दीप जलाने से व्यक्ति मां जगदम्बा के नित्य धाम को प्राप्त करता है। दीपदान से दीर्घ आयु और नेत्र ज्योति की प्राप्ति होती है। दीपदान से धन और पुत्र आदि की भी प्राप्ति होती है। दीपदान करने वाला व्यक्ति सौभाग्य युक्त होकर स्वर्ग लोक में देवताओं द्वारा पूजित होता है।

गोमय दीपदान का महत्व

अत्यंत सुगमता से किया जाने वाला यह एक ऐसा वैदिक विधान है जो किसी यज्ञ के बराबर फल देने वाला है।यदि संभव हो तो किसी योग्य ब्राह्मण के सान्निध्य में दीपदान की प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए। 

गोमय दीपदान का समय निर्धारण

ऋतु-दीपदान हेतु बसन्त, हेमन्त, शिशिर, वर्षा व शरद ऋतु उत्तम मानी गई है।

मास-वैशाख, श्रावण, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन मास श्रेष्ठ है।

पक्ष-शुक्ल पक्ष दीपदान के लिए अधिक उत्तम होता है।

तिथि-प्रथमा, द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी,नवमी,एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी,चतुर्दशी,अमावस्या व पूर्णिमा तिथि गोमय दीपदान के लिए श्रेष्ठ होती है।

नक्षत्र-इन नक्षत्रों में गोमय दीपदान करना चाहिए। जैसे-रोहिणी, आर्दा, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, स्वाती, विशाखा, ज्येष्ठा और श्रवण।

योग-सौभाग्य, शोभन, प्रीति, सुकर्म, वृद्धि, हर्षण, व्यतीपात और वैधृत योगों में गोमय दीपदान करना अत्यंत लाभप्रद होता है।

विशेषः-सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, संक्रान्ति, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवरात्र एवं महापर्वो पर गोमय दीपदान करना विशेष फलदायक रहता है।

गोमय दीपदान का समय-प्रातः, सायं, मध्यरात्रि तथा अन्य यज्ञकर्म की पूर्णाहूति से पहले किया जाना चाहिए।

कहां करते हैं गोमय दीपदान?

1. देवमंदिर में करते हैं दीपदान। 

2. विद्वान ब्राह्मण के घर में करते हैं दीपदान।

3. नदी के किनारे या नदी में करते हैं दीपदान।

4. दुर्गम स्थान अथवा भूमि (धान के उपर) पर करते हैं दीपदान।


5.अश्वत्थ अर्थात् पीपल तुलसी आदि पूजनीय वृक्ष के समीप करते हैं दीपदान।


6.चौराहा, मार्ग पर करते हैं दीपदान।


7.आकाश में करते हैं दीपदान।


कैसे करते हैं गोमय दीपदान?

1. गोमय के दिये में घी डालकर उससे मंदिर में ले जाकर जलाकर उसे वहां पर रख दें। दीपों की संख्या और बत्तियां खास समयानुसार और मनोकामना अनुसार रखी जाती है।

2. गोमय दीपक बनाकर उसमें घी डालकर रुई की बत्ती जलाकर उसे पीपल या बड़(बरगद) के पत्ते पर रखकर नदी में प्रवाहित किया जाता है।

3. देवस्थल/मन्दिर में गोमय दीपक को किसी आधार पर सप्तधान या चावल के उपर ही रखकर जलाते हैं। भूमि पर रखने से भूमि को आघात लगता है।

कब करते हैं गोमय दीपदान?

1. सभी स्नान पर्व और व्रत के समय दीपदान करते हैं। 

2. धनतेरस, रूपचतुर्दशी या नरकचतुर्दशी और यम द्वितीया के दिन दीपदान करते हैं।

3. दीपवली, अमावस्या या पूर्णिमा के दिन करते हैं दीपदान।

4. दुर्गम स्थान अथवा भूमि पर दीपदान करने से व्यक्ति नरक जाने से बच जाता है।

5. पद्मपुराण के उत्तरखंड में स्वयं महादेव कार्तिकेय को दीपावली, कार्तिक कृष्णपक्ष के पांच दिन में दीपदान का विशेष महत्व बताते हैं।

