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Wednesday, August 12, 2026

प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान Prakrit Mrityunjaya Graha Shanti Vidhan

प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान

Prakrit Mrityunjaya Graha Shanti Vidhan

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


पंचतत्व • नवग्रह • महामृत्युञ्जय मंत्र-जप

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


भूमिका

मनुष्य का जीवन केवल बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। भारतीय वैदिक परंपरा में पंचतत्व, ग्रह-नक्षत्र, कर्म, संस्कार और पुरुषार्थ को जीवन के विभिन्न आयामों से जोड़ा गया है।

जन्मपत्रिका में ग्रहों की स्थिति, दशा-अन्तर्दशा तथा वर्तमान गोचर के अनुसार जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती रहती हैं। कभी स्वास्थ्य को लेकर चिंता होती है, कभी मानसिक अशान्ति, कार्यों में बाधा, भय, अस्थिरता अथवा बार-बार आने वाली कठिनाइयाँ व्यक्ति को प्रभावित करती हैं।

ऐसी परिस्थितियों में केवल किसी एक ग्रह की पूजा करने के बजाय पंचतत्व साधना, नवग्रह गायत्री मंत्र-जप और महामृत्युञ्जय मंत्र-जप को एक समन्वित विधान के रूप में अपनाने की परंपरा को उपयोगी आध्यात्मिक उपाय के रूप में देखा जा सकता है।

इसी विचार को आधार बनाकर “प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान” को एक व्यक्तिगत, जन्मपत्रिका-आधारित अनुष्ठान-पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।


प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान क्या है?

यह एक समन्वित ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान-विधान है, जिसमें तीन प्रमुख आधारों को एक साथ रखा जाता है—

• पंचतत्व साधना

• नवग्रह गायत्री मंत्र-जप

• महामृत्युञ्जय मंत्र-जप

आवश्यकतानुसार इसमें रुद्र गायत्री, विष्णु गायत्री, हवन एवं पूर्णाहुति को भी सम्मिलित किया जा सकता है।

इसका उद्देश्य केवल ग्रहों की शान्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुष्य, आरोग्य, मानसिक शान्ति, धैर्य, जीवन-शक्ति एवं सर्वांगीण कल्याण की प्रार्थना करना है।


पंचतत्व — साधना का पहला आधार

भारतीय दर्शन में प्रकृति और शरीर को पाँच मूल तत्वों से संबंधित माना गया है—

पृथ्वी • जल • अग्नि • वायु • आकाश

प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान में पंचतत्वों का स्मरण करते हुए संबंधित मंत्रों का जप किया जाता है।

इसका भाव केवल किसी भौतिक तत्व को बदलना नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, आंतरिक संतुलन और जीवन में सामंजस्य की भावना विकसित करना है।


नवग्रह — ज्योतिषीय आधार

ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु को नवग्रह के रूप में विचार किया जाता है।

इन ग्रहों की जन्मपत्रिका में स्थिति, उनके स्वभाव, दशा-अन्तर्दशा तथा वर्तमान गोचर के आधार पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके प्रभाव का विचार किया जाता है।

इस विधान में नवग्रह गायत्री मंत्रों का जप किया जाता है।

लेकिन प्रत्येक यजमान के लिए जप की संख्या और ग्रहों की प्राथमिकता समान होना आवश्यक नहीं है।

जन्मपत्रिका के अनुसार

किसी विशेष ग्रह की स्थिति अधिक महत्वपूर्ण होने पर उसके मंत्र-जप को प्राथमिकता दी जा सकती है।

इस प्रकार यह केवल सामान्य नवग्रह पूजा न रहकर यजमान की जन्मपत्रिका के अनुसार किया जाने वाला व्यक्तिगत विधान बनता है।


महामृत्युञ्जय-विधान का मुख्य आधार

इस विधान का प्रमुख मंत्र है—

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

महामृत्युञ्जय मंत्र भगवान रुद्र की उपासना का अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है।

इसके जप का भाव आयुष्य, आरोग्य, मानसिक धैर्य, भय से मुक्ति, जीवन-शक्ति और कल्याण की प्रार्थना से जुड़ा है।

यहाँ “मृत्युञ्जय” शब्द को केवल मृत्यु के अर्थ में देखना उचित नहीं है। इसका व्यापक आध्यात्मिक भाव है—जीवन को भय, दुर्बलता और प्रतिकूल परिस्थितियों से ऊपर उठाने की साधना।


रुद्र एवं विष्णु तत्व

आवश्यकतानुसार इस विधान में—

रुद्र गायत्री तथा
विष्णु गायत्री

का जप भी रखा जा सकता है।

इससे साधना में शोधन, परिवर्तन, संरक्षण और संतुलन के भाव को जोड़ा जाता है।

इस प्रकार विधान केवल शान्ति की प्रार्थना नहीं रहता, बल्कि जीवन के विभिन्न स्तरों पर संतुलन की साधना का स्वरूप लेता है।


हवन एवं पूर्णाहुति

निर्धारित मंत्र-जप के पश्चात विधान के अनुसार हवन एवं पूर्णाहुति की जा सकती है।

हवन में संकल्पित देवताओं एवं मंत्रों का स्मरण करते हुए आहुति दी जाती है।

अंत में यजमान के लिए—

आयुष्य • आरोग्य • मानसिक शान्ति • ग्रह-शान्ति • जीवन-शक्ति • पारिवारिक सुख • सर्वांगीण कल्याण

की प्रार्थना की जाती है।


यह विधान किसके लिए किया जा सकता है?

जन्मपत्रिका एवं वर्तमान परिस्थिति के अनुसार इस विधान पर विचार किया जा सकता है, जैसे—

  • ग्रहों की प्रतिकूल दशा या अन्तर्दशा
  • ग्रहजन्य बाधाओं की स्थिति
  • स्वास्थ्य एवं आरोग्य को लेकर चिंता
  • मानसिक अशान्ति या अनावश्यक भय
  • कार्यों में लगातार रुकावट
  • जीवन में अस्थिरता या अनिश्चितता
  • बार-बार आने वाली कठिन परिस्थितियाँ
  • आयुष्य एवं आरोग्य के लिए आध्यात्मिक साधना की इच्छा

लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के लिए इस विधान की आवश्यकता हो, यह आवश्यक नहीं है। जन्मपत्रिका और वास्तविक परिस्थिति का उचित विचार करने के बाद ही अनुष्ठान निर्धारित करना अधिक उचित है।


जन्मपत्रिका के अनुसार व्यक्तिगत विधान

प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान की विशेषता यही है कि इसे सभी यजमानों के लिए एक जैसा नहीं रखा जाता।

यजमान की -

जन्मपत्रिका → लग्न → ग्रहस्थिति → नक्षत्र → दशा-अन्तर्दशा → गोचर → वर्तमान परिस्थिति

का विचार करके विधान की रूपरेखा बनाई जा सकती है।

किसी यजमान के लिए नवग्रह जप प्रधान हो सकता है, किसी के लिए महामृत्युञ्जय जप की संख्या अधिक रखी जा सकती है और किसी के लिए विशेष ग्रह की शान्ति को प्राथमिकता दी जा सकती है।

अर्थात—

“एक विधान, लेकिन प्रत्येक यजमान के लिए आवश्यकता के अनुसार अलग स्वरूप।”

यही इस पद्धति की विशेषता हो सकती है।


इस विधान का मूल उद्देश्य

प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान का उद्देश्य व्यक्ति को भयभीत करना नहीं, बल्कि उसे आस्था, साधना, आत्मबल और सकारात्मक जीवन-दृष्टि से जोड़ना है।

ग्रहों को केवल शांत करना ही अंतिम उद्देश्य नहीं है।

वास्तविक उद्देश्य है—

ग्रह शान्ति के साथ जीवन-शक्ति की साधना।

पंचतत्व के प्रति संतुलन, नवग्रह के प्रति श्रद्धा और महामृत्युञ्जय के माध्यम से जीवन-शक्ति एवं आरोग्य की प्रार्थना—इसी समन्वित भाव को इस विधान का आधार बनाया जा सकता है।


एक आवश्यक सावधानी

यह विधान चिकित्सा का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर योग्य चिकित्सक से उचित परामर्श एवं उपचार लेना आवश्यक है। इस विधान को आध्यात्मिक साधना, प्रार्थना और मानसिक-आध्यात्मिक संबल के रूप में देखा जाना चाहिए।


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र

प्राकृत मृत्युञ्जय ग्रह शान्ति विधान

“ग्रह शान्ति के साथ जीवन-शक्ति की साधना”

पंचतत्व • नवग्रह गायत्री • महामृत्युञ्जय मंत्र-जप

जन्मपत्रिका एवं परिस्थिति के अनुसार व्यक्तिगत अनुष्ठान

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


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Thursday, July 23, 2026

अनुष्ठान विज्ञान : क्यों, कब और कैसे करें वैदिक अनुष्ठान? anushthan vigyan : kyon, kab aur kaise karen vaidik anushthan?

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प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


अनुष्ठान का महत्व, उद्देश्य और शास्त्रीय दृष्टिकोण

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


प्रस्तावना

भारतीय सनातन परंपरा में अनुष्ठान केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक रूप से संतुलित करने वाली एक शास्त्रोक्त साधना पद्धति है।

आज के आधुनिक युग में अनेक लोग अनुष्ठान को केवल समस्या निवारण का माध्यम मानते हैं, वहीं कुछ लोग इसे मात्र परंपरा या अंधविश्वास समझ लेते हैं। वास्तव में अनुष्ठान का उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक है।

अनुष्ठान मनुष्य को अपने भीतर की शक्तियों को जागृत करने, ईश्वर के प्रति समर्पण बढ़ाने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम है।


अनुष्ठान का अर्थ

संस्कृत में "अनुष्ठान" शब्द का अर्थ है—

नियमपूर्वक, श्रद्धापूर्वक और विधिपूर्वक किसी आध्यात्मिक कर्म का पालन करना।

यह केवल पूजा करने की क्रिया नहीं, बल्कि—

  • संकल्प,
  • मंत्र,
  • साधना,
  • शुद्धि,
  • श्रद्धा,
  • आचरण

का समन्वित स्वरूप है।


अनुष्ठान क्यों करते हैं?

