Thursday, September 13, 2018

श्री गणेश महोत्सव Shri Ganesh Mahotsav

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक गणेश उत्सव मनाया जाता है। विघ्नहर्ता  भगवान गणेश की  पूजा करने से मनुष्य को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है साथ ही विघ्न, कष्ट और मुसीबतों से छुटकारा मिलता है।

भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था।

गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, 10 दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणपति स्थापना और  पूजा :-

 भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है।

हिन्दु समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है।
गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।

मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है।

गणेश चतुर्थी पर  चन्द्र-दर्शन निषेध:-

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।

पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।

नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।

मिथ्या दोष निवारण मन्त्र

चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिये वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं।

अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये -

मन्त्र-
 "सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥"

गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान श्री गणेश को घर में भी  शुभ मुहूर्त में ही लाना चाहिए।
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Saturday, September 8, 2018

वैवाहिक जीवन को प्रभावित करने वाले कुछ योग vaivaahik jeevan ko prabhaavit karane vaale kuchh yog

हमारी जन्मपत्रिका में कुछ ग्रहों की युति या सम्बन्ध जो निश्चित रूप से वैवाहिक जीवन को प्रभावित करते हैं।

Combination of some planets or relationships in our horoscope which surely affect marital life.

1. चन्द्र +राहू युति=  पति- पत्नी की मानसिक स्थिति में असंतुलन होता है। 
2. मंगल+राहू की युति = अड़ियल स्वभाव के कारण एक दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाना।

3. शुक्र +राहू की युति = जातक के पत्नी के अलावा अन्य स्त्री से सम्बन्ध के कारण अथवा माता-पिता की इच्छा के बिना विवाह कारण तलाक।

4. सूर्य+राहू = आर्थिक स्थिति को लेकर मतभेद , तथा तलाक की नौबत।

5. शनि +राहू = एक दूसरे से अलग रहने के कारण , अशांति तथा तलाक।

6. बुध+राहू = वैचारिक असमानता के कारण अशांति तथा तलाक।

7. मंगल+शुक्र+राहू = घरेलू अशांति, दुःख तथा तलाक।

8. शुक्र+चन्द्र +राहू = स्त्रियों से हानि, घरेलू अशांति। पराई औरतों से सम्बन्ध अंत में तलाक।

विशेष- यदि ये  ग्रह योग 2-7 -11 वे भाव में हो और इन पर किसी क्रूर ग्रहों की द्रष्टि हो तो ये ज्यादा प्रभावशाली होते है बाकी इसके आलावा भी अन्य कई  योग है जिससे वैवाहिक जीवन में तनाव, परेशानी या आपसी मतभेद हो सकता है ।

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Monday, September 3, 2018

जाने भगवान क्यों नहीं सुन रहा इतनी पूजा /प्रार्थना करने पर भी? Why is not God listening to so much worship / prayer?

भगवान क्यों नहीं सुन रहा इतनी पूजा /प्रार्थना करने पर भी ?

bhagavaan kyon nahin sun raha itanee pooja /praarthana karane par bhee ?