कृष्णपक्षे विशेषेण पुत्र पंचदिनानि च।

पुण्यानि तेषु यो दत्ते दीपं सोऽक्षयमाप्नुयात्।

अर्थात कृष्णपक्ष में रमा एकादशी से दीपावली तक 5 दिन बड़े पवित्र है। उनमें जो भी दीप आदि का दान किया जाता है, वह सब अक्षय और सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है।

गोमय दीपदान करने के फायदे :

1. अकाल मृत्यु से बचने के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

2. अपने मृ‍तकों की सद्गति के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

3. लक्ष्मी माता और भगवान विष्णु को प्रसन्न कर उनकी कृपा हेतु करते हैं गोमय दीपदान।

5. यम, शनि, राहु,केतु और अन्य ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

6. सभी तरह की बाधाओं, गृहकलह और संकटों से बचने के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

7. जीवन से अंधकार मिटे और उजाला आए इसीलिए करते हैं दीपदान।

8. मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

9. किसी भी तरह की पूजा या मांगलिक कार्य की सफलता हेतु करते हैं गोमय दीपदान।

10. घर में धन समृद्धि बनी रहे इसीलिए भी कहते हैं गोमय दीपदान।

11. कार्तिक माह में भगवान विष्णु या उनके अवतारों के समक्ष गोमय दीपदान करने से समस्त यज्ञों, तीर्थों और दानों का फल प्राप्त होता है।

12. कांति, ओज, और तेज के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

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Sunday, August 25, 2019

गणेशपञ्चरत्नम् Ganeshpanchatratnam

           गणेशपञ्चरत्नम् 

 Ganeshpanchatratnam


मुदाकरात्तमोदकं सदाविमुक्तिसाधकं
कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् ।
अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं
नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥१॥

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं
नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥

समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं
दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥

अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं
पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणम्
कपोलदानवारणं भजेपुराणवारणम् ॥४॥

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं
अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेवयोगिनां
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५।।

                  फलश्रुती 


महागणेशपञ्चरत्नमादरेणयोऽन्वहं
प्रजल्पति प्रभातके हृदिस्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितींसुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैतिसोऽचिरात् ॥६॥

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Tuesday, June 13, 2017

गणेश अथर्वशीर्ष पाठ के लाभ Benefits of Ganesh Atharvashirsh Lesson

जब किसी जातक की जन्मकुंडली में बुध ग्रह अशुभ भावो का स्वामी हो,अशुभ ग्रहों से द्वारा द्रष्ट हो,या शुभ भाव में होकर भी निर्बल हो,क्रूर ग्रहों के साथ युति हो रही हो,अस्त हो, जिसके प्रभाव से जीवन में धनाभाव (आर्थिक समस्या) स्वास्थ्य की समस्या, व्यापार में निरंतर हानि जैसे परिणाम मिल रहे हो तो शास्त्र में बुधग्रह के जप, दान, श्री गणेश जी की पूजा, बुधवार व गणेश चतुर्थी के व्रत का नियम है ।
प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की चंद्रोदयव्यापिनी चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश के लिए जो व्रत किया जाता है उसे गणेश चतुर्थी व्रत कहते हैं। भगवान गणेश बुद्धि, धन, ज्ञान, यश, सम्मान, पद और तमाम भौतिक सुखों को देने वाले देवता तथा सभी पाप व क्रूर ग्रहों के दोष को दूर करेने वाले देवता विघ्नहर्ता के रूप में पूजनीय हैं।
भगवान गणेश की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में अनेक  मंत्र, पूजा व आरती का महत्व बताया गया है।
गणेश पूजन में सबसे ज्यादा विशेषता श्रीगणपति अथर्वशीर्ष की मानी जाती है। यह मूलत: भगवान गणेश की वैदिक स्तुति है, इसका पाठ करने वाला किसी प्रकार के विघ्न से बाधित न होता हुआ महापातकों से मुक्त हो जाता है। जिसमें भगवान गणेश के आवाहन से लेकर ध्यान, नाम से मिलने वाले शुभ फल आदि सम्मिलित है। इस गणपति स्त्रोत का पाठ धार्मिक दृष्टि से सभी दोष से मुक्त करता है, वहीं व्यावहारिक जीवन के कष्टो, दु:खों और बाधाओं से भी रक्षा करता है। ईश्वर आपका मंगल करें।
गणेश अथर्वशीर्ष स्तोत्र का महत्व

