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Thursday, August 6, 2026

रुद्राभिषेक: अनुष्ठान नहीं, आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा Rudrabhishek: Not a ritual, but a journey from the soul to the divine

रुद्राभिषेक: अनुष्ठान नहीं, आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा

Rudrabhishek: Not a ritual, but a journey from the soul to the divine

एक वैदिक चिंतन

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर


आज रुद्राभिषेक को लेकर समाज में दो प्रवृत्तियाँ समानांतर रूप से दिखाई देती हैं। एक ओर शास्त्रोक्त वैदिक परंपरा है, जिसमें मंत्र, विधि, श्रद्धा और आत्मचिंतन को प्रधानता दी जाती है। दूसरी ओर अनुष्ठानों को अधिक भव्य, आकर्षक और दृश्यात्मक बनाने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

समय के साथ परिवर्तन स्वाभाविक है, किन्तु प्रत्येक परिवर्तन यह प्रश्न भी पूछता है कि क्या हम मूल उद्देश्य को सुरक्षित रख पा रहे हैं?

मेरे विचार से यही प्रश्न आज रुद्राभिषेक के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है।

रुद्राभिषेक का उद्देश्य क्या है?

यदि रुद्राभिषेक को केवल भगवान शिव पर जल चढ़ाने का अनुष्ठान मान लिया जाए, तो उसका अर्थ बहुत सीमित रह जाएगा।

वास्तव में रुद्राभिषेक मनुष्य को स्वयं को जानने की साधना है।

शिवलिंग केवल पूजनीय देवस्वरूप ही नहीं, बल्कि परम चेतना और आत्मतत्त्व का भी प्रतीक माना गया है। उपनिषदों में आत्मा के सूक्ष्म, प्रकाशमय स्वरूप का वर्णन मिलता है। इसी दृष्टि से शिवलिंग हमें बाहर से भीतर की यात्रा करने की प्रेरणा देता है।

जब हम शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, तब केवल पत्थर का अभिषेक नहीं करते, बल्कि अपने अंतःकरण को पवित्र करने का संकल्प लेते हैं।

रुद्राभिषेक का सम्पूर्ण विधान एक जीवन-दर्शन है

शास्त्रोक्त रुद्राभिषेक में सबसे पहले श्रीगणेश, माता गौरी, भगवान कार्तिकेय, वीरभद्र, कुबेर, कीर्तिमुख, नागदेवता, नंदीश्वर तथा शिवगणों का पूजन किया जाता है। इसके पश्चात् भगवान महादेव के एकादश रुद्र, पंचाक्षर स्वरूप, द्वादश ज्योतिर्लिंग, अष्टदिकों में स्थित स्वरूपों तथा अन्य दिव्य रूपों की आराधना की जाती है।

यह हमें बताता है कि जीवन अकेले नहीं चलता। परिवार, समाज, प्रकृति, देवशक्तियाँ और समस्त सृष्टि परस्पर जुड़ी हुई हैं।

इसके बाद दूध, दधि, घृत, मधु, शर्करा और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, अबीर-गुलाल आदि अर्पित किए जाते हैं।

यह सब जीवन के सुख, समृद्धि, सौंदर्य, मधुरता और पूर्णता का प्रतीक है।

किन्तु अंत में भगवान शिव को भस्म अर्पित की जाती है।

यहीं रुद्राभिषेक का सबसे बड़ा संदेश छिपा है।

भस्म का संदेश

भस्म हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में चाहे जितना वैभव प्राप्त हो जाए, चाहे जितनी उपलब्धियाँ मिल जाएँ, चाहे जितना सम्मान और सुख मिल जाए—अंततः यह शरीर और इससे जुड़ी सभी वस्तुएँ नश्वर हैं।

भगवान शिव स्वयं भस्म धारण करते हैं। यह मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन के सत्य का बोध है।

भस्म हमें सिखाती है कि जीवन का आनंद लो, अपने कर्तव्यों का पालन करो, परिवार का सम्मान करो, धर्मपूर्वक धन अर्जित करो, किन्तु अहंकार और आसक्ति को अपने ऊपर शासन मत करने दो।

यही वैराग्य है और यही मोक्ष की दिशा है।

अनेकता से एकत्व

रुद्राभिषेक में हम अनेक देवताओं का पूजन करते हैं, किन्तु अंततः सब कुछ शिवमय हो जाता है।

यही सृष्टि का नियम है।

जीवन एक बिंदु से प्रारम्भ होता है, अनेक रूपों में विस्तार पाता है और अंततः उसी परम चेतना में विलीन हो जाता है।

रुद्राभिषेक इसी सत्य का सजीव प्रतीक है।

क्या रुद्राभिषेक केवल एक आयोजन बनता जा रहा है?