संसार में बहुत से लोग यहाँ तक कहते हैं की वह बिना स्वार्थ पूजा -पाठ कर रहे ,इतने सालों से मंदिर /गुरुद्वारा जा रहे ,कभी कुछ नहीं माँगा ,भले उनके जीवन में अनेक कष्ट थे|पर यह सच नहीं है ,बिना  स्वार्थ कोई कुछ नहीं करता ।
मंदिर ,भगवान् को मानने /पूजने का बड़ा कारण ज्यादातर लोगों में या तो भय होता है या कोई न कोई स्वार्थ। कुछ लोग स्पष्ट स्वार्थ के तहत पूजा पाठ करते हैं तो कुछ लोग आंतरिक स्वार्थ वश हाथ जोड़ने वाला तक यह कामना तो जरुर रखता है की उसका भला हो ,भगवान् कल्याण करे ,रक्षा करे ,सफलता दे।
जब जीवन में संघर्षों -कठिनाइयों से वास्ता पड़ता है तब यह स्वार्थ खुलकर सामने आ जाता है और व्यक्ति अपनी कठिनाइयों का हल भगवान् की कृपा में खोजने लगता है ,पर अधिकतर की बात भगवान् तक नहीं पहुचती ,भगवान् उनकी नहीं सुनता ,उनके कष्ट नहीं कम करता ।
लोग सर पटकते रहते हैं मंदिरों /तस्वीरों के आगे पर उनके जीवन की कठिनाइयाँ बढती ही जाती हैं।
कुछ समय बाद हम अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं की इतनी पूजा -आराधना करते हैं किन्तु कोई लाभ नजर नहीं आता ,पता नहीं भगवान् है भी की नहीं ,या वह हमारी सुनता क्यों नहीं ।हम तो रोज पूरे श्रद्धा से इतनी देर तक पूजा करते हैं ,इस मंदिर जाते हैं उस मंदिर जाते हैं ,सब जगह मत्था टेक रहे ।पर हमारे कष्ट कम होते ही नहीं ।
पाप करने वाले ,पूजा न करने वाले सुखी हैं और हम इतनी सदाचारिता से रहते हैं ,पूजा-पाठ करते हैं ,अपने घर में भगवान् को बिठाये हैं पर हम कष्ट ही कष्ट उठा रहे हैं |
हम इसका तार्किक और आतंरिक विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं की यहाँ भगवान् की कोई सीधी भूमिका है ही नहीं ।उस तक तो आपकी बात पहुँच ही नहीं रही ।उस तक आपकी बात पहुंचाने का माध्यम ही बीच से टूटा हुआ है या कोई और आपकी पूजा ले ले रहा ।
आपके पिछले कर्म ,आपके उपर की या घर की नकारात्मकता कष्ट दे रही ,न भगवान् कष्ट दे रहा न भाग्य कष्ट दे रहा ,कारण तो कुछ और ही है ।
जब लोगों को बताया जाता है की आप पर या घर पर नकारात्मक उर्जा का प्रभाव है जिसके कारण कष्ट आ रहे हैं तो कुछ लोग यह भी कहते मिलते हैं की हम तो शिव ,हनुमान ,कृष्ण ,दुर्गा आदि की पूजा करते हैं रोज नियमित ,फिर हमें कष्ट क्यों है ,नकारात्मकता कैसे है।
क्या भगवान् इसे नहीं हटा सकते ,या कोई तांत्रिक अभिचार कर रहा है तो क्यों ये देवी देवता रक्षा नहीं कर रहे ।
हमारे कष्ट क्या उन्हें दिखाई नहीं देते,क्यों वे हमारी नहीं सुन रहे,कुछ अंध श्रद्धालु इसे पूर्व जन्म का दोष देकर अपने को संतुष्ट रखने का प्रयत्न करते हैं की यह हमारे पूर्व जन्म के दोष हैं जिससे कोई पूजा पाठ नहीं लग रहा ।
जब हम इसका विश्लेषण करते हैं तो इसके कई कारण मिलते हैं ।
आजकल सबसे बड़ी समस्या हर घर में कुल देवी/देवता की आ रही है ,बहुतों को इनका पता नहीं है,कुछ को पता है तो पूजा पद्धति भूल चुके हैं ।यहाँ ध्यान देने योग्य है की कुलदेवता वह सेतु होते हैं जो आपकी पूजा सम्बंधित देवता तक पहुचाते हैं ,आपके कुल की रक्षा करते हैं ।वायव्य बाधाओं को रोकते हैं |इन्हें ठीक से पूजा न मिलने पर आपकी पूजा भी ठीक से आपके इष्ट तक नहीं पहुचती है ।घर में और आप पर नकारात्मक उर्जा बेरोक टोक आ सकती हैं या प्रभावित कर सकती हैं ।कभी-कभी ऐसा भी होता है की कुलदेवता/देवी की ठीक से पूजा न होने पर कोई वायव्य बाधा जैसे भूत-प्रेत-ब्रह्म-पिशाच-जिन्न आदि आपको या आपके घर को प्रभावित करने लगता है ।
कुलदेवता के अभाव में वह आपके घर की अथवा आपकी पूजा लेने लगता है ,वह आपकी पूजा आपके इष्ट तक नहीं पहुचने देता अपितु आपकी पूजा से अपनी शक्ति बढाने लगता है और आपके घर में स्थायी डेरा जमा लेता है ।ऐसे में आप चार घंटे रोज पूजा करो मिलेगा कुछ नहीं,होगा वही जो वह शक्ति चाहेगा,कभी कभी आपने देखा होगा लोगों पर आवेश आते हैं,|यह अधिकतर ऐसी ही शक्तियों का प्रभाव होते हैं,अधिकतर मामलों में यह शक्तियां अपने आपको देवता या देवी के रूप में प्रस्तुत करते हैं,लोग भ्रम में पड़ जाते हैं की देवी या देवता का आवेश आ रहा है और उन्हें पूजा देने लगते हैं ।
चूंकि यह शक्तियां भूत काल जानती हैं अतः इनके द्वारा बताई गयी घटनाएं सही भी होती हैं ,लोगों का विश्वास बन जाता है की सचमुच देवी/देवता ही हैं ,पर सच्चाई बिलकुल उलट होती है ।यह अधिकतर आत्मिक शक्तियां होती हैं जो किसी सिद्ध पीठ पर पहुचते ही आवेश देने लगती हैं |
आपकी पूजा का पूरा लाभ आपको न मिलने का दूसरा कारण होता है ,आपके द्वारा सही पद्धति से पूजा न किया जाना अथवा सही ढंग से मंत्र आदि का उच्चारण न होना ।
आप ध्यान से देखें तो पायेंगे की हर देवता के मंत्र में अलग विशिष्टता होती है ,सबकी पूजा पद्धति भिन्न होती है ,सबका रूप अलग होता है।ऐसा क्यों ? इसलिए की हर देवता की ऊर्जा प्रकृति भिन्न होती है जो उसके गुणों और कार्यों के अनुरूप होता है,इसलिए उसकी कल्पना भी अलग होती है,इसीलिए सबकी पूजा भी एक जैसे नहीं होनी चाहिए।
सबकी अलग पूजा पद्धति उनके विशिष्ट गुण को उभारने और विशिष्ट ऊर्जा प्राप्त करने के लिए होती है।
आप पूजा दुर्गा -काली की करें और मन में रोने धोने अथवा भावुकता का भाव रखें तो दुर्गा -काली की शक्ति आपको ठीक से नहीं मिलेगी।बहुत लोगों को मेरी बात अनुचित लगेगी किन्तु यह सच्चाई है ।
उग्र शक्ति की ऊर्जा पाने के लिए आपके भाव भी उग्र होने चाहिए ,आपकी पद्धति और सामग्री भी वैसी ही होनी चाहिए।कोमल भाव से उग्र शक्ति प्राप्त नहीं होगी,यही वह कारण है की अघोरी ,तांत्रिक उग्र शक्ति की साधना करते हैं और भाव उग्र रखते हैं जिससे उन्हें पूर्ण शक्ति मिलती है ।