1. आत्मशुद्धि के लिए

अनुष्ठान का सबसे पहला उद्देश्य मनुष्य के भीतर की अशुद्धियों को दूर करना है।

नियमित जप, ध्यान, पूजा और प्रार्थना से—

  • मन शांत होता है,
  • विचारों में सकारात्मकता आती है,
  • आत्मविश्वास बढ़ता है।

2. ईश्वर से जुड़ने के लिए

अनुष्ठान मनुष्य और परमात्मा के बीच संबंध स्थापित करने का माध्यम है।

यह हमें यह अनुभव कराता है कि जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक आध्यात्मिक आधार भी है।


3. कर्मों के संस्कारों को शुद्ध करने के लिए

वैदिक दर्शन के अनुसार मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों से प्रभावित होता है।

जप, तप, दान, यज्ञ और प्रायश्चित्त जैसे अनुष्ठान व्यक्ति को अपने जीवन में सुधार और शुभ कर्मों की ओर प्रेरित करते हैं।


4. ग्रह एवं जीवन की बाधाओं की शांति के लिए

वैदिक ज्योतिष में ग्रहों को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का सूचक माना गया है।

नवग्रह शांति, महामृत्युंजय जप, रुद्राभिषेक आदि अनुष्ठान व्यक्ति को मानसिक शक्ति, सकारात्मक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक सहारा प्रदान करते हैं।


क्या अनुष्ठान से भाग्य बदल सकता है?

अनुष्ठान भाग्य को किसी जादू की तरह नहीं बदलता, बल्कि मनुष्य के विचार, कर्म और दृष्टिकोण को बदलने का माध्यम बनता है।

शास्त्रों के अनुसार—

पुरुषार्थ + प्रार्थना + साधना + ईश्वर कृपा

के समन्वय से जीवन में परिवर्तन आता है।

अनुष्ठान व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति देता है और शुभ कर्मों की प्रेरणा देता है।


अनुष्ठानों के प्रमुख प्रकार

1. नित्य अनुष्ठान

जो प्रतिदिन किए जाते हैं—

  • ईश्वर स्मरण
  • दीप प्रज्वलन
  • मंत्र जप
  • ध्यान
  • पूजा

2. नैमित्तिक अनुष्ठान

विशेष अवसरों पर किए जाने वाले कर्म—

  • गृह प्रवेश
  • विवाह संस्कार
  • नामकरण
  • भूमि पूजन
  • प्रतिष्ठा

3. काम्य अनुष्ठान

विशेष उद्देश्य से किए जाने वाले अनुष्ठान—

  • संतान प्राप्ति
  • विवाह में सफलता
  • स्वास्थ्य
  • व्यवसाय उन्नति
  • मानसिक शांति

4. शांति अनुष्ठान

जीवन में उत्पन्न बाधाओं की शांति के लिए—

  • नवग्रह शांति
  • रुद्राभिषेक
  • दुर्गा सप्तशती पाठ
  • महामृत्युंजय जप
  • वास्तु शांति

अनुष्ठान में श्रद्धा का महत्व

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।

अर्थात मनुष्य जैसा विश्वास रखता है, उसका जीवन भी उसी दिशा में आगे बढ़ता है।

बिना श्रद्धा के किया गया अनुष्ठान केवल बाहरी क्रिया बन सकता है। श्रद्धा, शुद्ध भावना और सदाचार से किया गया अनुष्ठान जीवन में वास्तविक परिवर्तन का माध्यम बनता है।


क्या अनुष्ठान आचार्य द्वारा ही कराया जाना चाहिए?

सामान्य पूजा, जप और भक्ति व्यक्ति स्वयं कर सकता है।

लेकिन—

  • वैदिक यज्ञ,
  • विशेष हवन,
  • प्रतिष्ठा,
  • संस्कार,
  • विशिष्ट मंत्र साधना

जैसे कार्यों में योग्य आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक माना गया है।

आचार्य का कार्य केवल मंत्र पढ़ना नहीं, बल्कि शास्त्रोक्त विधि, संकल्प और साधना की मर्यादा बनाए रखना है।


योग्य आचार्य की पहचान

एक योग्य आचार्य में—

  • शास्त्र ज्ञान,
  • सदाचार,
  • विनम्रता,
  • सेवा भावना,
  • मंत्र एवं विधि का ज्ञान

होना चाहिए।

धर्म के नाम पर भय उत्पन्न करना या केवल आर्थिक लाभ को उद्देश्य बनाना शास्त्रीय भावना के अनुरूप नहीं है।


क्या ऑनलाइन अनुष्ठान शास्त्रसम्मत हैं?

वर्तमान समय में दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले लोगों के लिए ऑनलाइन अनुष्ठान एक माध्यम बना है।

यदि—

  • उचित संकल्प,
  • योग्य आचार्य,
  • शास्त्रोक्त विधि,
  • श्रद्धा और सहभागिता

के साथ अनुष्ठान किया जाए, तो यह परिस्थितिजन्य व्यवस्था के रूप में उपयोगी हो सकता है।


अनुष्ठान में संकल्प का महत्व

संकल्प अनुष्ठान की दिशा निर्धारित करता है।

संकल्प के माध्यम से साधक ईश्वर को साक्षी मानकर अपने उद्देश्य को स्पष्ट करता है।

मंत्र शक्ति देता है, संकल्प दिशा देता है और श्रद्धा अनुष्ठान को पूर्णता प्रदान करती है।


अनुष्ठान में शुद्धि का महत्व

शुद्धि केवल स्नान और स्वच्छ वस्त्र तक सीमित नहीं है।

वास्तविक शुद्धि है—

  • शरीर की शुद्धि,
  • मन की शुद्धि,
  • वाणी की शुद्धि,
  • आचरण की शुद्धि।

जब साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है, तब अनुष्ठान का आध्यात्मिक प्रभाव अधिक गहरा होता है।


निष्कर्ष

अनुष्ठान सनातन संस्कृति की एक महान साधना परंपरा है। इसका उद्देश्य केवल बाहरी इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि मनुष्य को भीतर से श्रेष्ठ बनाना है।

सच्चा अनुष्ठान वही है जिसमें शास्त्र की मर्यादा, श्रद्धा का भाव, योग्य मार्गदर्शन और जीवन में सदाचार का समावेश हो।

अनुष्ठान मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है, आत्मबल प्रदान करता है और जीवन को धर्ममय दिशा देता है।


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
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Saturday, July 4, 2026

त्योहार दो दिन क्यों पड़ने लगे हैं? (सरल शास्त्रीय कारण) Why are festivals falling on two days? (Simple Scriptural reasons)

त्योहार दो दिन क्यों पड़ने लगे हैं? (सरल शास्त्रीय कारण)

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प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


परिचय

पिछले कुछ वर्षों में एक बात अक्सर देखने को मिलती है—त्योहार दो अलग-अलग दिनों में मनाए जा रहे हैं। कभी जन्माष्टमी दो दिन, कभी एकादशी दो दिन, तो कभी रक्षाबंधन को लेकर भ्रम।

असल में त्योहार नहीं बदले हैं, बल्कि उनके निर्णय के नियम और गणना-पद्धति में विविधता है।


1. हर त्योहार का निर्णय एक जैसा नहीं होता

हिंदू पंचांग में हर पर्व एक ही नियम से नहीं तय होता।

कुछ उदाहरण:

  • कुछ पर्व सूर्योदय (उदयातिथि) से तय होते हैं
  • कुछ पर्व रात्रि (निशीथ काल) से
  • कुछ प्रदोष काल या विशेष समय से

👉 इसलिए अलग-अलग पंचांग अलग दिन बता सकते हैं।


2. चंद्र तिथि कभी निश्चित समय पर नहीं बदलती

चंद्र तिथि (जैसे अष्टमी, एकादशी आदि) किसी भी समय शुरू या समाप्त हो सकती है।

इसलिए स्थिति ऐसी बनती है:

  • एक पंचांग के अनुसार आज तिथि है
  • दूसरे के अनुसार वही तिथि अगले दिन सूर्योदय पर है

👉 यही “दो दिन वाले त्योहार” का मुख्य कारण है।


3. विशेष काल का महत्व (सबसे बड़ा कारण)

कुछ प्रमुख पर्वों में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है:

  • 🌙 जन्माष्टमी → मध्यरात्रि (निशीथ)
  • 🔱 महाशिवरात्रि → पूरी रात्रि
  • 🪔 दीपावली / होलिका दहन → प्रदोष काल
  • 🧵 रक्षाबंधन → भद्रा समाप्त होने के बाद

👉 जब “दिन” और “रात्रि/विशेष काल” अलग दिनों में आते हैं, तो त्योहार दो दिन दिखाई देता है।


4. पंचांग गणना में तकनीकी अंतर

आज के पंचांग अलग-अलग आधारों पर बनते हैं:

  • पारंपरिक गणना पद्धति
  • आधुनिक खगोलीय (द्रिक) गणना
  • क्षेत्रीय परंपराएँ

👉 बहुत छोटे अंतर भी तिथि बदल सकते हैं।


5. परंपरा का अंतर भी एक कारण है

कुछ व्रतों में अलग-अलग परंपराएँ मान्य हैं:

  • स्मार्त परंपरा (गृहस्थ धर्मशास्त्र आधारित)
  • वैष्णव परंपरा (आचार्य-परंपरा आधारित)

👉 इसलिए एक ही पर्व दो अलग दिन मनाया जा सकता है।


निष्कर्ष

त्योहार वास्तव में दो नहीं हुए हैं।
अंतर सिर्फ इतना है कि—

👉 हर पर्व को देखने और तय करने के नियम अलग हैं
👉 और आज की गणना अधिक सटीक और विविध हो गई है

इसलिए सही समझ यह है:

त्योहार एक ही हैं, लेकिन उन्हें तय करने के दृष्टिकोण कई हैं।


आचार्य विजय कुमार शुक्ल 

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र 

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Saturday, May 16, 2026

दक्षिणा : केवल धन नहीं, समाज की श्रद्धा का दर्पण Dakshina: Not just money, it is a mirror of society's faith

 

दक्षिणा : केवल धन नहीं, समाज की श्रद्धा का दर्पण

Dakshina: Not just money, it is a mirror of society's faith



आज समाज में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है।
जब किसी घर में विवाह, यज्ञोपवीत, गृहप्रवेश या अन्य धार्मिक आयोजन होता है, तब लोग सजावट, भोजन, होटल, फोटोग्राफी और मनोरंजन पर लाखों रुपये खर्च कर देते हैं। हर व्यवस्था में उत्साह और सम्मान दिखाई देता है।

लेकिन जब बात आचार्य की दक्षिणा की आती है, तब अक्सर लोग संकोच करने लगते हैं। कई बार तो स्थिति ऐसी होती है कि पूरे आयोजन का सबसे कम महत्व उसी व्यक्ति को मिलता है, जिसने वैदिक मंत्रों और संस्कारों के माध्यम से उस अनुष्ठान को पूर्ण किया।

यह केवल आर्थिक विषय नहीं है। यह समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है।


दक्षिणा वास्तव में क्या है?