अथर्वशीर्ष शब्द में अ+थर्व+शीर्ष इन शब्दों का समावेश है। ‘अ’ अर्थात् अभाव, ‘थर्व’ अर्थात् चंचल एवं ‘शीर्ष’ अर्थात् मस्तिष्क–चंचलता रहित मस्तिष्क अर्थात् शांत मस्तिष्क। मन बड़ा प्रबल है। मन का कार्य संकल्प-विकल्प करना है। मन ही सारे संसार-चक्र को चला रहा है। मन का समाहित हो जाना ही परम योग है। गणपति अथर्वशीर्ष मन-मस्तिष्क को शांत रखने की विद्या है।

अथर्वशीर्ष में मात्र दस ऋचाएं हैं। इसमें बताया गया है कि शरीर के मूलाधार चक्र में श्री गणेश का निवास है। मूलाधार चक्र शरीर में गुदा स्थान के पास स्थित है। मूलाधार चक्र आत्मा का भी स्थान है जो ॐकारमय है। यहां ॐकार स्वरूप गणेशजी विराजमान हैं। मूलाधार चक्र में ध्यान केन्द्रित करने से मन-मस्तिष्क शांत रहता है।

श्रीगणेश का वक्रतुण्ड-आकार ओंकार को प्रदर्शित करता है। ‘अकार’ गणेशजी के चरण हैं, ‘उकार’ उदर और ‘मकार’ मस्तक का महामण्डल है। इस प्रकार गणपति अथर्वशीर्ष में ओंकार और गणपति दोनों एक ही तत्त्व हैं। ओंकार रूप गणपति सत्ता, ज्ञान और सुख के रक्षक हैं। जीवन के कष्ट, संकट, विघ्न, शोक एवं मोह का नाश कर अथर्वशीर्ष परमार्थिक सुख भी प्रदान करता है। श्रीगणेश कष्टों का निवारण कर बिना भेदभाव के सभी का मंगल करते हैं।

अथर्वशीर्ष का सार है– ॐ गं गणपतये नम:।।

अथर्वशीर्ष के प्रतिदिन एक, पांच अथवा ग्यारह पाठ करने का विधान है। जो इसका नित्य पाठ करता है, वह  हर प्रकार से सुखी हो जाता है। वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता।

भगवान गणेश के नाम से"ॐ गं गणपतये नम:" मन्त्र को का जाप करते हुए विधिवत पूजन करें। अथर्वशीर्ष स्त्रोत पाठ से व्यक्ति के सभी दुखों का नाश होता है।

गणपति अथर्वशीर्ष का कम से कम एक पाठ नियमित करने से शरीर की आंतरिक शुद्धि होती है। इससे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

गणपति अथर्वशीर्ष के पाठ से मानसिक शांति और मानसिक मजबूती मिलती है। इससे दिमाग स्थिर रहते हुए सटीक निर्णय लेने के काबिल बनता है।

इसके नियमित पाठ से शरीर के सारे विषैले तत्व बाहर आ जाते हैं। शरीर में एक विशेष तरह की कांति पैदा होती है।

जिन लोगों की जन्मकुंडली में चंद्र के साथ पाप ग्रह राहु, केतु और शनि बैठे हों उनका जीवन संकटपूर्ण रहता है। ऐसे लोगों को हर दिन गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना ही चाहिए।

इसके पाठ से अशुभ ग्रह शांत होते हैं और भाग्य के कारक ग्रह बलवान होते हैं।

बच्चों और युवाओं का मन यदि पढ़ाई से उचट गया है या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें इसका पाठ रोज करना चाहिए।

आर्थिक सुख-समृद्धि और धन की प्राप्ति के लिए भी गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना चाहिए।

गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने के लिए प्रतिदिन अपने पूजा स्थान या किसी शुद्ध स्थान पर स्नानादि करके शांत मन से बैठ जाएं। रीढ़ एकदम सीधी रखते हुए बैठें और पाठ करें। इसका पाठ करने के लिए किसी पूजा की आवश्यकता नहीं होती। भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा या फोटो सामने ना हो तो भी चलेगा।

इसका पाठ नियमित करना चाहिए, लेकिन प्रत्येक माह आने वाले विशेष दिन जैसे संकष्टी चतुर्थी के दिन शाम के समय 21 पाठ करना चाहिए।

गणपति अथर्वशीर्ष के पाठ के साथ यदि एक माला" ॐ गं गणपतये नम:" की जपी जाए तो और भी अधिक लाभदायक होता है।