कहने को तो लोग कहते मिलेंगे की वह तो माँ है जिस भाव में जिस रूप में भी पूजो वह मिलेगी ।सत्य है की वह माँ है ,पर उस माँ की प्रकृति और स्वरुप भिन्न भी होती है जो उसके कार्यों और गुणों के कारण होती है ।
सरस्वती की पूजा क्रोध में करेंगे तो या उग्र भाव से करेंगे तो वह कैसे प्रसन्न होगी ,कैसे वह आपके साथ तालमेल बैठाएगी,उसे पाने के लिए तो कोमल भाव ही चाहिए।
भैरव की साधना आप कोमल भाव से करें ,हनुमान की साधना आप स्त्री रत रहते हुए करें तो यह कैसे प्रसन्न होंगे। इनके लिए तो ब्रह्मचर्य और उग्र भाव ही चाहिए ।ऐसा ही पूजा पद्धतियों के साथ है,एक समान तरीके अथवा पद्धतियाँ सबके अनुकूल नहीं होती।वस्तुएं और पद्धति विपरीत ऊर्जा उत्पन्न कर रही हैं और आप विपरीत शक्ति को बुला रहे हैं तो वह नहीं आएगी ।अगर आ भी गयी तो आपसे तालमेल नहीं बैठ पायेगा
कुछ लोग तीन घंटे चार घंटे भी पूजा करते हैं पर कष्ट ही पाते हैं ।यह पूर्व जन्म के दोष नहीं हैं ।आज की गलतियाँ हैं ।अगर आप साधक नहीं हैं और गुरु से मार्गदर्शन नहीं मिल रहा ,ठीक से तरीके नहीं पता ,मंत्र का शुद्ध उच्चारण नहीं मालूम ,स्तोत्र आदि की प्रिंटिंग में अशुद्धि है तो आप जितनी अधिक पूजा करेंगे गलती उतनी ही अधिक होगी ।ध्यान देने योग्य है की शक्तियां गलतियों को क्षमा नहीं करती ,भले आप भ्रम पाले रहें की यह तो माता-पिता हैं कभी अहित नहीं कर सकते किन्तु सच्चाई बिलकुल उलट है आपकी गलती उर्जा की प्रकृति को विकृत कर देती है जिससे वही ऊर्जा आपकी गलती पर दस गुना अधिक नुक्सान दायक हो जाती है ।सोचिये ठीक से पूजा किया तो मिला एक गुना और थोड़ी सी गलती हो गई तो नुकसान हो गया दस गुना,अब नुक्सान में कौन होगा,आपको मंत्र ठीक से पता नहीं है ,गुरु है नहीं ,पद्धति पता है नहीं ,सामग्री अशुद्ध है ,भाव गलत हैं और पूजा किया तीन घंटे तो नुक्सान भी तो उठाएंगे ।दोष देवता को देते हैं ,गलती तो आपकी है।
यह भाग्य का नहीं आपके पूजा की गलती का दोष है ।यही वह कारण है की न पूजा करने वाला अथवा कम करने वाला अधिक लाभ में भी कभी कभी हो सकता है और अधिक करने वाला कष्ट में भी,पूजा कम कीजिये पर सही और शुद्ध कीजिये अधिक फायदे में रहेंगे,मंत्र शुद्ध हो ,उच्चारण सही हो ,सामग्री शुद्ध हो और उस देवता के अनुकूल हो ,पद्धति सही हो तो थोड़ी सी पूजा अधिक लाभ दे देती है ।
आप हमेश यह ध्यान दीजिये की शक्तियों की अपनी कोई दृष्टि नहीं होती ।आप कहते हैं ना की वह देखता नहीं क्या की हम कितना कष्ट उठाते हैं ।सचमुच वह नहीं देखता |क्योकि उसे आँखें तो होती ही नहीं।वह तो वही देखता है जो आप उसे दिखाएँगे।आपमें अगर शक्ति नहीं है की आप उसे कुछ दिखा सकें तो वह कुछ नहीं देखता ।आपमें शक्ति हो तो आपका आशीर्वाद अथवा श्राप वह पूरा करने को बाध्य होता है ।आपमें शक्ति नहीं है ,वह आपसे जुड़ा नहीं है तो वह कुछ नहीं देखता।तांत्रिक या शत्रु आपका नुक्सान कर रहा है ,आपके ही देवता को आपके विरुद्ध लगा रहा है आप सोचते हैं की हम भी तो पूजा करते हैं फिर हमारा ही नुकसान कैसे हो रहा है ।यहाँ शक्ति संतुलन होता है ।आपकी पूजा की शक्ति कम है आप दिखा नहीं पाते ,अपने देवता को उनके विरुद्ध खड़ा नहीं कर पाते।इसलिए आप कष्ट पाते हैं ।यह सब ऊर्जा का खेल है ।देवी/देवता सब उर्जायें हैं ।जो जितनी शक्ति से इन्हें जो दिखाता है उनसे वैसा करा लेता है ।इन्हें आँखें तो आपने काल्पनिक बनाई हैं ,यह तो केवल आपकी दृष्टि से ही देख सकती हैं ,इसका कोई शरीर ही नहीं होता ।जैसी आपकी कल्पना वैसा इनका रूप ।
आज के समय में अधिकतर लोगों के पास गुरु नहीं है ।कुछ लोगों के पास ऐसे भी गुरु हैं जो अंध श्रद्धा में बना लिए गए या प्रचार देख कर उन्हें गुरु बना लिया पर उनसे कोई मार्गदर्शन नहीं मिल पाता ,क्योकि गुरु का मात्र उद्देश्य व्यवसाय है।उनके पास मार्गदर्शन के लिए समय ही नहीं ,अथवा उन्हें खुद जानकारी ही नहीं जिससे वह खुद को व्यस्त दिखा रहे हैं ।गुरु के न होने पर अथवा अयोग्य गुरु के होने पर साधक अथवा शिष्य के लिए मार्ग और कठिन हो जाता है ।वह साधना अथवा पूजा देर तक कर सकता है पर उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिलता ।गलतियाँ होने पर नुकसान भी होता है ।गुरु का सुरक्षा चक्र उसके पास नहीं होता कि वह नुकसान को रोक सके या गुरु है भी तो गुरु में ही शक्ति नहीं कि कुछ  कर सके। गुरु मंत्र ,गुरु का मार्गदर्शन न होने से मन्त्रों का जागरण नहीं हो पाता अथवा उनमे शक्ति नहीं आ पाती ।सही पद्धति ,सही उच्चारण का मार्गदर्शन नहीं मिल पाता ।ऐसे में गलतियों और कष्ट की सम्भावना बढ़ जाती है ।
कैसे मन एकाग्र किया जाए?किन मुद्राओं ,किन वस्तुओं ,किन आसन का उपयोग हो बताने वाला कोई नहीं होता।परिणाम स्वरुप लम्बी और क्लिष्ट साधनों की तो बात ही क्या सामान्य पूजा भी लाभ नहीं दे पाती ,कभी कभी तो कष्ट बढ़ भी जाते हैं।इसलिए गुरु और वह भी योग्य जरुर चुनना चाहिए ।वह भी ऐसा जो मार्गदर्शन दे सके।ऐसा नहीं की उसके यहाँ भीड़ देखी और चुन लिया ।उसके पास समय ही नहीं है ,अथवा वह प्रायोजित भीड़ जुटाने वाला है अथवा उसे व्यवसाय में रूचि है अथवा उसे खुद जानकारी नहीं है अथवा वह खुद साधक नहीं है और चोला चढ़ाया हुआ है ।ध्यान दीजिये गुरु आडम्बर नहीं करता ,भेष नहीं बनाता ,भीड़ से दूर रहता है ।यह उपरोक्त कुछ कारण हैं जो लोगों की पूजा के अपेक्षित परिणाम में बाधक होते हैं।यद्यपि और भी कारण होते हैं अधिकतर कष्ट के और पूर्ण परिणाम न मिलने के ।