बहुत से लोग दक्षिणा को केवल “पंडित जी की फीस” समझते हैं।
लेकिन सनातन परंपरा में दक्षिणा का अर्थ केवल धन देना नहीं है।

दक्षिणा है—

  • श्रद्धा,
  • कृतज्ञता,
  • गुरु सम्मान,
  • और विद्या के प्रति आदर।

जब कोई आचार्य वेद-मंत्रों के साथ विवाह, यज्ञोपवीत, कथा या अन्य संस्कार सम्पन्न करता है, तब वह केवल कुछ धार्मिक क्रियाएँ नहीं कर रहा होता, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी वैदिक परंपरा को जीवित रख रहा होता है।

इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि बिना श्रद्धा और दक्षिणा के यज्ञ और संस्कार पूर्ण नहीं माने जाते।


समाज में यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?

1. धर्म अब संस्कार से अधिक आयोजन बनता जा रहा है

आज बहुत से लोगों के लिए धार्मिक कार्यक्रम आध्यात्मिक संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रदर्शन बनते जा रहे हैं।

इसलिए लोगों का ध्यान अधिकतर उन चीज़ों पर होता है जो दिखाई दें—

  • सजावट,
  • मंच,
  • भोजन,
  • कपड़े,
  • वीडियो और फोटो।

लेकिन मंत्रों की शक्ति, विधि की पवित्रता और संस्कारों का आध्यात्मिक प्रभाव दिखाई नहीं देता।
इसी कारण उनका महत्व भी कम समझा जाने लगा।


2. आचार्य के तप और अध्ययन को लोग समझ नहीं पाते

एक योग्य आचार्य बनने के पीछे वर्षों का—

  • वेद अध्ययन,
  • संस्कृत ज्ञान,
  • साधना,
  • उच्चारण अभ्यास,
  • और नियमबद्ध जीवन

होता है।

लेकिन समाज केवल पूजा के कुछ घंटे देखता है, उसके पीछे का जीवनभर का तप नहीं।




3. दिखावे की संस्कृति बढ़ गई है

आज समाज उसी चीज़ का मूल्य अधिक समझता है जो उसे तुरंत दिखाई दे।

इसलिए—

  • बैंड वालों का भुगतान तय होता है,
  • फोटोग्राफर का पैकेज तय होता है,
  • सजावट का बजट तय होता है।

लेकिन आचार्य सम्मान को कई बार “जो उचित लगे” पर छोड़ दिया जाता है।

यह स्थिति समाज की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है।


4. धार्मिक शिक्षा का अभाव

नई पीढ़ी को यह समझाया ही नहीं गया कि दक्षिणा केवल पैसा नहीं, बल्कि गुरु और विद्या के प्रति सम्मान की परंपरा है।

जब ज्ञान कम होगा, तो श्रद्धा भी धीरे-धीरे कम होने लगेगी।


एक विचारणीय स्थिति

आज कई स्थानों पर नाई, माली, बैंड वाले या अन्य सेवाकारों को—

  • न्योछावर,
  • उपहार,
  • अतिरिक्त राशि

सम्मानपूर्वक दी जाती है।

उनका सम्मान होना चाहिए, क्योंकि हर कार्य सम्माननीय है।
लेकिन प्रश्न यह है कि—

क्या संस्कार सम्पन्न कराने वाले आचार्य का सम्मान भी उसी गंभीरता से हो रहा है?

यदि पूरे आयोजन की आत्मा वैदिक संस्कार हैं, तो उनके प्रतिनिधि आचार्य का सम्मान सबसे अंत में क्यों रह जाता है?


दक्षिणा का उचित मानक क्या होना चाहिए?

शास्त्रों में दक्षिणा का कोई निश्चित “रेट” नहीं बताया गया, क्योंकि यह श्रद्धा और सामर्थ्य का विषय है।

फिर भी वर्तमान समय में एक संतुलित दृष्टि यह हो सकती है कि—

किसी भी धार्मिक आयोजन के कुल बजट का लगभग 5% से 15% भाग आचार्य सम्मान और धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए होना चाहिए।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात राशि नहीं, भावना है।

शास्त्र कहते हैं—

“श्रद्धया देयम्।”

अर्थात श्रद्धा से दिया जाए।


इस स्थिति में सुधार कैसे हो?

1. दक्षिणा को “फीस” नहीं, “आचार्य सम्मान” कहा जाए

भाषा बदलने से भावना बदलती है।


2. समाज को संस्कारों का अर्थ समझाया जाए

जब लोग समझेंगे कि मंत्र और संस्कार केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का आध्यात्मिक आधार हैं, तब सम्मान भी बढ़ेगा।


3. आचार्य वर्ग भी गरिमामय संतुलन रखे

आचार्य को अत्यधिक व्यवहारिक भी नहीं होना चाहिए और इतना संकोची भी नहीं कि समाज उसे हल्के में लेने लगे।

गरिमा, स्पष्टता और विद्वता—इन तीनों का संतुलन आवश्यक है।


4. नई पीढ़ी को शिक्षित करना होगा

यदि बच्चों को गुरु, विद्या और संस्कार का सम्मान नहीं सिखाया जाएगा, तो आने वाले समय में धर्म केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।


वास्तविक चिंता क्या है?

समस्या केवल कम दक्षिणा की नहीं है।
वास्तविक चिंता यह है कि समाज धीरे-धीरे—

  • गुरु,
  • विद्या,
  • संस्कार,
  • और धर्म की गहराई

से दूर होता जा रहा है।

यदि विद्या का सम्मान कम होगा, तो भविष्य में योग्य आचार्य भी कम होते जाएँगे।
और तब संस्कार केवल बाहरी आयोजन बनकर रह जाएँगे।


निष्कर्ष

दक्षिणा केवल धन नहीं है।
यह समाज की श्रद्धा का दर्पण है।

सजावट किसी आयोजन को भव्य बना सकती है,
लेकिन संस्कारों को पवित्र बनाने का कार्य केवल मंत्र, विद्या और श्रद्धा ही करती है।

इसलिए दक्षिणा को खर्च नहीं,
बल्कि धर्म, गुरु और संस्कृति के प्रति सम्मान के रूप में देखना चाहिए।

क्योंकि जिस समाज में आचार्य और विद्या का सम्मान बना रहता है,
वही समाज अपनी संस्कृति और आत्मा को सुरक्षित रख पाता है।

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Sunday, October 20, 2024

दीपावली पूजन 2024 dipawali pujan 2024

 दीपावली पूजन 2024







माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस बार दो दिन मनाएं दीपावली पर्व

दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष प्रदोष व्यापिनी अमावस्या को मनाई जाती है। 

इस वर्ष संवत् 2081 में कार्तिक अमावस्या 31.10 .2024 गुरुवार को दिन में 03:54 से प्रारंभ होकर अगले दिन 01 .11.2024 शुक्रवार को सायंकाल 06:17 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।


इस स्थिति में अमावस्या तिथि दोनो ही दिन प्रदोष काल में व्याप्त रहेगी।


कुछ ग्रंथकारों के अनुसार यदि कार्तिक मास की अमावस्या दोनों ही दिन प्रदोष काल में व्याप्त हो,तो ऐसी स्थिति में प्रतिपदा युक्त अमावस्या का ग्रहण करना अधिक श्रेष्ठ होता है।
इस तर्क के पीछे कारण पितृ कार्य भी है पितृ देव पूजन करने के बाद ही लक्ष्मी पूजन करना उचित कहा गया है।


पितृ देव पूजन से तात्पर्य है प्रातः काल में अभ्यंग स्नान, देव पूजन और अपराह्न में पार्वण कर्म,तत्पश्चात लक्ष्मी पूजन।


यदि दीपावली एक दिन पूर्व अर्थात 31 अक्टूबर को मनाई जाए तो यह सभी कर्म लक्ष्मी पूजन के बाद होंगे जो विपरीत दिशा निर्देश है। 


कारण  31 अक्टूबर 2024 को दोपहर बाद 03:54 मिनट से अमावस्या तिथि प्रारंभ हो रही है इसलिए यह कार्य शास्त्रोक्त नहीं होगा अतः दूसरे दिन ही अर्थात् 01नवम्बर 2024को दीपावली का पर्व शास्त्र नियम के अधीन मानना उचित रहेगा,ऐसा कुछ पंचांगकर्ताओं का मत है।


किन्तु यह सारे नियम व्यापारियों और जन सामान्य को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।
कार्तिक अमावस्या की रात्रि साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।


कार्तिक अमावस्या की रात्रि में निशीथ कालीन वेला में साधक विशेष आराधनाएं,मंत्रानुष्ठान, पाठकर्म, श्रीयन्त्र आदि का निर्माण,यंत्रों की प्रतिष्ठा,महालक्ष्मी की विशेष पूजा आदि करते हैं।
उनके मत के अनुसार रात्रिकालीन अमावस्या ही श्रेष्ठ है।


तो ऐसी स्थिति में  उनके लिए 31 अक्टूबर 2024 को ही दीपावली पर्व मनाना उचित रहेगा।


इस प्रकार अलग अलग मतानुसार दोनों ही दिन लक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ माना जाएगा।


यह विशेष बात है कि इस बार हमें दो दिन लक्ष्मी पूजन के प्राप्त होंगें।


इसे माता लक्ष्मी की कृपा समझें और श्रद्धाभाव से पूजनलाभ प्राप्त करें न कि किसी संसय में पड़े।



दीपावली पर्व का विवरण:-


29/10/2024 भौम प्रदोष व्रत, धनतेरस, यमदीपदान, धन्वंतरि जयंती पर्व।


30/10/2024 मास शिवरात्रि, नरक चतुर्दशी, दीपदान।


31/10/2024 हनुमद्दर्शन,प्रदोष काल में लक्ष्मी गणेश स्थापना पूजन,दीपावली पर्व,(अखण्ड दीप स्थापन करें) रात्रिकालीन साधना।


01/11/2024 प्रदोष काल में पुनः लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका (अखण्ड दीप स्थापन पूर्ण)।


02/11/2024 अन्नकूट, गोवर्धन पूजा, बलि पूजा।


03/11/2024 भाई दूज,यमद्वितीया, चित्रगुप्त पूजा, चन्द्र दर्शन।

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Saturday, July 6, 2024

देवताओं का पूजनक्रम और उनसे प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ The order of worship of the gods and the main benefits derived from them

 


देवताओं का पूजनक्रम और उनसे प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ
The order of worship of the gods and the main benefits derived from them

गन्ध,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्य आदि अर्पित करने से होने वाले लाभ
Benefits of offering fragrance, flowers, incense, lamps, offerings etc



कहा गया है कि "देवो भूत्वा देवं यजेत्"देवता की तरह बनकर देवता की पूजा अर्चना करनी चाहिए।
अर्थात् चित्त के द्वारा उस आराध्य देव की छवि अपने हृदय में धारण करके आराध्य देव की पूजा अर्चना की जाय तो वह पूजा विशेष फल देने वाली होती है।


हमारे आराध्य देव हमारी किसी भी सेवा को यूँही नही लेते हैं हम जो भी वस्तु उनको अर्पण करते हैं या चढ़ाते हैं, उसका भी फल प्राप्त होता है।


हम नित्य पूजनादि में देवताओं को वस्त्र,फलादि वस्तुएं अर्पण करते हैं।इनका एक क्रम होता है तो आइए जानते हैं कि उनसे प्राप्त होने वाले लाभ/फल क्या है?