यहीं आज का सबसे बड़ा चिंतन है।

भव्य आयोजन, सुंदर सजावट, मधुर संगीत और भक्तिमय वातावरण श्रद्धा को बढ़ाएँ, तो उनका स्वागत है।

किन्तु यदि रुद्राभिषेक का मूल्य उसकी सजावट से तय होने लगे, यदि वैदिक मंत्रों की अपेक्षा मंच-सज्जा अधिक महत्वपूर्ण हो जाए, यदि कृत्रिम श्रृंगार ही श्रद्धा का मापदंड बन जाए, तो हमें रुककर विचार करना होगा।

धर्म का उद्देश्य लोगों को चमत्कृत करना नहीं, बल्कि उनके अंतःकरण को जागृत करना है।

यदि रुद्राभिषेक हमें शिव से नहीं, केवल दृश्य प्रभाव से जोड़ रहा है, तो उसके मूल उद्देश्य पर पुनर्विचार आवश्यक है।

हमारी विनम्र प्रार्थना

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर का विनम्र मत है कि रुद्राभिषेक को उसके वैदिक स्वरूप, शास्त्रीय मर्यादा और आध्यात्मिक संदेश के साथ समझा और कराया जाना चाहिए।

भगवान शिव का सपरिवार पूजन, वैदिक मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, श्रद्धापूर्वक अभिषेक और अंत में भस्म का स्मरण—यही मनुष्य को जीवन का वास्तविक ज्ञान प्रदान करता है।

यह लेख किसी परंपरा, किसी आचार्य या किसी संस्था की आलोचना नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में रुद्राभिषेक अपनी आत्मा खो दे और केवल एक आकर्षक धार्मिक आयोजन बनकर रह जाए।

यदि हम उसके बाहरी स्वरूप के साथ-साथ उसके भीतरी अर्थ को भी समझ लें, तो रुद्राभिषेक केवल पूजा नहीं रहेगा, बल्कि जीवन जीने की एक कला बन जाएगा।

निष्कर्ष

रुद्राभिषेक हमें सिखाता है—

  • जीवन एक बिंदु से प्रारम्भ होता है।
  • जीवन अनेक अनुभवों में विस्तार पाता है।
  • जीवन धर्मपूर्वक भोग का भी अवसर देता है।
  • अंततः सब कुछ भस्म होकर उसी परम शिव में विलीन हो जाता है।

इसीलिए रुद्राभिषेक का उद्देश्य केवल अभिषेक करना नहीं, बल्कि स्वयं को शिवत्व की ओर ले जाना है।

जब पूजा आत्मचिंतन बन जाती है, तब रुद्राभिषेक पूर्ण होता है।

जब जीवन शिवमय हो जाता है, तभी रुद्राभिषेक सफल होता है।

॥ हर हर महादेव ॥


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Wednesday, August 5, 2026

रुद्राभिषेक: अनुष्ठान नहीं, जीवन और शिवत्व का महादर्शन Rudrabhishek: Not a ritual, but a great philosophy of life and Shivatva

रुद्राभिषेक: अनुष्ठान नहीं, जीवन और शिवत्व का महादर्शन

Rudrabhishek: Not a ritual, but a great philosophy of life and Shivatva


वैदिक परंपरा, आध्यात्मिक रहस्य और बदलते स्वरूप पर एक चिंतन

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर

"नमः शम्भवाय च मयोभवाय च। नमः शङ्कराय च मयस्कराय च। नमः शिवाय च शिवतराय च॥"
(श्रीरुद्रम, यजुर्वेद)

"रुद्राभिषेक केवल अभिषेक नहीं, बल्कि मनुष्य की अनेकता से एकत्व की आध्यात्मिक यात्रा है।"