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Sunday, September 2, 2018

चरणामृत का महत्व charanaamrit ka mahatva

जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है।

चरणामृतका क्या महत्व है?इसे कैसे ग्रहण करना चाहिए?

What is the importance of charanamrit? How should it be accepted?

शास्त्रों में कहा गया है


अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।

अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधि के समान है।

● जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।

● जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया।

● वह चरणामृत गंगा की धारा बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये  शक्ति है भगवान के चरणों की, जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी ।

● इसीलिए इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है।

● चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

● भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

● चरणामृत का महत्व चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

● आयुर्वेद के मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है।

● उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

●आयुर्वेद के अनुसार इसमें तुलसी के पत्ते डालेेजाते हैं  जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।

● तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए ।

● ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

● इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है।

●यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है।

● कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी और चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये।

● चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं।

 ●चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं।

 ● शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।

● इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।

● इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

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एकादशी ekadashi

एकादशी दो प्रकार की होती है।
(1)सम्पूर्णा (2) विद्धा
सम्पूर्णा:-जिस तिथि में केवल एकादशी तिथि होती है अन्य किसी तिथि का उसमे मिश्रण नही होता उसे सम्पूर्णा एकादशी कहते है।

विद्धा एकादशी पुनः दो प्रकार की होती है
(1) पूर्वविद्धा (2) परविद्धा
पूर्वविद्धा:- दशमी मिश्रित एकादशी को पूर्वविद्धा एकादशी कहते हैं।यदि एकादशी के दिन अरुणोदय काल (सूरज निकलने से लेकर लगभग  1घंटा 30 मिनट का समय) में यदि दशमी का नाम मात्र अंश भी रह गया तो ऐसी एकादशी पूर्वविद्धा दोष से दोषयुक्त होने के कारण वर्जनीय है यह एकादशी दैत्यों का बल बढ़ाने वाली है।पुण्यों का नाश करने वाली है।

पद्मपुराण में वर्णित है।
" वासरं दशमीविधं दैत्यानां पुष्टिवर्धनम।
मदीयं नास्ति सन्देह: सत्यं सत्यं पितामहः।।
" दशमी मिश्रित एकादशी दैत्यों के बल बढ़ाने वाली है इसमें कोई भी संदेह नही है।"
परविद्धा:-* द्वादशी मिश्रित एकादशी को परविद्धा एकादशी कहते हैं!
" द्वादशी मिश्रिता ग्राह्य सर्वत्र एकादशी तिथि:
"द्वादशी मिश्रित एकादशी सर्वदा ही ग्रहण करने योग्य है।"
इसलिए भक्तों को परविद्धा एकादशी ही रखनी चाहिए।ऐसी एकादशी का पालन करने से भक्ति में वृद्धि होती है।दशमी मिश्रित एकादशी से तो पुण्य क्षीण होते हैं।
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क्या देवता भोग ग्रहण करते है ? kya devata bhog grahan karate hai ?

क्या सच में देवतागण भोग ग्रहण करते हैं ?
kya sach mein devataagan bhog grahan karate hai ?
हां , ये सच है ..शास्त्र में इसका प्रमाण भी है ..
गीता में भगवान् कहते है ...'' जो भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है , उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ , वह पत्र पुष्प आदि मैं ग्रहण करता हूँ ...गीता ९/२६

अब देवता भोग ग्रहण कैसे करते है , ये समझना जरुरी है।
ab devata bhog grahan kaise karate hai , ye samajhana jaruree hai

हम जो भी भोजन ग्रहण करते है , वे चीजे पञ्च तत्वों से बनी हुई होती है ....क्योकि हमारा शरीर भी पञ्चतत्वों से बना होता है ..इसलिए अन्न, जल, वायु,प्रकाश और आकाश ..तत्व की हमें जरुरत होती है ,
जो हम अन्न और जल आदि के द्वारा प्राप्त करते है ...

देवता का शरीर पांच तत्वों से नहीं बना होता , उनमे पृथ्वी और जल तत्व नहीं होता ...मध्यम स्तर के देवताओ का शरीर तीन तत्वों से तथा उत्तम स्तर के देवता का शरीर दो तत्व --तेज और आकाश से बना हुआ होता है ...इसलिए देव शरीर वायुमय और तेजोमय होते है ...

यह देवता वायु के रूप में गंध, तेज के रूप में प्रकाश को ग्रहण और आकाश के रूप में शब्द को ग्रहण करते है ...

यानी देवता गंध, प्रकाश और शब्द के द्वारा भोग ग्रहण करते है ..जिसका विधान पूजा पध्दति में होता है ...जैसे जो हम अन्न का भोग लगाते है , देवता उस अन्न की सुगंध को ग्रहण करते है ,,,उसी से तृप्ति हो जाती है ..जो पुष्प और धुप लगाते है ,उसकी सुगंध को भी देवता भोग के रूप में ग्रहण करते है ... जो हम दीपक जलाते है , उससे देवता प्रकाश तत्व
को ग्रहण करते है ,,,आरती का विधान भी उसी के लिए है ..

जो हम मन्त्र पाठ करते है , या जो शंख बजाते है या घंटी घड़ियाल बजाते है , उसे देवता गण ''आकाश '' तत्व के रूप में ग्रहण करते है ...

यानी पूजा में हम जो भी विधान करते है , उससे देवता वायु,तेज और आकाश तत्व के रूप में '' भोग '' ग्रहण करते है ......

जिस प्रकृति का देवता हो , उस प्रकृति का भोग लगाने का विधान है...
jis prakrti ka devata ho , us prakrti ka bhog lagaane ka vidhaan hai...

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Saturday, September 1, 2018

अटल परिचय Atal Prichay

Hindu Than Man Hindu Life Rug Rag Hindu Introduction
 हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय

मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर
पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर
अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर
विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियोंकी निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मै आया तभि द्रवित होकर मै आया ज्ञान दीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगोंको लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै वीरपुत्र मेरी जननी के जगती मे जौहर अपार
अकबर के पुत्रोंसे पूछो क्या याद उन्हे मीना बझार
क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलनेवाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो माताए तिल तिल कर जल कर हो गई अमर
वह बुझनेवाली आग नही रग रग मे उसे समाए हूं
यदि कभि अचानक फूट पडे विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामोंपर कब मैने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी
भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज
मेरा इसका संबन्ध अमर मै व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैने पाया तन मन इससे मैने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण
मै तो समाज की थाति हूं मै तो समाज का हूं सेवक
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

Friday, August 31, 2018

जाने कैसे अंकों के द्वारा भाग्य बढ़ाये? Know how to increase fate by numbers?

