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Monday, August 3, 2026

पंचतत्त्व नवग्रह गायत्री मंत्र Panchtatva Navagraha Gayatri Mantra

पंचतत्त्व नवग्रह गायत्री मंत्र

Panchtatva Navagraha Gayatri Mantra

प्रार्थना, साधना एवं जीवन-संतुलन का वैदिक मार्ग

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


लेखक: आचार्य विजय कुमार शुक्ल
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


प्रस्तावना

भारतीय वैदिक परम्परा में मंत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने वाले दिव्य स्पंदन माने गए हैं। ऋषियों ने सम्पूर्ण सृष्टि को पंचतत्त्व—वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश का स्वरूप माना तथा मानव जीवन पर नवग्रहों के सूक्ष्म प्रभाव का वर्णन किया। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर पंचतत्त्व नवग्रह गायत्री मंत्र साधना का विधान किया गया है।

इस साधना का उद्देश्य केवल ग्रह-शान्ति नहीं, बल्कि मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा के मध्य संतुलन स्थापित करना है। श्रद्धा, शुद्धता और नियमितता के साथ किया गया मंत्र-जप आत्मबल, सकारात्मक चिंतन, मानसिक शान्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन सकता है।


दैनिक प्रार्थना

रात्रि में सोने से पूर्व तथा प्रातः जागने के बाद, बिस्तर पर बैठकर तीन बार मन ही मन प्रार्थना करें—

"किसी भी काल में जाने-अनजाने हमसे या हमारे पूर्वजों से कोई गलती हुई हो, उसे क्षमा करें। हमारी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करें, पूरे परिवार को स्वस्थ रखें, हमें श्रापमुक्त करें तथा ऋणमुक्त करें।"


मंत्र-जप की विधि

  • प्रारम्भ में प्रत्येक मंत्र तीन बार जपें।
  • मंत्र स्मरण हो जाने पर ग्यारह बार जप करें।
  • विशेष संकल्प, अनुष्ठान या उद्देश्य की पूर्ति हेतु १०८ बार जप करें।
  • जप सदैव श्रद्धा, शुद्धता और एकाग्रता के साथ करें।

पंचतत्त्व नवग्रह गायत्री मंत्र

प्रथम – वायु तत्त्व

राहु गायत्री

ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि। तन्नः राहुः प्रचोदयात्॥

केतु गायत्री

ॐ गदाहस्ताय विद्महे अमृतेशाय धीमहि। तन्नः केतुः प्रचोदयात्॥

शनि गायत्री

ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि। तन्नः सौरिः प्रचोदयात्॥


द्वितीय – जल तत्त्व

चन्द्र गायत्री

ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि। तन्नः चन्द्रः प्रचोदयात्॥

शुक्र गायत्री

ॐ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि। तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्॥


तृतीय – अग्नि तत्त्व

भौम (मंगल) गायत्री

ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि। तन्नो भौमः प्रचोदयात्॥

सूर्य गायत्री

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥


चतुर्थ – पृथ्वी तत्त्व

बुध गायत्री

ॐ सौम्यरूपाय विद्महे बाणेशाय धीमहि। तन्नो बुधः प्रचोदयात्॥


पंचम – आकाश तत्त्व

गुरु गायत्री

ॐ आङ्गिरसाय विद्महे दण्डायुधाय धीमहि। तन्नो जीवः प्रचोदयात्॥


रुद्र गायत्री

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥


संजीवनी महामृत्युञ्जय मंत्र

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
धियो यो नः प्रचोदयात्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।


विष्णु गायत्री

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥


साधना का वास्तविक उद्देश्य

मंत्र-जप का उद्देश्य केवल इच्छापूर्ति नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और जीवन-संतुलन है। जब साधना के साथ सत्य, सदाचार, सेवा, परिश्रम, संयम और धर्म का पालन जुड़ता है, तब उसका प्रभाव अधिक सार्थक होता है।

नियमित साधना से व्यक्ति में आत्मविश्वास, धैर्य, सकारात्मक सोच, मानसिक शान्ति और आध्यात्मिक उन्नति का विकास होता है। साथ ही यह जीवन में अनुशासन और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना को भी सुदृढ़ करती है।


निष्कर्ष

प्रार्थना मन को निर्मल बनाती है।
मंत्र-जप चेतना को जागृत करता है।
सदाचार जीवन को पवित्र बनाता है।
सत्कर्म ईश्वर की कृपा को फलित करते हैं।

अतः श्रद्धा, शुद्धता, नियमित साधना और श्रेष्ठ कर्म—यही पंचतत्त्व नवग्रह गायत्री मंत्र साधना का वास्तविक आधार है। यही सनातन वैदिक जीवन-पद्धति का शाश्वत संदेश है।


आचार्य विजय कुमार शुक्ल
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
Whatsapp .: 8574763197

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