भूमिका

सनातन धर्म में रुद्राभिषेक भगवान शिव की आराधना का एक अत्यंत पवित्र वैदिक अनुष्ठान है। सामान्यतः इसे जल, दुग्ध, पंचामृत और वैदिक मंत्रों के साथ भगवान शिव का अभिषेक माना जाता है, किंतु वास्तव में रुद्राभिषेक केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-दर्शन का प्रतीक है।

आज रुद्राभिषेक का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अनेक स्थानों पर भव्य मंच-सज्जा, अत्यधिक प्रकाश व्यवस्था, ऊँची ध्वनि में गायन-वादन, आकर्षक श्रृंगार और भगवान शिव के कृत्रिम मुख, आँख, नाक एवं मूँछ आदि को अनुष्ठान का प्रमुख आकर्षण बनाया जा रहा है।

यह सब श्रद्धालुओं को आकर्षित अवश्य करता है, परंतु साथ ही एक गंभीर प्रश्न भी उत्पन्न करता है—

क्या हम रुद्राभिषेक के मूल वैदिक स्वरूप को सुरक्षित रख पा रहे हैं?


रुद्राभिषेक का आध्यात्मिक रहस्य

रुद्राभिषेक केवल भगवान शिव पर अभिषेक नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण सृष्टि के शाश्वत नियम का प्रतीक है।

भगवान शिव का शिवलिंग हमें बताता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक बिंदु से प्रकट होती है। वही बिंदु विस्तार पाकर अनंत रूपों में व्यक्त होता है। जीव, प्रकृति, परिवार, समाज, ज्ञान, कर्म और सम्पूर्ण संसार उसी विस्तार का भाग हैं।

मनुष्य का जीवन भी इसी नियम का अनुसरण करता है। जन्म के साथ जीवन का विस्तार आरम्भ होता है। अनेक संबंध, अनेक अनुभव, अनेक कर्म और अनेक भूमिकाएँ जीवन को विस्तृत करती हैं। किन्तु अंततः वही जीवन पुनः अपने मूल स्रोत में विलीन हो जाता है।

सनातन दर्शन उसी मूल स्रोत को शिव कहता है।

इसीलिए रुद्राभिषेक केवल पूजा नहीं, बल्कि यह संदेश है कि—

"जीवन एक बिंदु से प्रारम्भ होकर अनंत विस्तार प्राप्त करता है और अंततः उसी परम शिव में एकाकार हो जाता है।"


अनेकता से एकत्व की यात्रा

रुद्राभिषेक में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, श्रीगणेश, भगवान कार्तिकेय, नंदी, भैरव, चण्डेश्वर तथा शिवपरिवार और संबंधित देवशक्तियों का विधिपूर्वक पृथक-पृथक पूजन किया जाता है।

प्रत्येक देवता किसी विशेष शक्ति, गुण और जीवन-मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है।

किन्तु पूजन का अंतिम संदेश यह नहीं कि ये सब अलग-अलग हैं।

संदेश यह है कि—

सभी देवशक्तियाँ अंततः शिवमय हैं।

अर्थात् अनेक रूपों की अंतिम परिणति एक ही परम सत्य में होती है।

यही रुद्राभिषेक का सबसे बड़ा आध्यात्मिक रहस्य है।


रुद्राभिषेक का शास्त्रीय स्वरूप

शास्त्रों के अनुसार रुद्राभिषेक का आधार है—

  • वैदिक मंत्रों का शुद्ध उच्चारण।
  • श्रीरुद्राष्टाध्यायी का पाठ।
  • शास्त्रोक्त विधि से अभिषेक।
  • आचार्य की शुद्धता एवं मर्यादा।
  • यजमान की श्रद्धा एवं समर्पण।

यही रुद्राभिषेक की आत्मा है।


क्या गायन-वादन और श्रृंगार अनुचित हैं?