अंक ज्योतिष में कुछ सरल प्रयोगों द्वारा द्वारा भाग्य बढ़ाने का उपाय-
The measures to increase fortune by some simple experiments in points astrology-


 अंक ज्योतिष से ऐसे पता चलता है भाग्यांक और मूलांक


 प्राणियों के कर्म और भाग्य ग्रहीय अंक 1 से 9 के द्वारा प्रभावित होते हैं। अंक गणना के आधार पर अपने व्यक्तिगत क्षमताओं संभावनाओं को समझा और संवारा जा सकता है। किसी भी माह की 1, 10, 19 और 28 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 1 होगा।

इसी प्रकार, जन्मतिथि के दोनों अंकों का योग अथवा एक से नौ तिथियों में से कोई हो तो वह एक अंक ही व्यक्ति का मूलांक होता है। 10 से 31 तक किसी भी तारीख का मूलांक इस विधि से मालूम किया जाता है। इससे आंतरिक बनावट, संभावनाएं क्षमता का और भाग्यांक से घटनाओं, स्थितियों, तात्कालिक रूप से प्रभावित करने वाले परिवेश का पता चलता है

2)अंक ज्योतिष कि सहायता से हमअपने भाग्यशाली रंग, दिन और रत्न भी जान सकते हैं।

अंक, भाग्यशाली रंग, भाग्यशाली दिन, भाग्यशाली रत्न

1 लाल, सुनहरा और नारंगी रविवार माणिक्य

2 सफेद, हल्के रंग सोमवार मोती

3 पीला,नारंगी गुरुवार पुखराज

4 हल्का भूरा रविवार गोमेद

5 हरा बुधवार पन्ना

6 क्रीम, हल्के रंग शुक्रवार हीरा

7 स्लेटी सोमवार लहसुनिया

8 गहरे रंग शनिवार नीलम ,काला हकीक

9 लाल मंगलवार मूंगा

3) सफलता पाने का मंत्र-

बहुत से लोगो को अपनी राशी पता नहीं होती हैं उन सभी के लिए केवल उनके भाग्यांक  (जन्म तारीख की संख्याओ के जोड़ से प्राप्त अंक) के अनुसार उपाय करने चाहिए।
उदाहरण- 24-10-1970=2 4 1 1 9 70 =6 अर्थात इस जन्म तिथि का यह भाग्यांक है।

अब भाग्यांक द्वारा सफलता पाने का उपाय यहाँ पर दिया जा रहा हैं |

भाग्यांक 1

एक ही ब्रांड की वस्तुए ज्यादा से ज्यादा इस्तमाल करे तथा दुसरो की ज़रुरतो पर भी ध्यान दिया करे, नित्य किसी योग्य याचक को यथा संभव कुछ द्रव्य आदि दान किया करे |

भाग्यांक 2

अपनी सोच को स्थिर रखे प्रतिदिन वस्त्र परिवर्तन किया करे तथा नित्य किन्ही दो बच्चो को दूध दान किया करे |

भाग्यांक 3

केवल अपना लिखा ही व्यव्हार में लाये तथा दुसरो की राय लेकर ही अपनी लग्नशीलता बनाये रखे |

भाग्यांक 4

अपनी ज़रुरतो के अनुसार खर्चा अवश्य करे कंजूसी ना करे, सोने का कोई भी एक आभूषण अवश्य पहने |

भाग्यांक 5

अपंग, व्यक्ति की सहायता किया करे, पीले रंग के पुष्प जीवन साथी को हर माह भेंट करे |

भाग्यांक 6

दकियानूसी व पुराने विचार ना रखे, कवर लगी गद्देदार कुर्सी का प्रयोग किया करे |

भाग्यांक 7

प्रतिदिन ललाट पर रोली का तिलक लगाये तथा अन्धविश्वासी ना बने |

भाग्यांक 8

हरे रंग का रुमाल प्रयोग करे तथा भावनात्मक लगाव एक सीमा तक ही रखे |

भाग्यांक 9

आँखों में कोई भी एक सुरमा प्रयोग करे तथा विद्यार्थियो की सहायता किया करे |

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Monday, August 27, 2018

श्रीशिवमहिम्नस्तोत्र ( पुष्पदन्त विरचितम्) Shree shiv mahima stotra

श्रीशिवमहिम्नस्तोत्र ( पुष्पदन्त  विरचितम्)

Shree shiv mahima stotra
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ १॥

अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ २॥

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ॥ ३॥

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ ४॥

किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः ॥ ५॥

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ ६॥

त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ ७॥

महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥ ८॥

ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥ ९॥

तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ १०॥

अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ ११॥

अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥ १२॥

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ १३॥

अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय- भङ्ग- व्यसनिनः ॥ १४॥

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ १५॥

मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह- गणम् ।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ १६॥

वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥ १७॥

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥ १८॥

हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर  जागर्ति जगताम् ॥ १९॥

क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ २०॥

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ २१॥

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥ २२॥

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥ २३॥

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः ।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि ॥ २४॥

मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-दृशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ॥ २५॥

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि ॥ २६॥

त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ २७॥

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते ॥ २८॥

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः ॥ २९॥

बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः ।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ ३०॥

कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः ।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥ ३१॥

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ ३२॥

असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥ ३३॥

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ॥ ३४॥

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ ३५॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३६॥

कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः ॥ ३७॥

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चेताः ।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ ३८॥

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ॥ ३९॥

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ ४०॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥ ४१॥

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥ ४२॥

श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण ।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥ ४३॥

॥ इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः
         स्तोत्रं समाप्तम।।

Saturday, August 25, 2018

श्रावण पूर्णिमा Shravan Purnima


श्रावण माह की पूर्णिमा को बहुत ही शुभ व पवित्र मानते हैं।इस दिन रक्षा बंधन का पवित्र त्यौहार भी मनाया जाता है,बहनें अपने भाईयों के हाथ पर राखी बाँधकर उनसे रक्षा का वचन लेेती हैं।
श्रावणी उपाक्रम श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आरम्भ होता है। श्रावणी कर्म का विशेष महत्त्व है इस दिनयज्ञोपवीत के पूजन तथा उपनयन संस्कार का भी विधान है.
ब्राह्मण वर्ग अपनी कर्म शुद्धि के लिए उपक्रम करते हैं।इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपाकर्म होता है, उत्सर्जन, स्नान-विधि, सप्तॠषि-पूजन तर्पणादि करके नवीनयज्ञोपवीत धारण किया जाता है। 
वृत्तिवान ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं।
पुराणों के अनुसार गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री अमरनाथ की पवित्र छडी यात्रा का शुभारंभ होता है और यह यात्रा श्रावण पूर्णिमा को संपन्न होती है। कांवडियों द्वारा श्रावण पूर्णिमा के दिन ही शिवलिंग पर जल चढया जाता है और उनकी कांवड़ यात्रा संपन्न होती है।


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Tuesday, August 14, 2018

रुद्राष्टाध्यायी के पाठ का क्रम और महत्व Rudrhatadhyayi's Text and Significance

रुद्राष्टाध्यायी के पाठ का क्रम और महत्व
Rudrhatadhyayi's Text and Significance

सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी का एक आवृत्ति पाठ और अभिषेक करना रुद्राभिषेक कहलाता है।
शिव पुराण में शतरुद्री से पूजन अभिषेक आदि का बड़ा अत्युत्तम माहात्म्य बताया गया है। इसमें भी मंत्रो का प्रयोग रुद्राष्टाध्यायी से ही किया गया है।कुछ मन्त्र बाहर से लिये गये हैं। शतरुद्री सम्बन्धी वाक्य इस प्रकार मिलते हैं:-
षष्ठषष्ठि नीलसूक्तं च पुनर्षोडशमेव च।।
एषते द्वे नमस्ते द्वे नतं विद्द्द्वयमेव च।।
मीढुष्टमेति चत्वारि वय गुंग चाष्टमेव च।।
शतरुद्री समाख्याता सर्वपातकनाशिनी।।