सर्वप्रथम हम पूजन की तैयारी करने के बाद आराध्य देव का ध्यान आवाहन करते हैं-


1-ध्यान/आवाहन-देवसानिध्य।
देवता की मूर्ति को अपने ह्रदय में धारण करते हुए उन्हें पूजन हेतु निमंत्रित किया जाना आवाहन कहलाता है, इससे देवता का सानिध्य प्राप्त होता है।


2-आसन-स्थिरता की प्राप्ति।आवाहन के पश्चात देवता को सामने उपस्थित आसन पर स्थित होने की प्रार्थना करनी चाहिए,इससे स्थिरता की प्राप्ति होती है।


3-पाद्य- अर्थात् देवता के स्वागत हेतु उनके पादप्रक्षालन से पातक नष्ट होते हैं।


4-अर्घ्य-अनर्घ्य अर्थात् मन की दुविधा को मिटाता है।


5-आचमन -सुचित्त सुखी,आंच मन की मिटती है,अर्थात् मन के क्लेश मिटते हैं।


6-स्नान-मल नाश अर्थात् व्याधि हरण।


7-वस्त्र-आराध्य देव के निमित्त वस्त्र अर्पित करने से आयुष्य वर्धन होता है।


8-उपवीत-अर्थात् यज्ञोपवीत आराध्य देव को अर्पित करने से ब्रह्मवेत्ता होता है या ईश्वर के सानिध्य का मार्ग प्रशस्त होता है। 


9-आभूषण-अर्पित करने से धन और ऐश्वर्य प्राप्ति होती है।


10-गन्ध-रोली,चन्दन, कुमकुम, इत्र आदि के अर्पण करने से काम अर्थात् मनोकामना पूर्ति होती है।


11-अक्षत-आराध्य देव को अक्षत(साबुत चावल)अर्पित करने से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।


12-नाना पुष्प-आराध्य देव को विभिन्न प्रकार के पुष्प अर्पित करने से राज्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


13-धूप-आराध्य देव को उत्तम औषधियों से निर्मित सुगंधित धूप अर्पित करने से पापों का नाश होता है।


14-दीप-दीपो मृत्युविनाशनः अर्थात् अज्ञान रूपी अंधकार का विनाश होता है।


15-नैवेद्य-"सर्वमानस्तु तृप्तिरतोभवेत्"अर्थात् फल मिष्ठान आदि अर्पण करने से तृप्ति की अनुभूति होती है,और समाज में सम्मान की प्राप्ति होती है।


16-ताम्बूल-अर्थात् पान सुपाड़ी लौंग इलायची आदि के अर्पण करने से कीर्ति या प्रसिद्धि की प्राप्ति होती है।


17-दक्षिणा-द्रव्य अर्थात् धन के रूप में दक्षिणा अर्पण करने से पूर्ति की प्राप्ति होती है,इससे पूजन पूर्ण होता है।


18-नीराजन-तत्पश्चात आराध्य देव की आरती करने से आत्मशुद्धि होती है।


19-प्रदक्षिणा-पुनः आराध्य देव की प्रदक्षिणा करने से पापों का हरण हो जाता है,मन में पापों के कारण उत्पन्न क्षोभ मिट जाता है।


20-दण्डप्रणाम-अपने आप को आराध्य देव को प्रणाम करके समर्पित करने से  देव का सानिध्य प्राप्त हो जाता है।


21-स्तोत्र और पुराणादि पठन-पुनः आराध्य देव के निमित्त स्तुति आदि करने से सर्वपापक्षय होकर मन निर्मल हो जाता है।


इस प्रकार जाने-अनजाने पूजन में की गई कोई भी वस्तु अर्पण करने पर उसका फल प्राप्त होता है।
हमें श्रद्धा भाव से नित ही प्रभु का पूजन करना चाहिए।

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Friday, June 9, 2023

संकटा स्तोत्र sankata stotra

संकटा स्तोत्र sankata stotra



जीवन में विविध संकटों से मुक्ति, बाधाओं/संकटों का निवारण करें इस संकटा स्तोत्र के द्वारा।       
सर्वकामना की पूर्ति हेतु प्रतिदिन संकटा स्तोत्र का पाठ करें।

संकटा-स्तोत्र

नमो काशिनी वासिनी गंग तीरे।
सदा अर्चितं चंदनं रक्त पुष्पं।।
सदा वंदितं पुजितं सर्व देवं।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो मोहिनी मोहितं भूत सैन्यै।
सदा चन्द्र बदनी हंसै विकरालम्।।
सदा मृगनयनी गुणा रूप वरणी।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो खड्गहस्ते गले रूण्डमाला।
नमो गर्जितं भूमि कंपायमानम्।।
सदा मर्दितं भूत महिषासुरेण।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो मुक्ति देवी नमो वेदमाता।
सदा योगिनी ,योगिनी , योग गम्या।।
सदा कामिनी मोहितं काम राज्यं।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
नमो पुष्प शय्या गले मुण्डमाला।
सदा कोकिला कांचन रूप वरणी।।
सदा रणविषे शत्रु संहारकरणी।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
इदं पंचरत्नं पठेत् प्रात: काले।
हरे पाप तन के बढे धर्म ज्ञानम्।।
सदा दुख:मे कष्ट मे रक्ष पालम्।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
तू ही संकटे योगिनी योग धारय।
तू ही कामिनी मोहितं काम राज्यं।।
तू ही विश्वमाता करे खड्गधारम्।
नमो संकटा कष्ट हरणीं भवानी।।
संकटा अष्टकम् इदं पुण्यं प्रातः काले पठेन्नर:।
तस्य पीड़ा विनिष्यन्ति सर्व काम: फलं लभेत्।।

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Tuesday, February 28, 2023

गोमय दीपदान gomay deepdan

 गोमय दीपदान gomay deepdan

यश,धन,समृद्धि, पुत्र, दीर्घायु, ग्रह दोष,अरिष्ट और बाधा नाश के लिए करें गोमय दीपदान




दीपक ज्ञान, प्रकाश, भयनाशक, विपत्तियों व अंधकार के विनाश का प्रतीक है।  गोमय दीपदान किसी भी विपत्ति के निवारणार्थ श्रेष्ठ उपाय है।
हमारे शास्त्रों में दीपदान की विशेष महिमा है।मान्यता है कि दीपदान व्रत योग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य देवमंदिर अथवा ब्राह्मण के घर में एक वर्ष तक दीपदान करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। चातुर्मास्य में दीपदान करने वाला श्रीविष्णु भगवान के धाम, कार्तिक मास में दीपदान करने वाला स्वर्गलोक तथा श्रावण मास में दीपदान करने वाला भगवान शिव के लोक को प्राप्त कर लेता है। चैत्र मास में मां भगवती के मंदिर में दीप जलाने से व्यक्ति मां जगदम्बा के नित्य धाम को प्राप्त करता है। दीपदान से दीर्घ आयु और नेत्र ज्योति की प्राप्ति होती है। दीपदान से धन और पुत्र आदि की भी प्राप्ति होती है। दीपदान करने वाला व्यक्ति सौभाग्य युक्त होकर स्वर्ग लोक में देवताओं द्वारा पूजित होता है।

गोमय दीपदान का महत्व

अत्यंत सुगमता से किया जाने वाला यह एक ऐसा वैदिक विधान है जो किसी यज्ञ के बराबर फल देने वाला है।यदि संभव हो तो किसी योग्य ब्राह्मण के सान्निध्य में दीपदान की प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए। 

गोमय दीपदान का समय निर्धारण

ऋतु-दीपदान हेतु बसन्त, हेमन्त, शिशिर, वर्षा व शरद ऋतु उत्तम मानी गई है।

मास-वैशाख, श्रावण, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन मास श्रेष्ठ है।

पक्ष-शुक्ल पक्ष दीपदान के लिए अधिक उत्तम होता है।

तिथि-प्रथमा, द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी,नवमी,एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी,चतुर्दशी,अमावस्या व पूर्णिमा तिथि गोमय दीपदान के लिए श्रेष्ठ होती है।

नक्षत्र-इन नक्षत्रों में गोमय दीपदान करना चाहिए। जैसे-रोहिणी, आर्दा, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, स्वाती, विशाखा, ज्येष्ठा और श्रवण।

योग-सौभाग्य, शोभन, प्रीति, सुकर्म, वृद्धि, हर्षण, व्यतीपात और वैधृत योगों में गोमय दीपदान करना अत्यंत लाभप्रद होता है।

विशेषः-सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, संक्रान्ति, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवरात्र एवं महापर्वो पर गोमय दीपदान करना विशेष फलदायक रहता है।

गोमय दीपदान का समय-प्रातः, सायं, मध्यरात्रि तथा अन्य यज्ञकर्म की पूर्णाहूति से पहले किया जाना चाहिए।

कहां करते हैं गोमय दीपदान?

1. देवमंदिर में करते हैं दीपदान। 

2. विद्वान ब्राह्मण के घर में करते हैं दीपदान।

3. नदी के किनारे या नदी में करते हैं दीपदान।

4. दुर्गम स्थान अथवा भूमि (धान के उपर) पर करते हैं दीपदान।


5.अश्वत्थ अर्थात् पीपल तुलसी आदि पूजनीय वृक्ष के समीप करते हैं दीपदान।


6.चौराहा, मार्ग पर करते हैं दीपदान।


7.आकाश में करते हैं दीपदान।


कैसे करते हैं गोमय दीपदान?