भारतीय संस्कृति में संगीत, स्तुति और भगवान का अलंकरण प्राचीन परंपरा का अंग हैं।

अतः उनका विरोध करना उचित नहीं होगा।

किन्तु प्रश्न तब उत्पन्न होता है जब—

  • मंत्रों से अधिक संगीत महत्वपूर्ण हो जाए।
  • पूजा से अधिक मंच-सज्जा प्रमुख बन जाए।
  • श्रद्धा से अधिक प्रदर्शन प्रभावी हो जाए।
  • भगवान की आराधना की अपेक्षा लोगों को प्रभावित करना उद्देश्य बन जाए।

जब साधन ही साध्य बन जाए, तब सावधान होने की आवश्यकता है।


शिवलिंग पर आँख, नाक और मूँछ लगाने की परंपरा

आज अनेक स्थानों पर शिवलिंग पर कृत्रिम आँख, नाक, मूँछ तथा अन्य अलंकरण लगाए जाते हैं।

मुख्यधारा के वैदिक एवं शैव ग्रंथों में सामान्य रुद्राभिषेक के लिए ऐसा कोई अनिवार्य विधान नहीं मिलता।

इतिहास से ज्ञात होता है कि यह परंपरा कुछ क्षेत्रीय मंदिरों की मुख-श्रृंगार परंपरा और लोकभक्ति के प्रभाव से विकसित हुई।

ऐसी परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

किन्तु उन्हें प्रत्येक रुद्राभिषेक का अनिवार्य शास्त्रीय नियम मान लेना उचित नहीं है।


वर्तमान समय की चुनौती

आज केवल यजमान ही नहीं, अनेक आचार्य भी बदलती सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप अनुष्ठानों को अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसा वातावरण बन रहा है कि बिना विशेष श्रृंगार, बिना भव्य संगीत और बिना दृश्य प्रभाव के रुद्राभिषेक अधूरा माना जाने लगा है।

ऐसे में वे आचार्य, जो केवल वैदिक एवं शास्त्रोक्त विधि से रुद्राभिषेक कराते हैं, स्वयं से प्रश्न करते हैं—

क्या अब हम पुराने हो गए हैं?

उत्तर स्पष्ट है—

धर्म कभी पुराना नहीं होता।

शास्त्र समय के अनुसार अपना महत्व नहीं खोते।

उनकी प्रस्तुति बदल सकती है, किन्तु उनका स्वरूप नहीं।


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर का दृष्टिकोण

हमारा विनम्र मत है कि भगवान शिव की उपासना को प्रदर्शन का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

भगवान शिव आशुतोष हैं। वे बाहरी भव्यता से अधिक सरलता, श्रद्धा और निष्कपट भाव से प्रसन्न होते हैं।

एक लोटा जल...

एक बिल्वपत्र...

शुद्ध वैदिक मंत्र...

और सच्ची भक्ति...

यही शिवोपासना का वास्तविक स्वरूप है।

हम मानते हैं कि प्रत्येक शिवभक्त को भगवान शिव का माता पार्वती, श्रीगणेश, भगवान कार्तिकेय, नंदी तथा शिवपरिवार सहित शास्त्रोक्त विधि से सपरिवार पूजन एवं रुद्राभिषेक करना चाहिए।

यदि संगीत हो तो वह भक्ति का माध्यम बने।

यदि श्रृंगार हो तो वह श्रद्धा की अभिव्यक्ति बने।

किन्तु वे पूजा का स्थान न लें और न ही रुद्राभिषेक की आत्मा को ढक दें।


हमारा उद्देश्य

यह लेख किसी आचार्य, मंदिर, परंपरा या संस्था की आलोचना करने के लिए नहीं लिखा गया है।

हमारा उद्देश्य केवल इतना है कि रुद्राभिषेक की वैदिक मर्यादा, शास्त्रीय स्वरूप और आध्यात्मिक गरिमा सुरक्षित बनी रहे।

कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में रुद्राभिषेक, रुद्राभिषेक न रहकर केवल एक भव्य धार्मिक आयोजन बन जाए।

यदि ऐसा हुआ तो आने वाली पीढ़ियाँ रुद्राभिषेक के वास्तविक आध्यात्मिक संदेश से वंचित हो जाएँगी।

सनातन परंपरा का संरक्षण केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि शुद्ध आचरण, शास्त्रोक्त अनुष्ठानों और सही मार्गदर्शन से होता है।