इसका पाठ महिलाओं के लिए भी बहुत लाभदायक होता है लेकिन वे अपनी माहवारी के दौरान इसका पाठ ना करें।

अगर आपकी कुंडली में बुध की स्थिति ठीक नहीं है । व्यापार में लगातार आपको हानि हो रही है और सेहत भी आपका साथ नहीं दे रही है. तो भगवान गणेश के अथर्वशीर्ष के मंत्रों के पाठ से आपकी सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं।।


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              ◆  गणेश अथर्वशीर्ष


गणपति का आधिदैविक स्वरूप

ॐ नमस्ते गणपतये । त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि । त्वमेव केवलं कर्तासि । त्वमेव केवलं धर्तासि । त्वमेव केवलं हर्तासि ।त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ।।१।।

सत्य कथन

ऋतम् वच्मि । सत्यं (सत्यौं) वच्मि ।। २।।

रक्षण के लिये प्रार्थना

अव त्वं माम्‌ । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पश्चात्तात्‌ । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोर्ध्वात्तात् । अवाधरात्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ।।३।।

गणपतिजी का आध्यात्मिक स्वरूप

त्वं वाङ्‌मयस्त्वं चिन्मय: । त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय: । त्वं (त्वौं) सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि । त्वं (त्वौं) प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ।।४।।

गणपति का स्वरूप

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ।

त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ: । त्वं चत्वारि वाक्पदानि ।।५।।त्वं गुणत्रयातीत: । त्वं अवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीत: ।त्वं कालत्रयातीत: । त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् । त्वं (त्वौं) शक्तित्रयात्मक: । त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् । त्वं ब्रहमा त्वं विष्णुस् त्वं रुद्रस् त्वं इन्द्रस् त्वं अग्निस् त्वं (त्वौं) वायुस् त्वं सूर्यस् त्वं‌ चंद्रमास् त्वं ब्रह्मभूर्भुवः: स्वरोम् ।।६।।

गणेशविद्या

गणादिम् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिस्‌ तदनंतरम् । अनुस्वार: परतर: । अर्धेन्दुलसितम् । तारेण ऋद्धम् । एतत्तव मनुस्वरूपम् । गकार: पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् ।बिंदुरुत्तररूपम् । नादः संधानम् । संहिता (सौंहिता) संधिः । सैषा गणेशविद्या । गणक ऋषि: । निचृद्‌गायत्रीछंदः गणपतिर्देवता । ॐ गं गणपतये नम: ।।७।।

एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि । तन्नो दंती प्रचोदयात् ।। ८ ।।

एकदंतं चतुर्हस्तम् पाशमंकुशधारिणम् । रदं च वरदं (वरदौं) हस्तैर्‌बिभ्राणं मूषकध्वजम् । रक्तम् लंबोदरम् शूर्पकर्णकम् रक्तवाससम् । रक्तगंधानुलिप्तांगम् रक्तपुष्पै: सुपूजितम् ।भक्तानुकंपिनम् देवं जगत्कारणमच्युतम् । आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृते: पुरुषात्परम् । एवं ध्यायति यो नित्यम् स योगी योगिनां (उं) वर: ।।९।।

नमन

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नम: प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नम: ।।१०।।

फलश्रुति

एतदथर्वशीर्षम्‌ योऽधीते । स ब्रह्मभूयाय कल्पते । स् सर्वविघ्नैर्न बाध्यते । स सर्वत: सुखमेधते । स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते । सायमधीयानो दिवसकृतम्‌ पापन्‌ नाशयति । प्रातरधीयानो रात्रिकृतम्‌ पापन्‌ नाशयति । सायं प्रात: प्रयुंजानो अपापो भवति ।। सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ।। इदम्‌अथर्वशीर्षम्‌ अशिष्याय न देयम्‌। यो यदि मोहाद्दास्यति । स पापीयान्‌ भवति ।सहस्रावर्तनात्‌ यं (यैं) यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्‌।।११।।

अनेन गणपतिम्‌ अभिषिंचति । स वाग्मी भवति ।चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति । स विद्यावान्भवति । इत्यथर्वणवाक्यम्‌। ब्रह्माद्यावरणं (णौं) विद्यात्‌। न बिभेति कदाचनेति ।। १२ ।।