1. गोमय के दिये में घी डालकर उससे मंदिर में ले जाकर जलाकर उसे वहां पर रख दें। दीपों की संख्या और बत्तियां खास समयानुसार और मनोकामना अनुसार रखी जाती है।

2. गोमय दीपक बनाकर उसमें घी डालकर रुई की बत्ती जलाकर उसे पीपल या बड़(बरगद) के पत्ते पर रखकर नदी में प्रवाहित किया जाता है।

3. देवस्थल/मन्दिर में गोमय दीपक को किसी आधार पर सप्तधान या चावल के उपर ही रखकर जलाते हैं। भूमि पर रखने से भूमि को आघात लगता है।

कब करते हैं गोमय दीपदान?

1. सभी स्नान पर्व और व्रत के समय दीपदान करते हैं। 

2. धनतेरस, रूपचतुर्दशी या नरकचतुर्दशी और यम द्वितीया के दिन दीपदान करते हैं।

3. दीपवली, अमावस्या या पूर्णिमा के दिन करते हैं दीपदान।

4. दुर्गम स्थान अथवा भूमि पर दीपदान करने से व्यक्ति नरक जाने से बच जाता है।

5. पद्मपुराण के उत्तरखंड में स्वयं महादेव कार्तिकेय को दीपावली, कार्तिक कृष्णपक्ष के पांच दिन में दीपदान का विशेष महत्व बताते हैं।

कृष्णपक्षे विशेषेण पुत्र पंचदिनानि च।

पुण्यानि तेषु यो दत्ते दीपं सोऽक्षयमाप्नुयात्।

अर्थात कृष्णपक्ष में रमा एकादशी से दीपावली तक 5 दिन बड़े पवित्र है। उनमें जो भी दीप आदि का दान किया जाता है, वह सब अक्षय और सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है।

गोमय दीपदान करने के फायदे :

1. अकाल मृत्यु से बचने के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

2. अपने मृ‍तकों की सद्गति के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

3. लक्ष्मी माता और भगवान विष्णु को प्रसन्न कर उनकी कृपा हेतु करते हैं गोमय दीपदान।

5. यम, शनि, राहु,केतु और अन्य ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

6. सभी तरह की बाधाओं, गृहकलह और संकटों से बचने के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

7. जीवन से अंधकार मिटे और उजाला आए इसीलिए करते हैं दीपदान।

8. मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

9. किसी भी तरह की पूजा या मांगलिक कार्य की सफलता हेतु करते हैं गोमय दीपदान।

10. घर में धन समृद्धि बनी रहे इसीलिए भी कहते हैं गोमय दीपदान।

11. कार्तिक माह में भगवान विष्णु या उनके अवतारों के समक्ष गोमय दीपदान करने से समस्त यज्ञों, तीर्थों और दानों का फल प्राप्त होता है।

12. कांति, ओज, और तेज के लिए करते हैं गोमय दीपदान।

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गोमय श्रीयंत्र Gomaya Shreeyantra

Friday, February 10, 2023

गोमय श्रीयंत्र Gomaya Shreeyantra

गोमय श्रीयंत्र 

Gomaya Shreeyantra



कहा गया है "गोमय वसते लक्ष्मी"अर्थात् गाय के गोबर में माता लक्ष्मी का वास होता है।इसलिए किसी भी पूजन में गाय के गोबर का प्रयोग अवश्य किया जाता है।और माता भगवती गौरी आदि का स्वरूप गोमय से निर्मित कर उनकी पूजा की जाती है।
गोमय श्रीयंत्र साक्षात् श्री लक्ष्मी देवी का स्वरूप माना जाता है। जिस घर में अथवा प्रतिष्ठान में गोमय श्रीयंत्र की विधिवत स्थापना करके नित्य पूजा की जाती है। उस स्थान में माँ भगवती लक्ष्मी साक्षात् विद्यमान होती हैं,वहाँ कभी भी धनधान्य ऐश्वर्य आदि की कमी नहीं रहती है।
अतः यदि हमारे व्यापार में निरंतर हानि होती जा रही है घर में बढ़ोत्तरी नहीं होती है धन नहीं रुकता है तो निश्चित रूप से माँ भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए सिद्ध गोमय श्रीयंत्र की स्थापना करनी चाहिए।इससे माँ भगवती लक्ष्मी की कृपा होगी और धन ऐश्वर्य आदि सकल मनोकामना सिद्ध होती है।

गोमय श्रीयंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्तों में किया जाता है।
जैसे- गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी(धनतेरस), होली,दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया,माघ पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, महाशिवरात्रि पर्व आदि में गोमय श्रीयंत्र निर्माण किया जाता है।

उपरोक्त सभी मुहूर्तों में और पञ्चमी तिथि, बुधवार, और शुक्रवार को अपने घर/प्रतिष्ठान में गोमय श्रीयंत्र को स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है।

जन्मपत्रिका में स्थित केमद्रुम, दरिद्र, शकट, ऋण, दुर्भाग्य,आदि विभिन्न कुयोगों को दूर करने में गोमय श्रीयंत्र अत्यंत प्रभावकारी है। यह मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाला है। इसकी कृपा से मनुष्य को अष्ट सिद्धि व नौ निधियों की प्राप्ति हो सकती है। गोमय श्रीयंत्र के पूजन से सभी रोगों का शमन होता है और शरीर की कान्ति निर्मल होती है। इसकी पूजा से शक्ति स्तंभन होता है व पञ्चतत्वों पर विजय प्राप्त होती है।
गोमय श्रीयंत्र की कृपा से मनुष्य को धन, समृद्धि, यश, कीर्ति, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है।
सारे रुके हुए कार्य बनते हैं। 
दुःख दारिद्र्य का नाश होता है।
गोमय श्री यंत्र की साधना/उपासना से साधक की शारीरिक और मानसिक शक्ति पुष्ट होती है। 
गोमय श्रीयंत्र की साधना से आर्थिक उन्नति होती है और व्यापार में सफलता मिलती है।

नोट-

●क्या आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर है?
●क्या आपके पास पैसा टिकता नही है?
●क्या आपके व्यापार में अनावश्यक उतार चढ़ाव होता है?
●क्या आप गृह क्लेश से पीड़ित हैं?
●क्या आप हर समय किसी न किसी परेशानी से घिरे रहते हैं?
●क्या आपके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है?

यदि हाँ तो शीघ्र ही अपने यहाँ सिद्ध गोमय श्रीयंत्र स्थापित करें।

हमारे प्रतिष्ठान में विद्वान आचार्यो द्वारा सिद्ध गोमय श्रीयंत्र प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप पर संपर्क करें ।

प्राकृत भविष्य दर्शन
आचार्य विजय कुमार शुक्ल
कानपुर(उत्तर प्रदेश) 208021
WhatsApp-8574763197

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Monday, August 15, 2022

शिव वास shiv vas

शिव वास shiv vas

शिवोपासना रुद्राभिषेक शिवार्चन आदि में शिव वास का विचार

किसी कामना, ग्रहशांति आदि के लिए किए जाने वाले शिवोपासना,रुद्राभिषेक,शिवार्चन आदि में शिव वास का विचार करने पर ही अनुष्ठान सफल होता है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।यह नारद प्रणीत कहा गया है क्योंकि सर्वप्रथम नारदजी ने ही इसको देवताओं को बताया था।

कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।

शिव वास का विचार सकाम इच्छायुक्त अनुष्ठान/पूजन आदि में किया जाता है।

किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

नित्य और निष्काम भाव से शिवपूजन, रुद्राभिषेक, शिवार्चन आदि में शिव वास का विचार करने की आवश्यकता नहीं होती है।इसके अतिरिक्त ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है।

वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपा पात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं।

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है।और जब वो प्रसन्न होते हैं तो प्रारब्ध भी अनुकूल हो जाता है।

इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।और भगवान् शिव सबका कल्याण करते हैं।



(शिववास कारिका) अर्थात् शिववास ज्ञात करने का सूत्र

तिथिं च द्विगुणीं कृत्य बाणै: संयोजयेत्तदा।।

सप्तमिश्च हरेत्भागं शिववासं समुद्दिशेत्।।

एकेन वास: कैलासे द्वितीये गौरिसन्निधौ।।

तृतीये वृषभारूढ़: सभायां च चतुष्टये।।

पंचमे भोजनेचैव क्रीड़ायां षण्मिते तथा।।

श्मशाने सप्तशेषे च शिववास इतीरत:।।

कैलाशे लभते सौख्यं गौर्यां च सुखसम्पदा।

वृषभे८भीष्टसिद्धि: स्यात् सभा संतापकारिणी।।

भोजने च भवेत् पीड़ा क्रीडायां कष्टमेव च।।

श्मशाने मरणं ज्ञेयं फलमेव विचारयेत्।।

अर्थात्- शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से वर्तमान तिथि की संख्या को दुगुना कर दें। यदि कृष्ण पक्ष की तिथि हो तो उसमें १५ और जोड़ने के बाद दुगुना करें। उस संख्या में ५ और जोड़कर ७ का भाग दें।

प्राप्त शेष अंक के अनुसार शिव वास का ज्ञान प्राप्त करें।




उदाहरण-शुक्ल पक्ष में ५ तिथि को लेते हैं।

५+५=१० द्विगुणित

१०+५=१५ नियमानुसार

७)१५(२

    १४

-------

   १ शेष

अर्थात् भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं और इस दिन पूजन करने से कल्याण करते हैं।


इसी प्रकार कृष्ण पक्ष में ४ तिथि को उदाहरण स्वरूप लेते हैं।

४+१५=१९×२=३८ द्विगुणित

३८+५=४३ नियमानुसार

७)४३(६

    ४२

-------

१ शेष

अर्थात् इस दिन भगवान शिव का पूजन कल्याणकारी होगा और मनोकामना पूर्ति होगी।

इसी प्रकार दोनो पक्षों की अन्य तिथियों की गणना करनी चाहिए।

०- इस समय भूतभावन श्मशान में बात कर रहे हैं। उस समय वे विनाशक शक्तियों से घिरे होते हैं। ऐसे समय में जो उनके पास जाता है उसे वे मृत्युदायक होते हैं। यह शिववास अशुभ है।

१- भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में कैलाश पर्वत पर बैठे हैं तथा उस समय जो उनकी उपासना करते हैं उसे वे संपूर्ण सौख्य आदि प्रदान करते हैं। इस शिववास से भोग-मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यह शिववास शुभ है।