निष्कर्ष

रुद्राभिषेक हमें सिखाता है कि—

सृष्टि एक बिंदु से प्रारम्भ होती है।

जीवन अनेक रूपों में विस्तार पाता है।

और अंततः सब कुछ उसी परम शिव में एकाकार हो जाता है।

यही शिवत्व है।

यही रुद्राभिषेक है।

और यही सनातन धर्म का शाश्वत संदेश है।


शास्त्रोक्त रुद्राभिषेक हेतु संपर्क करें

यदि आप वैदिक एवं शास्त्रोक्त विधि से भगवान शिव का रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जप, लघुरुद्र, महारुद्र, अतिरुद्र अथवा अन्य वैदिक शिव अनुष्ठान कराना चाहते हैं, तो संपर्क करें—

प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर

📞 8574763197

"शुद्ध मंत्र • शास्त्रोक्त विधि • श्रद्धा • समर्पण"

॥ हर हर महादेव ॥


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Thursday, February 26, 2026

होलिका दहन holika dahan 2026




 होलिका दहन 2026

संवत् 2082 में फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी के दिन अर्थात 02 मार्च 2026 को प्रदोष काल में पूर्णिमा और संपूर्ण रात्रि में भद्रा की व्याप्ति है। दूसरे दिन पूर्णिमा सूर्यास्त से पूर्व समाप्त हो रही है किंतु पूर्णिमा की व्याप्ति साढ़े तीन प्रहर से अधिक है और प्रतिपदा तिथि वृद्धि गामी है, इसलिए शास्त्रवचन के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा के दिन  अर्थात 03 मार्च 2026 को होना चाहिए था।
परंतु 3 मार्च के दिन ग्रस्तोदित चंद्र ग्रहण है और ग्रहण काल तथा प्रदोष से पूर्व ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है।
ऐसी स्थिति में धर्मसिंधु के अनुसार होलिका दहन पूर्व दिन ही करना चाहिए। 
दूसरे दिन में ग्रस्तोदय ग्रहण हो और प्रदोष काल में पूर्णिमा ना हो तो पूर्व दिन ही होलिका दहन पूजा करें।
साढे तीन प्रहर से अधिक पूर्णिमा और प्रतिपदा वृद्धिगामी होते हुए भी धर्मसिंधु में दिए हुए ग्रहण विचार के वचनानुसार होलिका दहन 02 मार्च 2026 को प्रदोष काल में करना शास्त्र सम्मत होगा।
इस दिन भद्रा सायंकाल 05:56 से मध्य रात्रि के बाद रात्रि शेष 29:29 मिनट अर्थात 03 तारीख की सुबह 05:29 तक रहेगी।
भद्रा के संबंध में शास्त्रों में लिखा गया है कि यदि भद्रा निशीथ काल अर्थात मध्यरात्रि के बाद तक रहे तो फिर भद्रा में ही प्रदोष के समय भद्रा का मुख छोड़कर होलिका का दहन करें।
इस वर्ष प्रदोष में भद्रा का मुख नहीं रहेगा इससे प्रदोष वेला में सूर्यास्त से 02 घंटे 24 मिनट तक या रात्रि में 26:37 से पूर्व होलिका दहन करना शास्त्रोक्त है।

भद्रा का पुच्छकाल 25:27 से 26:37 तक भी श्रेष्ठ रहेगा।

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Monday, September 1, 2025

महालय श्राद्ध पक्ष 2025 mhalaya shradha paksha 2025

महालय श्राद्ध पक्ष 2025
mhalaya shradha paksha 2025

महालय श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) 7 सितंबर 2025 से शुरू होकर 21 सितंबर 2025 तक चलेगा।


यह पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन  कृष्ण अमावस्या तक रहता है। इस प्रकार इसमें कुल सोलह तिथियां होती हैं।


इस दौरान हर दिन विशेष श्राद्ध किया जाता है, जैसे कि पूर्णिमा श्राद्ध, प्रतिपदा श्राद्ध, द्वितीया श्राद्ध, भरणी श्राद्ध, मघा श्राद्ध इत्यादि।


अंतिम दिन को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है, जिस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती।


श्राद्ध 2025 में प्रमुख तिथियां निम्नलिखित हैं:-


पितृपक्ष की शुरुआत 7 सितंबर पूर्णिमा से होगी और 21 सितंबर को अमावस्या तिथि पर पितृपक्ष समाप्त होगा।