यों शतरुद्री का प्रयोग श्रेष्ठ होने पर भी रुद्राभिषेक में रुद्री का नमकचमकात्मक प्रयोग विशेष रूप से प्रचलित है।
इसमें रुद्राष्टाध्यायी का पहले सात अध्याय तक पाठ करके अष्टम अध्याय में क्रमशः 4,4,4,3,3,3,2,1,1,2 मन्त्रो पर विराम करते हुए पञ्चम अध्याय अर्थात नीलसूक्त के 11 पाठ होते है।
● इस प्रकार एक नमकचमकात्मक रुद्राभिषेक को एक "रुद्र" कहते हैं।
● 11रुद्रों का एक लघुरुद्र होता है।
● 11 लघुरुद्रों का एक महारुद्र होता है।
● 11 महारुद्रों का एक अतिरुद्र होता है।

रुद्राष्टाध्यायी के पाठ और उनसे होने वाले रुद्रादि प्रयोंगों के लाभ
Benefits of Rudrhatadhyayi lessons and Rudradi Prayogs

रूद्र प्रयोग Rudra Prayog

● एक रुद्र से बालग्रहों की शान्ति होती है।
● 3 रुद्रों से उपद्रव की शान्ति होती है।
● 5 रुद्रों से ग्रह शान्ति होती है।
● 7 रुद्रों से भय का निवारण होता है।
● 9 रुद्रों से शान्ति एवं वाजपेय फल की प्राप्ति होती है।
● 11 रुद्रों से राजा का वशीकरण होता है।
         
   लघुरुद्र प्रयोग Laghu rudra Prayog

● 1 लघुरुद्र से कामना की पूर्ति होती है।
● 3 लघुरुद्रों से शत्रु भय का नाश होता है।
● 5 लघुरुद्रों से शत्रु और स्त्री का वशीकरण होता है।
● 7 लघुरुद्रों से सुख की प्राप्ति होती है।
● 9 लघुरुद्रों से कुल की वृद्धि एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है।

महरुद्र प्रयोग Maharudra Prayog

● 1 महरुद्र से राजभय का निराकरण, शत्रु का उच्चाटन,दीर्घायु, यश-कीर्ति-चतुर्वर्ग की प्राप्ति होती है।
● 3 महरुद्रों से दुष्कर कार्य भी सुख साध्य हो जाता है।
● 5 महरुद्रों से राज्य प्राप्ति के साधन होते हैं।
● 7 महरुद्रों से सप्तलोक साधन होता है।
● 9 महरुद्रों से मोक्ष पद के मार्ग प्राप्त होते हैं।

अतिरुद्र प्रयोग Atirudra Prayog

● 1 अतिरुद्र से देवत्व की प्राप्ति होती है।डाकिनी-शाकिनी-अभिचारादि भय का निवारण होता है।
● 3 अतिरुद्रों से संस्कार भूतादि बाधायें दूर होती हैं।
● 5 अतिरुद्रों से ग्रहजन्य फल एवं व्याधि शांत होती है।
● 7 अतिरुद्रों से कर्मज व्याधियां शांत होती हैं।
● 9 अतिरुद्रों से सर्वार्थसिद्धि होती है।
● 11 अतिरुद्रों से असाध्य का भी साधन होता है।
इन रुद्राष्टाध्यायी के पाठ, अभिषेक आदि  के द्वारा शिवकृपा से हम अपने  लिए मनचाही स्थितियां निर्मित कर सकते हैं,इन प्रयोगों में प्रारब्ध को मिटाने की क्षमता है।
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Monday, August 13, 2018

शतरुद्री अर्थात 100 मंत्रो से रुद्र पूजन या अभिषेक Rudra Pujaan or Abhishek from Shatrudri meaning 100 Mantras

शतरुद्री अर्थात 100 मंत्रो से रुद्र पूजन या अभिषेक
Rudra Pujaan or Abhishek from Shatrudri meaning 100 Mantras

शिव पुराण में शतरुद्री से शिव पूजन अभिषेक आदि का बड़ा अत्युत्तम माहात्म्य बताया गया है। इसमें भी मंत्रो का प्रयोग रुद्राष्टाध्यायी से ही किया गया है।कुछ मन्त्र बाहर से लिये गये हैं। शतरुद्री सम्बन्धी वाक्य इस प्रकार मिलते हैं:-
षष्ठषष्ठि नीलसूक्तं च पुनर्षोडशमेव च।।
एषते द्वे नमस्ते द्वे नतं विद्द्द्वयमेव च।।
मीढुष्टमेति चत्वारि वय गुंग चाष्टमेव च।।
शतरुद्री समाख्याता सर्वपातकनाशिनी।।

यों शतरुद्री का प्रयोग श्रेष्ठ होने पर भी रुद्राभिषेक में रुद्री का नमकचमकात्मक प्रयोग विशेष रूप से प्रचलित है।
इसमें रुद्राष्टाध्यायी का पहले सात अध्याय तक पाठ करके अष्टम अध्याय में क्रमशः 4,4,4,3,3,3,2,1,1,2 मन्त्रो पर विराम करते हुए पञ्चम अध्याय अर्थात नीलसूक्त के 11 पाठ होते है।
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● शिव और शंकर Shiva and Shankar


Saturday, August 4, 2018

अन्तिम सत्य Last truth

एक बहुत बड़ा हस्त रेखा विशेषज्ञ था उसकी बातें इतनी सटीक बैठती थी की दुर दुर तक उसके नाम के चर्चे थे

उसको लोगों के हाथों की रेखाएँ देखने का इतना जुनून था की वह कई बार ...मरे हुऐ लोगों के हाथ भी .....उनके शव ...क़ब्र से निकलवा कर देख चुका था की हस्त रेखाओं के हिसाब से ...उन्हौने पुरी उम्र जी या नही।

एक दिन उसका भी समय आ गया ...उसने अपने मरने की भी पहले से ही भविष्यवाणी कर रखी थी जिसके हिसाब से अब कुछ ही समय शेष रह गया था
लोगो ने उससे अनुरोध किया ..आप बहुत बडे विद्वान हैं आपके साथ ही आपका ज्ञान भी चला जायेगा