यो दूर्वांकुरैर्यजति । स वैश्रवणोपमो भवति । यो लाजैर्यजति । स यशोवान्भवति । स मेधावान्भवति । यो मोदकसहस्रेण यजति । स वांछितफलमवाप्नोति । यः साज्यसमिदभिर्यजति । स सर्वम् लभते स सर्वम् लभते । अष्टौ ब्राह्मणान्‌सम्यग्राहयित्वा । सूर्यवर्चस्वी भवति । सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्‌त्वा सिद्धमंत्रो भवति ।महाविघ्नात्प्रमुच्यते । महादोषात्प्रमुच्यते । महापापात्प्रमुच्यते । स सर्वविद्भवति स सर्वविद्‍भवति । य एवं वेद इत्युपनिषत्‌ ।।१३।।

अर्थ
गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्त्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरुप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो। ॥ १॥
॥ स्वरूप तत्त्व ॥
यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ। ॥ २॥
तुम मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्य की रक्षा करो। शिष्य रक्षा करो। पीछे से रक्षा करो। आगे से रक्षा करो। उत्तर (वाम भाग) की रक्षा करो। दक्षिण भाग की रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे की ओर से रक्षा करो। सर्वतोभाव से मेरी रक्षा करो। सब दिशाओं से मेरी रक्षा करो। ॥ ३॥
तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो। ॥ ४॥
यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि, जल, अग्नि और आकाश हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो। ॥ ५॥
तुम सत्त्व-रज-तम-इन तीनों गुणों से परे हो। तुम भूत-भविष्य-वर्तमान-इन तीनों कालों से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण- इन तीनों देहों से परे हो। तुम नित्य मूलाधार चक्र में स्थित हो। तुम प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति- इन तीनों शक्तियों से संयुक्त हो। योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो। तुम विष्णु हो। तुम रुद्र हो। तुम इन्द्र हो। तुम अग्नि हो। तुम वायु हो। तुम सूर्य हो। तुम चन्द्रमा हो। तुम (सगूण) ब्रह्म हो, तुम (निर्गुण) त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो। ॥ ६॥
॥ गणेश मंत्र ॥
‘गण’ शब्द के आदि अक्षर गकार का पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकार का उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्र से पहले शोभित जो ‘गं’ है, वह ओंकार के द्वारा रुद्ध हो, अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्र का स्वरुप (ॐ गं ॐ) है। ‘गकार’ पूर्वरुप है, ‘अकार’ मध्यमरुप है, ‘अनुस्वार’ अन्त्य रूप है। ‘बिन्दु’ उत्तररुप है। ‘नाद’ संधान है। संहिता’ संधि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्या के गणक ऋषि हैं। निचृद् गायत्री छन्द है और गणपति देवता है। मन्त्र है- ‘ॐ गं गणपतये नमः” ॥ ७॥
॥ गणेश गायत्री ॥
एकदन्त को हम जानते हैं, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको उस ज्ञान और ध्यान में प्रेरित करें। ॥ ८॥
॥ गणेश रूप (ध्यान)॥
गणपतिदेव एकदन्त और चर्तुबाहु हैं। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं। भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले, ज्योतिर्मय, जगत् के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुष से परे विद्यमान वे पुरुषोत्तम सृष्टि के आदि में आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता है, वह योगी योगियों में श्रेष्ठ है। ॥ ९॥
॥ अष्ट नाम गणपति ॥
व्रातपति, गणपति, प्रमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय तथा वरदमूर्ति को नमस्कार है। ॥ १०॥
॥ फलश्रुति ॥
इस अथर्वशीर्ष का जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापों से मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका अध्ययन करनेवाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करने वाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करनेवाले सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष इसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्य को उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी १००० आवृत्ति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा। ॥ ११॥
(विविध प्रयोग)
जो इस मन्त्र के द्वारा श्रीगणपति का अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथि में उपवास कर जप करता है, वह विद्यावान् हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य है। जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता। ॥ १२॥
(यज्ञ प्रयोग)
जो दुर्वांकुरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान होता है। जो सहस्त्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधा के द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है। ॥ १३॥
(अन्य प्रयोग)

जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद् का सम्यक ग्रहण करा देता है, वह सूर्य के समान तेज-सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद् का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नों से मुक्त हो जाता है। महापापों से मुक्त हो जाता है। महादोषों से मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है-वह सर्वविद् हो जाता है। ॥ १४॥

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