पूर्णिमा तिथि श्राद्ध - 7 सितंबर 2025 रविवार (दिन में 12:57 तक कर लें, उसके पश्चात ग्रहण का सूतक काल आरम्भ हो जाएगा)


पितृपक्ष 2025 में श्राद्ध की तिथियां


07 सितंबर 2025 रविवार पूर्णिमा श्राद्ध
08 सितंबर 2025 सोमवार प्रतिपदा श्राद्ध
09 सितंबर 2025 मंगलवार द्वितीया श्राद्ध
10 सितंबर 2025 बुधवार तृतीया व चतुर्थी श्राद्ध
11 सितंबर 2025 गुरुवार चतुर्थी/पंचमी व महा भरणी श्राद्ध
12 सितंबर 2025 शुक्रवार षष्ठी श्राद्ध
13 सितंबर 2025 शनिवार सप्तमी श्राद्ध
14 सितंबर 2025 रविवार अष्टमी श्राद्ध
15 सितंबर 2025 सोमवार नवमी श्राद्ध
16 सितंबर 2025 मंगलवार दशमी श्राद्ध
17 सितंबर 2025 बुधवार एकादशी श्राद्ध
18 सितंबर 2025 गुरुवार द्वादशी श्राद्ध
19 सितंबर 2025 शुक्रवार त्रयोदशी व मघा श्राद्ध
20 सितंबर 2025 शनिवार चतुर्दशी श्राद्ध
21 सितंबर 2025 रविवार सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध पितृ विसर्जन


श्राद्ध पक्ष की अवधि कुल 15 दिन की होती है और यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए महत्वपुर्ण माना जाता है। 

इस दौरान पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध के अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं, जिससे पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं।


Youtube पर देखें:- http://youtube.com/post/Ugkx0aI3_kpa9BXvxRA2mm20-mhZhx8S-ui7?si=wt4N7D7ADHeln-5Z

Wednesday, January 10, 2024

स्मार्त और वैष्णव smart aur vaishnav

स्मार्त और वैष्णव

आज हम जानेंगें स्मार्त और वैष्णवमत के बारे में-


● स्मार्त और वैष्णव में क्या अंतर है?
● आप स्मार्त हैं या वैष्णव?
● स्मार्त और वैष्णव का भेद।


जब भी किसी त्यौहार की बात आती है तो स्मार्त और वैष्णव शब्द भी आता है।क्योंकि हमारे पञ्चाङ्ग में लगभग सभी व्रत और त्यौहारों का निर्णय स्मार्त और वैष्णव के आधार पर दिया जाता है इस प्रकार अधिकतर त्यौहार दो दिन के हो जाते हैं।


लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि स्मार्त और वैष्णव में क्या अंतर है तो आज हम आपको बताएंगे कि स्मार्त किसे कहते हैं और वैष्णव किसे कहते हैं?


● सामान्य सांसारिक नियमों को मानकर गृहस्थ आश्रम का पालन करने वाले अर्थात् सभी गृहस्थी जन स्मार्त कहे जातें हैं।श्रुति-स्मृतियों में विश्वास,वेद पुराण आदि का पठन-पाठन एवं श्रवण करने वाले लोग, पांच देवों(सूर्य,गणेश, शिव, विष्णु, दुर्गा) की उपासना करने वाले अर्थात् पञ्चदेवोपासक,भगवान शिव का पूजन करने वाले सभी स्मार्त कहे जाते हैं।


गृहस्थी स्त्रियों को हमेशा स्मार्तमत के अनुसार व्रत त्यौहार मनाने चाहिए।


● वैष्णव उन्हें कहते हैं जो भगवान विष्णु के उपासक हैं।अपने माथे पर वैष्णव संप्रदाय के अनुसार तिलक धारण करते हैं, भुजाओं पर जिन्होंने शंख-चक्र आदि चिन्ह तप्त मुद्रा से अंकित करवा रखे हैं,अथवा जिन्होंने वैष्णव धर्मगुरु से दीक्षा ली हुई होती है और उनके द्वारा बताये गए नियमों का कठोरता से पालन करते हैं।

साधु-सन्यासी, योगी, तथा विधवा स्त्रियां भी वैष्णव मत के अनुसार त्यौहार व्रत आदि किया करते हैं।