कृपया जाने से पहले कुछ रहस्य कोई गूढ़ बात तो बताकर जाइये जिससे हमारा भी कुछ तो भला हो सके हम भी इस रहस्य को समझ सके कुछ तो ज्ञान देकर जाइये

उस हस्त रेखा विशेषज्ञ  ने बड़ी विचित्र बात कही जिसपर विश्वास करना मुश्किल था उसने कहा ..मेरे पास बताने के लिए कुछ नही है ....क्यों की ...आज भी मैं वही खड़ा हुँ जहाँ से मैने शुरू किया था।

कई बार जब मैं अपने आपका विश्लेषण करता हुँ तो स्वयं को भी उस हस्त रेखा विशेषज्ञ की जगह ही पाता हुँ।
मैं जानता हुँ की वास्तु से क़िस्मत बदली जा सकती है पर ये भी जानता हुँ की वास्तु मानता वही है जिसकी क़िस्मत सच मैं बदलने वाली हो


मैं सिर्फ निमित मात्र हुँ ना मैं किसी के भाग्य को बना सकता हुँ और ना ही बिगाड़ सकता हुँ।
यही अंतिम सत्य है .......यही प्रारंभ है और यही अंत है
साभार
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Thursday, August 2, 2018

जीवन मे उन्नति हेतु कुछ उपाय Some Tips for Advancing Life

जीवन मे उन्नति हेतु कुछ उपाय 
Some Tips for Advancing Life


1.अगर जीवन में आर्थिक दिक्कते आती हो, व्यापार , नौकरी में आपेक्षित सफलता नहीं मिलती हो , कार्य में कमी हो या बेरोजगारी की सी स्थिति हो तो घर से बाहर कार्य के लिए जाते समय 'श्रीमद् भगवद् गीता' के अंतिम श्लोक को 21 बोलकर फिर घर से निकलें तो सफलता मिलने के योग बहुत बढ़ जाते है ।
" यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम "।।

2.जीवन में आर्थिक और किसी भी प्रकार के संकट निवारण के लिये शुक्ल पक्ष के बुधवार से शुरू करते हुए भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री स्वयं भी खाकर सोएं । यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक अवश्य ही करें। इससे घर में सुख समृद्धि का वास होता है ।

3.जीवन में धन लाभ और कार्यों में मनवाँछित सफलता प्राप्त करने के लिए घर में बजरंग बली का फोटो जिसमें वह उड़ते हुए नज़र आ रहे हो रखकर उसकी विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।

4.हर माह के प्रथम बुधवार को पाँच मुट्ठी हरे साबुत मूँग ( साबुत मूँग की दाल ) साफ हरे रुमाल / कपडे में बाँधकर सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें, इससे धन सम्बन्धी कार्यों में विघ्न नहीं आते है , आर्थिक पक्ष मजबूत होता जाता है ।

5.आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए बुधवार को हरी वस्तु का सेवन करें लेकिन पीली वस्तु का सेवन बिलकुल भी ना करें और बृहस्पतिवार पीली वस्तु खाएं लेकिन हरी वास्तु का सेवन ना करें तो धन संपत्ति में वृद्धि होती है ।

6.मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद कभी भी किसी को दूध, दही या प्याज नहीं देना चाहिए इससे घर में बरकत ख़त्म हो जाती है ।

7.घर में सुख समृद्धि लाने के लिए घर के वायव्य कोण ( उत्तरपश्चिम के कोण ) में साफ जगह पर सुन्दर से मिट्टी के बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के, लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर उस बर्तन को गेहूं या चावल से भर दें। ऐसा करने से उस घर में धन का प्रवाह लगातार बना रहता है , धन का अपव्यय भी नहीं होता है ।

8.अगर आप जीवन में स्थाई सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो आप शुक्ल पक्ष के किसी भी दिन सूर्यास्त से पहले एक पके हुए मिट्टी के घड़े को लाल रंग से रंगकर, उसमें जटायुक्त नारियल रखकर उसके मुख पर मोली बांधकर उसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें ।ऐसा माह में एक बार अवश्य ही किया करें ।

9.घर का कोई भी सदस्य बिस्तर पर बैठकर कभी भी भोजन ना करें अन्यथा लक्ष्मी माँ रुष्ट हो जाती है और घर के सदस्यों को आर्थिक संकट घेरे रहते है ।

10.घर में झाड़ू किसी साफ और किसी सुनिश्चित स्थान पर रखे । घर में झाड़ू ऐसी जगह रखे कि वह किसी भी बाहर वाले को दिखाई ना दें । झाड़ू को हमेशा लिटा कर रखे, उसे ना तो खड़ा करके रखे, ना उसे पैर लगाएँ और ना ही उसके ऊपर से गुजरे , अन्यथा लाख प्रयास के बावजूद भी घर में लक्ष्मी टिक नहीं पाती है ।

11. सदैव याद रखें कभी भी किसी से कोई चीज मुफ्त में न लें , हमेशा उसका मूल्य अवश्य ही चुकाएं , कभी भी किसी व्यक्ति को धोखा देकर धन का संचय न करें , इस तरह से कमाया हुआ धन टिकता नहीं है , वह उस व्यक्ति और उसके परिवार के ऊपर कर्ज के रूप में चढ जाता है और ऐसा करने से व्यक्ति के स्वयं के भाग्य और उसके कर्म से आसानी से मिलने वाली सम्रद्धि और सफलता में भी हमेशा बाधाएँ ही आती है ।

12. हर एक व्यक्ति को चाहे वह अमीर हो या गरीब , उसका जो भी व्यवसाय / नौकरी हो अपनी आय का कुछ भाग प्रति माह धार्मिक कार्यों में अथवा दान पुण्य में अवश्य ही खर्च करें , ऐसा करने से उस व्यक्ति पर माँ लक्ष्मी की सदैव कृपा बनी रहती है , उसके परिवार में हर्ष - उल्लास और सहयोग का वातावरण बना रहता है तथा सामान्यता वह अपने दायित्वों के पूर्ति के लिए पर्याप्त धन अवश्य ही आसानी से कमा लेता है ।

13. स्त्रियों को स्वयं लक्ष्मी का स्वरुप माना गया है । प्रत्येक स्त्री को पूर्ण सम्मान दें । घर की व्यवस्था अपनी पत्नी को सौपें , वही घर को चलाये उसके काम में कभी भी मीन मेख न निकालें । अपने माता पिता को अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा अवश्य ही दें । घर में कोई भी बड़ा काम हो तो उस घर के बड़े बुजुर्गों विशेषकर स्त्रियों को अवश्य ही आगे करें । अपने घर एवं रिश्तेदारी में अपनी पत्नी को अवश्य ही आगे रखें । अपनी माँ, पत्नी, बहन एवं बेटी को हर त्यौहार , जन्मदिवस , एवं शादी की सालगिरह आदि पर कोई न कोई उपहार अवश्य ही दे ।