२- मां गौरी के समीप बैठे हैं। माता पार्वती जगत् के दीन-हीन पुत्रों के दुखों की चर्चा कर रही हैं। यह सुनकर उनका चित्त करुणार्द्र हो रहा है। ऐसे समय में पूजन करने से अतुल संपत्ति शालीनता आदि की कृपा सहज में कर देते हैं। यह शिववास भी शुभ है।

३-भगवान शंकर वृषभ की सवारी पर बैठे आनंदित हो रहे हैं। यत्र-तत्र-सर्वत्र भ्रमण करते हुए याचना करने वालों की समस्त कामनाओं की पूर्ति करते हैं। यह शिववास भी शुभ है।

४- इस समय शिवजी सभा में बैठे हैं तथा विविध विषयों पर सभासदों के साथ विचार विमर्श कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में संताप दायक होते हैं। यह शिववास अशुभ है।

५- इस समय भगवान शंकर भोजन करते रहते हैं। भोजन में विघ्न होने से रुष्ट होते हैं। पूजन करने वाले को पीड़ा देते हैं।वे उस समय जो दुनिया के पाप दोष खा रहे होते हैं वह प्रसाद रूप से दे देते हैं। यह शिववास अशुभ है।

६- इस समय शिव क्रीड़ारत। हैं। इस समय विघ्न करने से पीड़ा, पराजय, हानि आदि फल प्राप्त होते हैं। यह शिववास भी अशुभ है।

ये सात शिव वास होते हैं।इनमे से तीन शिव वास शुभ होते हैं और चार अशुभ।इसे हम सारिणी में देख सकते हैं।

शिव वास सारिणी
इस प्रकार शिववास का ज्ञान करने के बाद जो शिवपूजन आरंभ किया जाता है वह शुभ फलदायक होता है। शिवोपासना रुद्राभिषेक और शिवार्चन में यह अत्यावश्यक अंग है।इस सूत्र के अनुसार कृष्ण पक्ष में १-४-५-८-११-१२-३० तथा शुक्ल पक्ष में २-५-६-९-१२-१३ इन तिथियों में शिववास होता है।अर्थात् रुद्राभिषेक, शिवोपासना, शिवार्चन आदि के लिए प्रतिमाह तेरह दिन शिव वास के और एक दिन शिवरात्रि का प्राप्त होता है।

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Monday, August 8, 2022

अथ प्रज्ञावर्धनस्तोत्रम् Ath Pragyavardhana Stotram

 प्रज्ञावर्धन स्तोत्र

अक्सर विद्यार्थियों के सामने यह समस्या आती है कि उनकी विद्याध्ययन में रुचि न होना, पढ़ने में मन का न लगना, उनमें एकाग्रता की कमी,पढ़ा हुआ याद न रहना, पढ़ा हुआ मौके पर भूल जाना आदि।

और इन सब के कारण उनकी अंक प्रतिशत में कमी आती है जिससे उनकी योग्यता पर प्रभाव पड़ता है।यद्यपि इन सब में जन्मपत्रिका में उपलब्ध ग्रहयोग भी मुख्य भूमिका निभाते हैं।
किन्तु प्रज्ञावर्धन स्तोत्र का अपना महत्व है।

विद्याध्ययन करने वाले अर्थात् विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी यह प्रज्ञावर्धन स्तोत्र स्वामी कुमार को समर्पित है।

इसमें स्कन्द के अट्ठाईस नामों का संकलन है।इसके प्रतिदिन 10 या108 पाठ करने का विधान है।इसको अश्वत्थ (पीपल)वृक्ष के मूल अर्थात् जड़ के पास बैठकर पढ़ना चाहिए।अपने घर के मन्दिर में बैठकर भी इसका पाठ कर सकते हैं।

इसके अनुष्ठान से साधकों/विद्यार्थियों को विलक्षण प्रतिभा और वाचाशक्ति की प्राप्ति होती है।तथा स्मरणशक्ति व एकाग्रता में वृद्धि होती है।

इसके अनुष्ठान के लिए इसे पुष्य नक्षत्र में आरम्भ करके पुनः पुष्य नक्षत्र आने तक नित्य करना चाहिए।और सम्भव हो तो अनुष्ठान के दिनों में मयूर (peacock) को तण्डुलादि का भोजन कराना चाहिए।

इससे इसकी सिद्धि प्राप्त होती है।अत्यधिक आवश्यक होने पर इस प्रयोग को आचार्यों के द्वारा सम्पन्न कराना चाहिए।




अथ प्रज्ञावर्धनस्तोत्रम्
Ath Pragyavardhana Stotram

             ।। श्री गणेशाय नमः ।।

अथास्य प्रज्ञावर्धन-स्तोत्रस्य भगवान् शिव- ऋषि: अनुष्टुप्छन्दः स्कन्द-कुमारो देवता प्रज्ञासिद्ध्यर्थं जपे विनियोग: इति संकल्प:।

योगेश्वरो महासेन: कार्तिकेयोग्निनंदन: ।
स्कन्द:कुमार: सेनानी स्वामी शंकरसंभव: ।।1।।

गाङ्गेयस्ताम्रचूडश्च ब्रम्हचारी शिखिध्वज: ।
तारकारिरुमापुत्र: क्रौञ्चारिश्च षडाननः ।।2।।

शब्दब्रम्हसमूहश्च सिद्ध: सारस्वतो गुहः ।
सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षप्रदः प्रभु:।।3।।

शरजन्मा गणाधीश: पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत् ।
सर्वागमप्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शक: ।।4।।

अष्टाविंशति नामानि मदीयानीति यः पठेत् ।
प्रत्यूषे श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ।।5।।

महामन्त्रमयानीति मम नामानि कीर्तयेत् ।
महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।6।।
पुष्यनक्षत्र मारभ्य पुनः पुष्ये समाप्य च।
अश्वत्थमूले प्रतिदिनं दशवारं तु सम्पठेत्।।7।।

सप्तविंश-दिनैरेकं पुरश्चरणकं भवेत्।।

।। इति श्री रूद्रयामले प्रज्ञावर्धनस्तोत्रम् संपूर्णम् ।।

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Sunday, August 7, 2022

शिवोपासना या रुद्राभिषेक shivopasana rudrabhishek

 शिवोपासना या रुद्राभिषेक




शिव की उपासना के लिए कहा गया है

"जगतः पितरौवन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ"

शिव शब्द स्वयं कल्याण वाचक है।यह शिवशक्ति दोनों का उद्बोधक भी है।शिव उच्चारण करने मात्र से विश्व के उत्पादक-पालक एवं संहारक प्रकृति पुरुषात्मक ब्रह्म का स्मरण हो जाता है।

भगवान शिव तो विश्वरूप है उनका ना कोई स्वरूप है ना कोई चिन्ह है ऐसी अवस्था में उनका पूजन कहां और कैसे किया जाए? क्योंकि पृथ्वी जल वायु तेज आकाश सूर्य चन्द्रमा आत्मा आदि सभी में शिव तत्व विद्यमान है।

चिन्तन करने पर यह समझ में आता है कि सभी में एक गोलाकृति का गुण समान रूप से विद्यमान है। अतएव उसी आकृति को चिन्ह मानकर कर उसे शिवलिंग कह कर उसकी उपासना आरम्भ हो गयी। क्योंकि शिव ने सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु दोनों को इसी रूप में दर्शन कराया था।

इसलिए संसार में लिङ्गोपासना के विविध विधान बताए गए हैं। चारों वेदों में यजुर्वेद यजन का प्रतीक है। इसी से प्रायः सभी वैदिक उपासनाएँ संपन्न होती हैं।

वैदिक-विधान में प्रायः रुद्राष्टाध्यायी का ही प्रयोग प्रचिलित है।इसका पाठ कई प्रकार से करते हुए भक्तजन शिवोपासना करते हैं।

वे अवघड़दानी महेश्वर एक ॐ के उच्चारण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं फिर वेद स्तुति करने वालों को क्या फल देंगे।अर्थात् उनकी सभी मनोकामनाओं को सहज ही पूर्ण कर देते हैं।

सर्वदोष नाश और मनोकामना पूर्ति  के लिये रुद्राभिषेक विधान

वेदों में कहा गया है कि शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है। क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं।

हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ विधान माना गया है। रूद्र शिव जी का ही एक स्वरूप हैं। रुद्राभिषेक मंत्रों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में भी किया गया है। शास्त्र और वेदों में वर्णित हैं की शिव जी का अभिषेक करना परम कल्याणकारी है।

शिव के मस्तक पर किए किया जाने वाला घटाभिषेक अग्नि द्वारा सोमपान का ही रूपक है प्रत्येक शरीर के भीतर प्रकृति की ओर से यह अभिषेक हो रहा है जब तक यह अभिषेक चल रहा है तब तक शिवत्व है। जहां यह बंद हुआ तभी शिव यम हो जाता है और संहारक बन जाता है।

शिवार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पातक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।

रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।

वैसे तो रुद्राभिषेक किसी भी दिन किया जा सकता है परन्तु त्रयोदशी तिथि,प्रदोष काल और सोमवार को रुद्राभिषेक करना परम कल्याणकारी है। श्रावण मास में किसी भी दिन किया गया रुद्राभिषेक अद्भुत व शीघ्र फल प्रदान करने वाला होता है।

रुद्राभिषेक क्या है ?

अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ है – स्नान करना अथवा कराना। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान रुद्ररूप शिव को कराया जाता है।

वर्तमान समय में अभिषेक रुद्राभिषेक के रुप में ही विश्रुत है। अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है रुद्राभिषेक। वैसे भी अपनी जटा में गंगा को धारण करने से भगवान शिव को जलधाराप्रिय कहा गया है।

रुद्राभिषेक क्यों किया जाता हैं?

रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते है उसका कारण हम सब स्वयं ही है हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं।

रुद्राभिषेक का आरम्भ कैसे हुआ ?