Thursday, August 29, 2019

श्री विष्णु सहस्त्रनाम. Shree vishnu sahastranam

श्री विष्णु सहस्त्रनाम
Shree vishnu sahastranam

ॐ विष्णवे नमः
ॐ श्री परमात्मने नमः ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
अथ श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम्
यस्य स्मरणमात्रेन जन्मसंसारबन्धनात्‌ ।
विमुच्यते नमस्तमै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
नमः समस्तभूतानां आदिभूताय भूभृते ।
अनेकरुपरुपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्टिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ।१।
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्‌ ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्‌ ।२।
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्‌ ।३।
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्‌ ।
स्तुवन्नामसहस्त्रेण पुरुषः सततोत्थितः ।४।
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्‌ ।
ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ।५।
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्‌ ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्‌ ।६।
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्‌ ।
लोकनाथं महद्‌भूतं सर्वभूतभवोद्भभवम्‌ ।७।
एष मे सर्वधर्माणां धर्माऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ।८।
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्‌ब्रह्म परमं यः परायण्म्‌ ।९।
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्‌ ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ।१०।
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ।११।
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्त्रं मे श्रॄणु पापभयापहम्‌ ।१२।
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ॠषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ।१३।
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्‌कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ।१४।
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ।१५।
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ।१६।
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ।१७।
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।१८।
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।१९।
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्‌ ।२०।
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ।२१।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्‌ ।२२।
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।२३।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युत ।
वृषाकपरिमेयत्मा सर्वयोगविनिःसृतः ।२४।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।२५।
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ।२६।
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ।२७।
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माधक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।२८।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।२९।
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरुर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।३०।
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।३१।
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक ।३२।
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुध्दः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ।३३।
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।३४।
अमृत्युः सर्वदृक्‌ सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रृतात्मा सुरारिहा ।३५।
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्त्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ।३६।
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्त्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्‌ ।३७।
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ।३८।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ।३९।
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।४०।
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ।४१।
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरुपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ।४२।
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ।४३।
अमृतांशूद्भवो भानुः शशविन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ।४४।
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ।४५।
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्योऽव्यक्तरुपश्च सहस्त्रजिदनन्तजित्‌ ।४६।
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ।४७।
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।४८।
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ।४९।
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।५०।
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्‌ ।
महर्ध्दिर्‌ऋध्दो वृध्दात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ।५१।
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः ।५२।
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ।५३।
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनोगुहः ।५४।
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्ध्दिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।५५।
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ।५६।
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।५७।
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ।५८।
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्‌ ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।५९।
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयुपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।६०।
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्‌ ।६१।
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्‌ ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।६२।
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्‌ ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ।६३।
धर्मगुब्धर्मकृध्दर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्‌ ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ।६४।
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्‌गुरुः ।६५।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ।६६।
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।६७।
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तामा महोदधिशयोऽन्तकः ।६८।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।६९।
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्‌ ।७०।
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ।७१।
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।७२।
भगवान्‌ भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ।७३।
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ।७४।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्‌ ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्‌ ।७५।
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।७६।
अनिवर्ती निवृत्तामा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।७७।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ।७८।
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।७९।
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।८०।
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुध्दात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।८१।
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।८२।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ।८३।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्‌‍ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद्‌ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।८४।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।८५।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।८६।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।८७।
सद्‌गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।८८।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ।८९।
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्‌ ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।९०।
एको नैकः सवः कः किं यत्पदमनुत्तमम्‌ ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।९१।
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ।९२।
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्‌ ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।९३।
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृङ्गो गदाग्रजः ।९४।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्‌ ।९५।
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।९६।
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।९७।
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ।९८।
सुवर्णविन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्र्दो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ।९९।
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।१००।
सुलभः सुव्रतः सिध्दः शत्रुजिच्छ्त्रुतापनः ।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ।१०१।
सहस्त्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ।१०२।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलोगुणभृन्निर्गुणो महान्‌ ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्द्धनः ।१०३।
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।१०४।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः ।१०५।
सत्ववान्सात्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ।१०६।
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।१०७।
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकदोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ।१०८।
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ।१०९।
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।११०।
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।१११।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दु:स्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ।११२।
अनन्तरुपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्त्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।११३।
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ।११४।
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।११५।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्वं तत्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ।११६।
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञॊ यज्ञोपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ।११७।
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।११८।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।११९।
शङ्खभृन्नदकी चक्री शार्ङ्ग्धन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।१२०।
      ॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥

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Thursday, July 23, 2015

अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) क्यों लगता है? जानिए इसका ज्योतिषीय एवं धार्मिक रहस्य Why does an extra month (Purushottam month) occur? Learn its astrological and religious secrets.

अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) क्यों लगता है? जानिए इसका ज्योतिषीय एवं धार्मिक रहस्य 

Why does an extra month (Purushottam month) occur? Learn its astrological and religious secrets.



सनातन धर्म में जब भी अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास आता है, तब लोगों के मन में यह जिज्ञासा अवश्य होती है कि आखिर यह अतिरिक्त मास क्यों आता है?
क्या इसका कोई खगोलीय कारण है या केवल धार्मिक मान्यता?

वास्तव में अधिक मास का आधार पूर्णतः ज्योतिषीय एवं खगोलीय गणना पर आधारित है।
सिद्धांत ज्योतिष में सूर्य एवं चन्द्रमा की गति के अंतर के कारण ही अधिक मास की उत्पत्ति मानी गई है।


सौर मास और चन्द्र मास क्या होते हैं?

सौर मास

सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक का समय सौर मास कहलाता है।

अर्थात जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहते हैं।

मध्यम मान के अनुसार —
 एक सौर मास में लगभग
30 दिन, 10 घंटे और 30 मिनट होते हैं।


चन्द्र मास

एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक का समय चन्द्र मास कहलाता है।

मध्यम मान के अनुसार —
 एक चन्द्र मास में लगभग
29 दिन, 13 घंटे और 44 मिनट होते हैं।


सौर मास और चन्द्र मास का अंतर

यदि दोनों की तुलना करें तो —

 सौर मास और चन्द्र मास में लगभग
20 घंटे 46 मिनट का अंतर होता है।

यह अंतर प्रत्येक महीने बढ़ता रहता है।

सिद्धांत ज्योतिष के अनुसार जब यह अंतर इतना अधिक हो जाता है कि एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच सूर्य की कोई संक्रांति नहीं पड़ती, तब वह चन्द्र मास अधिक मास कहलाता है।

इसी को सामान्य भाषा में मलमास भी कहा जाता है।


अधिक मास को मलमास क्यों कहा गया?

सौर और चन्द्र मासों की इस विसंगति के कारण उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त मास को प्राचीन काल में “मलमास” कहा गया।
क्योंकि यह सामान्य गणना से अतिरिक्त एवं असंतुलित माना जाता था।

इसी कारण इस मास में —
❌ विवाह
❌ गृह प्रवेश
❌ मुंडन
❌ यज्ञोपवीत
❌ नए शुभ कार्य
आदि वर्जित माने गए हैं।


पुरुषोत्तम मास नाम कैसे पड़ा?

पुराणों के अनुसार जब इस अतिरिक्त मास को कोई देवता स्वीकार नहीं कर रहे थे, तब यह मास भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में गया।

भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और कहा कि —

“यह मास अब मेरा प्रिय मास होगा और इसमें जप, तप, दान, भक्ति एवं धर्म कार्य करने वालों को विशेष पुण्य प्राप्त होगा।”

तभी से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।


पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

✅ भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण की पूजा
✅ गीता एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ
✅ दान-पुण्य एवं सेवा
✅ मंत्र जाप एवं ध्यान
✅ सत्संग एवं भजन-कीर्तन

इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल अक्षय माना गया है।


निष्कर्ष

अधिक मास केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह सूर्य और चन्द्रमा की गति के वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय अंतर का परिणाम है।
सनातन धर्म ने इस खगोलीय व्यवस्था को आध्यात्मिक साधना से जोड़कर इसे पुरुषोत्तम मास का दिव्य स्वरूप प्रदान किया है।

“हरि स्मरण, हरि आराधन — पुरुषोत्तम मास में जीवन बने पावन।”


प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर

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Saturday, August 13, 2011

एक श्लोकी विष्णु सहस्रनाम


एक श्लोकी विष्णु सहस्रनाम


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्र नाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने।।

इस मन्त्र का बारम्बार चिंतन स्मरण करने से विष्णु सहस्रनाम पाठ का फल प्राप्त होता है।

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