14. घर के मुखिया जो अपने घर व्यापार में माँ लक्ष्मी की कृपा चाहते है वह रात के समय कभी भी चावल, सत्तू , दही , दूध ,मूली आदि खाने की सफेद चीजों का सेवन न करें इस नियम का जीवन भर यथासंभव पालन करने से आर्थिक पक्ष हमेशा ही मजबूत बना रहता है ।

15. शुक्रवार को सवा सौ ग्राम साबुत बासमती चावल और सवा सौ ग्राम ही मिश्री को एक सफेद रुमाल में बांध कर माँ लक्ष्मी से अपनी गलतियों की क्षमा मांगते हुए उनसे अपने घर में स्थायी रूप से रहने की प्रार्थना करते हुए उसे नदी की बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें , धीरे धीरे आर्थिक पक्ष मजबूत होता जायेगा ।

16. प्रथम नवरात्री से नवमी तिथि तक प्रतिदिन एक बार श्रीसूक्त का अवश्य ही पाठ करें इससे निश्चय ही आप पर माता लक्ष्मी की कृपा द्रष्टि बनी रहेगी ।

17. घर के पूजा स्थल और तिजोरी में सदैव लाल कपडा बिछा कर रखें और संध्या में आपकी पत्नी या घर की कोई भी स्त्री नियम पूर्वक वहां पर ३ अगरबत्ती जला कर अवश्य ही पूजा करें ।

18. प्रत्येक पूर्णिमा में नियमपूर्वक साबूदाने की खीर मिश्री और केसर डाल कर बनाये फिर उसे माँ लक्ष्मी को अर्पित करते हुए अपने जीवन में चिर स्थाई सुख , सौभाग्य और सम्रद्धि की प्रार्थना करें , तत्पश्चात घर के सभी सदस्य उस खीर के प्रशाद का सेवन करें ।

19. हर 6 माह में कम से कम एक बार अपने माता पिता को कोई उपहार अवश्य ही दें इससे आपकी आय में सदैव बरकत रहेगी ।

20. घर में तुलसी का पौधा लगाकर वहां पर संध्या के समय रोजाना घी का दीपक जलाने से माता लक्ष्मी उस घर से कभी भी नहीं जाती है ।

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Friday, July 27, 2018

एक प्रेरक बोध कथा A motivational perception story

मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था की अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका।

अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो।

उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है।

जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया।

इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे की एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता।

मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।

अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया।

वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा।

थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था।

बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मै इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ।

खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।

सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है।

वह फौरन मेरे साथ मुंह में यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।

अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह  बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगातार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।

उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट ले लो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रख कर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगा कर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका।

मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किस के लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इस लिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं।

टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक।

क्या ऊपर वाले की खुशियों में इन जैसे गरीब विधवाओंं का कोई हक नहीं ? क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकाल कर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते।

आप सब भी ठंडे दिमाग से एक बार जरूर सोचना ! ! ! !

और हाँ अगर आँखें भर आईं हो तो छलक जाने देना संकोच मत करना..

अगर हो सके तो इस लेख को उन सभी सक्षम लोगो को बताना  ताकि हमारी इस छोटी सी कोशिश से किसी भी सक्षम के दिल मे गरीबों के प्रति हमदर्दी का जज़्बा ही जाग जाये और यही लेख किसी भी गरीब के घर की खुशियों की वजह बन जाये।

अगर आपको रोना आ जाये कहानी पढ कर तो शेयर जरूर करना ताकि अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिले।

जन्म पत्री मृतक की है या जीवित की Birth certificate is dead or alive

कभी- कभी कुछ लोग उपहास के तौर पर ज्योतिष के जानकार (astro)के पास जाते हैं, और मरे हुए व्यक्ति कि जन्मपत्री दिखा कर उसका भविष्य पूछते हैं।

जन्म पत्री मृतक की है या जीवित की, अर्थात कुंडली देख कर ये ज्ञात करना कि जातक जिन्दा है या गत हो चुका है।

इसमें जन्म लग्न, अष्टम स्थान की राशि और प्रश्न लग्न इन तीनो की संख्या को जोड़ कर जन्मकुंडली के अष्टमेश की राशि संख्या से गुणा कर के लग्नेश की राशि संख्या से भाग देने पर विषम अंक - 1,3,5,7,9,11 शेष रहे तो जीवित की और सम अंक - 2,4,6,8,10,12 शेष रहे तो मृतक की जन्म पत्रिका होती है।

उदहारण : प्रश्न लग्न तुला, जन्म लग्न मीन और अष्टमेश की राशि 9, लग्नेश की राशि 5

7 (प्रश्न लग्न) + 12 (जन्म लग्न) + 7 ( अष्टम स्थान की राशि ) = 26 × 9 ( अष्टमेश की राशि ) = 234 ÷ 5 ( लग्नेश की राशि ) = 46 लब्ध 4 शेष

अतएव मृतक की जन्म पत्रिका है ।

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प्रश्न विचार

Thursday, July 26, 2018

27 जुलाई 2018 गुरु पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र ग्रहण

27 जुलाई 2018
गुरु पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र ग्रहण
गुरु पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र ग्रहण लग रहा है जो पूरे देश मे दिखाई देगा।इसके अतिरिक्त इस ग्रहण को अन्टार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस के दूरस्थ उत्तरीभाग को छोड़ कर अफ्रीका, यूरोप,एशिया, दक्षिण अमेरिका के मध्य और पूर्वी भाग से देखा जा सकेगा।
भारतीय मानक समयानुसार चन्द्र ग्रहण का स्पर्श अथवा प्रारम्भ रात में 11:54 मिनट पर होगा।ग्रहण का मध्य समय 01:52मिनट पर रहेगा तथा रात 03:49 मिनट पर ग्रहण समाप्त हो जाएगा।रात 01:00 बजे से लेकर रात 02:43 मिनट तक यह खग्रास की अवस्था में रहेगा जिसमें पूरा चन्द्रमा ढँका रहेगा।
यह ग्रहण उत्तराषाढ़ा एवं श्रवण नक्षत्र पर होगा।तथा इसका सूतक काल 02:54मिनट दोपहर से प्रारम्भ हो जाएगा।
वृष, मिथुन, कर्क, तुला,धनु,मकर,कुम्भ राशि वालों को यह ग्रहण चिन्ता या नुकसान दायक रहेगा।
तथा मेष,सिंह,वृश्चिक, और मीन राशि वालों को यह ग्रहण शुभ फल दायक होगा।
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