प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जब अपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है।

परन्तु ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि अन्त जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो हार मान लिया और लिंग का अभिषेक किया, जिससे भगवान प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक का आरम्भ हुआ।

जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है वह विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है उसे शीघ्र ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

जो व्यक्ति जिस कामना की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक करता है वह उसी प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करता है अर्थात यदि कोई पशु/वाहन प्राप्त करने की इच्छा से रुद्राभिषेक करता है तो उसे दही से अभिषेक करना चाहिए।

यदि कोई रोग दुःख आदि व्याधियों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे कुशा के जल से अभिषेक करना या कराना चाहिए।

रुद्राभिषेक पाठ एवं उसके भेद

शास्त्रों और पुराणों में पूजन के कई प्रकार बताये गए है लेकिन जब हम शिव लिंग स्वरुप महादेव का अभिषेक करते है तो उस जैसा पुण्य अश्वमेघ जैसे यज्ञों से भी प्राप्त नही होता  है।

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते हैं । संसार में ऐसी कोई वस्तु , कोई भी वैभव , कोई भी सुख , ऐसी कोई भी वास्तु या पदार्थ नही है जो हमें अभिषेक से प्राप्त न हो सके! वैसे तो अभिषेक कई प्रकार से बताये गये है ।यथा-

(1) रूपक या षडंग पाठ - रूद्र के छः अंग कहे गये है इन छह अंग का यथा विधि पाठ षडंग पाठ कहा गया है ।

इस प्रकार - सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी के दस अध्यायों का पाठ रूपक या षडंग कहलाता है ।

(2) रुद्र या एकादिशिनि - रुद्राध्याय की ग्यारह आवृति को रुद्र या एकादिशिनी कहते है रुद्रो की संख्या ग्यारह होने के कारण ग्यारह अनुवाद में विभक्त किया गया है।यह नमक-चमक के नाम से भी प्रसिद्ध है।

(3) लघुरुद्र- एकादिशिनी  की ग्यारह आवृतियों के पाठ को लघुरुद्र कहा गया है।यह लघु रूद्र अनुष्ठान एक दिन में ग्यारह ब्राह्मणों का वरण करके एक साथ संपन्न किया जा सकता है । तथा एक ब्राह्मण द्वारा अथवा स्वयं ग्यारह दिनों तक एक एकादिशिनी पाठ नित्य करने पर भी लघु रूद्र संपन्न होता है।

(4) महारुद्र -- लघु रूद्र की ग्यारह आवृति अर्थात एकादिशिनी रुद्री का 121 आवृति पाठ होने पर महारुद्र अनुष्ठान होता है । यह पाठ ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा 11 दिन तक कराया जाता है ।

(5) अतिरुद्र - महारुद्र की 11 आवृति अर्थात एकादिशिनी रुद्री का 1331 आवृति पाठ होने से अतिरुद्र अनुष्ठान संपन्न होता है ये (1)अनुष्ठानात्मक 

(2) अभिषेकात्मक 

(3) हवनात्मक , तीनो प्रकार से किये जा सकते है शास्त्रों में इन अनुष्ठानो का अत्यधिक महत्व और पुण्य लाभ बताया गया है।

रुद्राभिषेक से लाभ

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

रुद्राभिषेक अनेक पदार्थों से किया जाता है और हर पदार्थ से किया गया रुद्राभिषेक अलग फल देने में सक्षम है जो की इस प्रकार से बताया गया है-

◆जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि होती है।

◆कुशा जल से अभिषेक करने पर रोग, दुःख आदि व्याधियों का निवारण होता है।

◆दही से अभिषेक करने पर पशु,भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

◆गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

◆मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर धन वृद्धि के लिए। 

◆तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

◆इत्र मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट होते हैं ।

◆दुग्ध से अभिषेक करने से पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण होती है।

◆गंगाजल से अभिषेक करने से ज्वर ठीक हो जाता है।

◆दुग्ध शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।

◆घी से अभिषेक करने से वंश का विस्तार होता है।

◆सरसों के तेल से अभिषेक करने से रोग तथा शत्रु का नाश होता है।

◆शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से पाप क्षय अर्थात् पापों का निवारण होता है।तथा कोष की प्राप्ति होती है।

नाना प्रकार के शिवलिंग का पूजन-

शिवजी को अनन्त मानते हुए उनका पूजन विभिन्न वस्तुओं एवं नाना प्रकार के लिगों पर होता है।

◆चांदी के लिंग का पूजन करने से पितरों की मुक्ति होती है। ◆स्वर्ण लिंग से वैभव एवं सत्य लोक की प्राप्ति होती है।

◆ताम्र एवं पीतल के लिंग से पुष्टि एवं कांसे के लिंग से सुंदर यश की प्राप्ति होती है।लौह लिंग से मारण सिद्धि होती है। ◆स्तंभन के लिए हल्दी का लिंग, आयु-आरोग्यता के लिए शीशे के लिंग का पूजन करना शुभ फलदायी होता है। 

◆रत्न लिंग श्रीप्रद होता है।

◆गोमय से निर्मित लिंग का स्वयं पूजन करने से अतुल ऐश्वर्य प्राप्त होता है, किंतु दूसरे के लिए करने पर मारक होता है। इसी प्रकार से और भी अनेक अनेक प्रकार के लिंगो का वर्णन मिलता है। इनका अर्चन विभिन्न कामनाओं के लिए किया जाता है। इस पर भी पार्थिवेश्वर का पूजन सर्वप्रचिलित एवं शुगम बताया गया है इससे चतुर्वर्ग की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूज अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति होती है।

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Sunday, October 24, 2021

दीपावली पर्व Deepawali Parva

 दीपावली पर्व Deepawali Parva



दीपावली  (व्रतोत्सव) के अनुसार लोक प्रसिद्धि में प्रज्ज्वलित दीपकों की पंक्ति लगा देने से "दीपावली" और स्थान-स्थान में मण्डल बना देने से "दीपमालिका" बनती है,अतः इस रूप में यह दोनों नाम सार्थक हो जाते हैं।इस प्रकार की दीपावली या दीपमालिका संपन्न करने से  'कार्तिके मास्यमावास्या तस्यां दीप प्रदीपनम्।शालायां ब्राह्मण: कुर्यात् स गच्छेत् परमं पदम्।।'के अनुसार परमपद प्राप्त होता है।  ब्रह्मपुराण में लिखा है कि कार्तिक की  अमावस्या को अर्धरात्रि के समय  माता लक्ष्मी सद्गृहस्थों के मकानों/ भवनों में जहांँ-तहांँ विचरण करती हैं।  इसलिए अपने मकानों को सब प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित करके दीपावली अथवा दीपमालिका बनाने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उनमें स्थाईरूप से निवास करती हैं। इसके अलावा वर्षा काल के किए हुए दुष्कर्म ( जाले, मकड़ी, धूल-धमासे और दुर्गंध आदि) दूर करने के हेतु से भी कार्तिक की अमावस्या को दीपावली लगाना हितकारी होता है। यह अमावस्या प्रदोष काल से अर्ध रात्रि तक रहने वाली श्रेष्ठ होती है। यदि वह अर्धरात्रि तक ना रहे तो प्रदोष व्यापिनी लेना चाहिए।

लक्ष्मी पूजन- कार्तिक कृष्ण अमावस्या अर्थात् दीपावली के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर "मम सर्वापच्छान्ति पूर्वक दीर्घायुष्य बलपुष्टि नैरुज्यादि सकलशुभ फल प्राप्त्यर्थं गज तुरग रथ राज्य ऐश्वर्य आदि सकल सम्पदामुत्तरोत्तराभि वृध्यर्थम् इन्द्र कुबेर सहित श्रीलक्ष्मी पूजनं करिष्ये।"
यह संकल्प करके दिन भर व्रत रखें और सायंकाल के समय पुनः स्नान करके पूर्वोक्त प्रकार की "दीपावली", "दीपमालिका" और "दीपवृक्ष" आदि बनाकर कोषागार अर्थात खजाने में या किसी भी शुद्ध, सुंदर,सुशोभित और शांतिवर्धक स्थान में वेदी बनाकर या चौकी-पाटे आदि पर अक्षतादि से अष्टदल लिखें और उस पर लक्ष्मी का स्थापन करके 'लक्ष्म्यै नमः' 'इन्द्राय नमः' और 'कुबेराय नमः' इन नामों से तीनों का पृथक-पृथक (या एकत्र) यथाविधि पूजन करके 'नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रियाया गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात् से माता लक्ष्मी की और 'ऐरावत समारूढो वज्रहस्तो महाबलःशतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः'से इन्द्र की और 'धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पद:'से कुबेर की प्रार्थना करें। पूजन सामग्री में अनेक प्रकार की उत्तमोत्तम मिठाई उत्तमोत्तम फल पुष्प और सुगंधपूर्ण धूप-दीपादि लें और ब्रम्हचर्य से रहकर उपवास अथवा नक्त व्रत करें।
हमारे देश भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् (हे भगवन!) मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाइए
मान्यता है कि दीपावली के दिन भगवान राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे।अयोध्यावासियों का हृदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने देशी घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस की वह रात्रि दीपों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक हम सब प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं।

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Thursday, September 23, 2021

tarpan vidhi (प्राकृत देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणम्)

 तर्पण विधि 

tarpan vidhi

(प्राकृत देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणम्)

पितृ पक्ष का महत्व



शास्त्र मान्यता के अनुसार हमारे पूर्वज अपनी देह का त्याग कर देते है, उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण किया जाता है, इस क्रिया को श्राद्ध भी कहा जाता है, श्राद्ध का अर्थ होता है, श्रद्धा पूर्वक, माना जाता है कि पितृ पक्ष यानि श्राद्ध के दिनों में मृत्युलोक के देवता यमराज पूर्वजों की आत्मा को मुक्त देते हैं, ताकि वे अपने परिजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष दूर होता है, जिस व्यक्ति की जन्म कुंडली में पितृ दोष होता है उसे जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ता है, यश अर्थात् मान सम्मान प्राप्त नहीं होता है, धन संग्रह नही हो पाता है, रोग और बाधाएं निरन्तर बने रहते हैं, इसलिए पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष दूर होता है और परेशानियों से मुक्ति मिलती है,इससे पितर प्रसन्न होकर धन-धान्य, और सुख शांति का आशीर्वाद देते हैं। पितृ पक्ष में पितृगायत्री, त्रिपिंडी श्राद्ध,नारायणबलि, पित्रदोष शान्ति पूजा-दान यह कार्य शुभ रहते है।

देव, ऋषि और पितृ सम्पूर्ण तर्पण विधि:-

पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारंबार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।

सबसे पहले जानते हैं क्या है तर्पण?

पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को यव तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।

तर्पण के प्रकार:-

देवतर्पण
ऋषितर्पण
दिव्य पितृ तर्पण
यमतर्पण
मनुष्य पितृ तर्पण

तर्पण विधि:-

सर्वप्रथम पूर्व दिशा की और मुँह कर,दाहिना घुटना जमीन पर लगाकर,सव्य होकर(जनेऊ व अंगोछे को बांया कंधे पर रखें) गायत्री मंत्र से शिखा बांध कर, तिलक लगाकर, दोनों हाथ की अनामिका अँगुली में कुशों का  पवित्री (पैंती) धारण करें । फिर हाथ में त्रिकुशा ,जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प पढें—

ॐ विष्णवे नम: ३। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये ।

तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र को तीन बार कहें-

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।

तदनन्तर एक ताम्र(तांबे) अथवा चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्र में तर्पण के लिये गंगाजल/जल भर दें । फिर त्रिकुशा को सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से उसे ढक लें और  देवताओं का आवाहन करें ।

आवाहन मंत्र : ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम, हवम् । एदं वर्हिनिषीदत ॥

"आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबला:।
ये तर्पणे¿त्र विहिता: सावधाना भवन्तु ते।।"

‘हे विश्वेदेवगण  ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजे ।

इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और त्रिकुशा द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिये पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङ्कित रूप से उन-उन देवताओं के नाममन्त्र पढते रहें—

देवतर्पण:-

ॐ ब्रह्मास्तृप्यताम् ।
ॐ विष्णुस्तृप्यताम् ।
ॐ रुद्रस्तृप्यताम् ।
ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् ।
ॐ देवास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् ।
ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ संवत्सर: सावयवस्तृप्यताम् ।
ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ नागास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् ।
ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् ।
ॐ भूतादितृप्यन्ताम् ।
ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ औषधयस्तृप्यन्ताम् ।
ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।

मरिच्यादि दश ऋषितर्पण:-

इसी प्रकार निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एक-एक अञ्जलि जल दें—

1-ॐ मरीचिस्तृप्यताम् ।
2-ॐ अत्रिस्तृप्यताम् ।
3-ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम् ।
4-ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम् ।
5-ॐ पुलहस्तृप्यताम् ।
6-ॐ क्रतुस्तृप्यताम् ।
7-ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् ।
8-ॐ प्रचेतास्तृप्यताम् ।
9-ॐ भृगुस्तृप्यताम् ।
10-ॐ नारदस्तृप्यताम् ॥

सप्त दिव्य मनुष्यतर्पण:-

उत्तर दिशा की ओर मुँह कर, जनेऊ व गमछे को माला की भाँति गले में धारण कर, सीधा बैठ कर  निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि जौ(यव) सहित जल प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिका के मूलभाग) से अर्पण करें—

ॐ सनकस्तृप्यताम् -2
ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् – 2
ॐ सनातनस्तृप्यताम् -2
ॐ कपिलस्तृप्यताम् -2
ॐ आसुरिस्तृप्यताम् -2
ॐ वोढुस्तृप्यताम् -2
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् -2

सप्त दिव्य पितृ तर्पण:-

अब दोनों हाथ की तर्जनी अंगुली में मोटक के कुशा के मूल और अग्रभाग को दक्षिण की ओर करके  अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखे, स्वयं दक्षिण की ओर मुँह करे, बायें घुटने को जमीन पर लगाकर अपसव्यभाव से (जनेऊ को दायें कंधेपर रखकर बाँये हाथ से नीचे ले जायें ) पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृतीर्थ से (अंगुठा और तर्जनी के मध्यभाग से ) दिव्य पितरों के लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें—

1-ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् – 3

2-ॐ सोमस्तृप्यताम् – 3

3-ॐ यमस्तृप्यताम् – 3

4-ॐ अर्यमा तृप्यताम् – 3

5-ॐ अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् – 3

6-ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् – 3

7-ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् – 3

चतुर्दश यम तर्पण:-

इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्रो को पढते हुए चौदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें—

1-ॐ यमाय नम: – 3
2-ॐ धर्मराजाय नम: – 3
3-ॐ मृत्यवे नम: – 3
4-ॐ अन्तकाय नम: – 3
5-ॐ वैवस्वताय नमः – 3
6-ॐ कालाय नम: – 3
7-ॐ सर्वभूतक्षयाय नम: – 3
8-ॐ औदुम्बराय नम: – 3
9-ॐ दध्नाय नम: – 3
10-ॐ नीलाय नम: – 3
11-ॐ परमेष्ठिने नम: – 3
12-ॐ वृकोदराय नम: – 3
13-ॐ चित्राय नम: – 3
14-ॐ चित्रगुप्ताय नम: – 3

(जीवतपितृक एतावदेव तर्पणं कुर्यात् मृतपितृकस्तु)

मनुष्यपितृतर्पण:-

इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें—

ॐ आगच्छन्तु मे पितरं एवं ग्रहणन्तु जलान्जलिम्।।
ॐ हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए।।

तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें—

अमुक गोत्र: अस्मत्पिता अमुकशर्मा  वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्र: अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्र: अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्रा अस्मन्माता अमुकी देवी गायत्री स्वरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्रा अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी  सावित्री स्वरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्रा अस्मत्प्रपितामही (परदादी) अमुकी देवी सरस्वती स्वरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: – 3

इसके बाद नौ बार पितृतीर्थ से जल छोड़े।

पुनः

अमुक गोत्र: अस्मन्मातामह:(नाना)अमुकशर्मा  अग्निस्वरूप:सपत्नीकस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्र: अस्मत्प्रमातामह: (परनाना)) अमुकशर्मा विष्णुस्वरूप:सपत्नीकस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अमुक गोत्र: अस्मत्वृद्धप्रमातामह: (वृद्धपरनाना) अमुकशर्मा वरुण स्वरूप:सपत्नीकस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

(ततः स्त्री, पुत्र,कन्या, भ्रातृ, पितृव्य,आचार्य:,गुरु,शिष्य,मातुल:, श्वसुर:,मित्रादिभ्य: एकैकांजलिं दद्यात्।।)

अञ्जलि दानम्:-

इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे—

देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा: । 
पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा: ॥

जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव: ।
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला: ॥

नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिता: । तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया ॥

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: ।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण: ॥

अर्थ : ‘देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से शीघ्र तृप्त हों । जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङ हुए दुख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ । जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों, अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुझसे जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों ।’

ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा: ।
तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय: ॥

अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् ।
आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा ॥

अर्थ : ‘ब्रह्माजी  से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यम्त सात द्वीपों के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ ।

वस्त्र-निष्पीडनकरे:-

तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेटकर जल में डुबावे और बाहर ले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र :
“ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृतारू । ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम् ”

को पढते हुए अपसव्य होकर अपने बाएँ भाग में भूमिपर उस वस्त्र को निचोड़े ।
(मान्यता है कि यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो उस दिन वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये ।)

दर्भ त्याग:-
पवित्रक को तर्पण किये हुए जल मे छोड दे ।

ॐ एषां पिता न च भ्राता न पुत्रो नान्यगोत्रिणः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मयोत्सृष्टै: कुशै:सदा।।।

भीष्मतर्पण:-

इसके बाद सव्य हो  करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्म के लिये जलांजलि अर्पण करे:-

“वैयाघ्रपदगोत्राय  सांकृत्य प्रवराय च ।
अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे ॥”

अर्घ्य दान:-

फिर एक पात्र में शुद्ध जल भरकर उसमे श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे । फिर दूसरे पात्र में चन्दन् से षडदल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशा के क्रम से ब्रह्मादि देवताओं का आवाहन-पूजन करे तथा पहले पात्र के जल से उन पूजित देवताओं के लिये अर्ध्य अर्पण करे यथा:-

ॐ ब्रह्मणे नम:। ब्रह्माणं पूजयामि ॥

ॐ विष्णवे नम: । विष्णुं पूजयामि ॥

ॐ रुद्राय नम: । रुद्रं पूजयामि ॥

ॐ सवित्रे नम: । सवितारं पूजयामि ॥

ॐ मित्राय नम:। मित्रं पूजयामि ॥

ॐ वरुणाय नम: । वरूणं पूजयामि ॥

फिर भगवान सूर्य को अघ्र्य दें:-

"ॐ एहि सूर्य सहस्त्राशों तेजो राशि जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्य दिवाकरः।।"

हाथों को उपर कर उपस्थान मंत्र पढ़ें –

ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरूणस्याग्नेः। आप्राद्यावा पृथ्वी अन्तरिक्ष¢ सूर्यआत्माजगतस्तस्थुषश्च।।

नामस्कारः-
फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें।

ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः। ॐ आग्नेय्यै अग्नये नमः। ॐ दक्षिणायै यमाय नमः। ॐ नैऋत्यै निऋतये नमः। ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः। ॐ वायव्यै वायवे नमः। ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः। ॐ ऐशान्यै ईशानाय नमः। ॐ ऊर्ध्वायै ब्रह्मणै नमः। ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः।

इस तरह दिशाओं और देवताओं को नमस्कार कर बैठकर नीचे लिखे मन्त्र से पुनः देवतीर्थ से तर्पण करें।

ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो नमः। ॐ अपांपतये नमः। ॐ वरूणाय नमः।

मुखविमार्जनम्:-

फिर तर्पण के जल को मुख पर लगायें और तीन बार ॐ अच्युताय नमः मंत्र का जप करें।

विसर्जनम्:-
इस मन्त्र को पढ़कर विसर्जन करें-
"ॐ देवागातु विदोगातुंव्वित्वागातुमितं।
मनसस्पत इमं देवयज्ञ¢स्वाहा व्वातेधा:।।

समर्पणम्:-
उपरोक्त समस्त तर्पण कर्म भगवान को समर्पित करें।
ॐ कृतेनानेन तर्पणाख्येन कर्मणः पितृस्वरूपी जनार्दन वासुदेव:प्रीयताम्।।

ततः करसम्पुटं कृत्वा:-
ॐ यस्य स्मृत्या च नमोक्त्या तपोयज्ञ क्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।

ॐ विष्णवे नमः।ॐ विष्णवे नमः।ॐ विष्णवे नमः।।

नोट- यदि नदी में तर्पण किया जाय तो दोनों हाथों को मिलाकर जल से भरकर गौ माता की सींग जितना ऊँचा उठाकर जल में ही अंजलि डाल दे।प्रदक्षिणा करें।(ततः तीर्थं नमस्कृत्य तीरं प्रक्षाल्य प्रदक्षिणं कृत्वा गृहमागत्य)।

इसे पीडीएफ के रूप में देखें:-  प्राकृत तर्पण विधि

इसे यूट्यूब चैनल पर देखें:-प्राकृत देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणम्

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