Monday, June 17, 2019

ग्रह गोचर फलम् Planetary transit

ग्रहों का राशि से गोचर भ्रमण का शुभाशुभ फल
         
सूर्य फलम्

1.जब सूर्य जन्मराशि में गोचर में भर्मण करता है तब वैभव की हानि,यात्रा,रोग,पीड़ा आदि फल होता है।
2.गोचर में जन्मराशि से द्वितीय सूर्य वित्त की हानि,धोखा होने से हानि,जल सम्बन्धी रोग आदि होते हैं।
3.गोचर में जन्मराशि से तीसरा सूर्य स्थानलाभ(भूमि भवन पद आदि की प्राप्ति),शत्रुनाश,अर्थलाभ एवं स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
4.गोचर में जन्म राशि से चतुर्थ सूर्य से नारिभोग में बाधा तथा रोगपीड़ा होती है।
5.गोचर में पंचमस्थ सूर्य हो तो जातक को शत्रुओं तथा रोग से पीड़ा होती है।
6.गोचर में षष्ठस्थ सूर्य रोग रिपुओं की वृद्धि तथा व्यर्थ चिंता देता है।
7.सप्तमस्थ सूर्य दीनता,दूर की यात्रा एवम् उदर रोग उतपन्न करता है।
8.अष्टमस्थ सूर्य से स्त्रियों में वैमनस्य राजभय एवम् रोग होता है।
9.नवमस्थ गोचर सूर्य महान बिमारी दीनता भयानक आपत्ति तथा कारोबार की हानि होती है।
10.दशम में सूर्य हो तो सर्वत्र जय एवम् कार्यों में सफलता मिलती है।
11.एकादश सूर्य से पदप्राप्ति वैभवलाभ तथा निरोगिता रहती है।
12.द्वादश सूर्य व्यापार में शुभ फल देता है ।

चन्द्र फलम्

1.जन्म राशिगत चन्द्र गोचर में संचार होने पर मिष्ठान्न शय्या भोजन वस्त्रादि की प्राप्ति होती है।
2.द्वितीय होंने पर सभी कार्यों में बाधा आती है मान तथा अर्थ का नाश होता है।
3.तृतीय होने पर नारी-वस्त्र सुख एवम् धन का लाभ मिलता है तथा विजय होती है।
4.चतुर्थ होने पे भी उत्तम होता है।
5.पंचमस्थ होने से बहुत माया(छल कपट) से शोक प्राप्त होता है विघ्न उतपन्न होते हैं।
6.षष्ठस्थ चन्द्र से सुख तथा धन प्राप्त होता है शत्रु रोग आदि का नाश होता है।
7. सप्तमस्थ होने पर अच्छा भोजन सम्मान शयनसुख आदि मिलता है एवम् आज्ञा का पालन होता है।
8.अष्टमस्थ चन्द्र से भय प्राप्त होता है।
9.नवम होने पर भाग्य वृद्धि होती है
10.दशम होने पर कर्म क्षेत्र में लाभ पिता से नजदीकी बढ़ती है।
11.एकादश में होने पर व्यापार में लाभ होता है।
12.द्वादश में होने पर मान हानि अकारण व्यय होता है ।।

मंगल फलम्

1.जन्म राशि में मंगल गोचर में  भृमण करता है तो सभी कार्यों में अवरोध उतपन्न होता है तथा चोट लगती है।
2.द्वितीयगत मंगल गोचर में राज्य शासन,चोर अग्नि तथा शत्रुओं से पीड़ा होती है। रोगों के कारण शरीर में दौर्बल्य तथा चिंता उतपन्न होती है।
3.तृतीयस्थ भौम धन की प्राप्ति होती है तथा स्वामी कार्तिकेय की कृपा प्राप्त होती है।
4.चतुर्थ के मंगल से दुष्ट लोगों के संग,उदररोग,ज्वर तथा शरीर से रक्तस्त्राव होता है।
5.पंचम स्थान के मंगल से शत्रुभय व्याधिभय तथा पुत्र द्वारा शोक होता है।
6.षष्ठस्थ मंगल से बहुमूल्य धातुओं का संग्रह होता है कलह भय आदि होता है तथा प्रियजनो का वियोग होता है।
7.सप्तमस्थ मंगल होने पर पेट रोग नेत्र रोग तथा पत्नी से कलह होती है।
8.अष्टमस्थ मंगल से शरीर से रक्तस्त्राव रक्तचाप अंगभंग मन में निराशा उतपन्न होती है और सम्मान को ठेस पहुंचती है।
9.नवमस्थ मंगल से धनवान पराजय तथा व्याधि होती है।
10.यदि दशम में मंगल हो तो सभी प्रकार से लाभ है
11.एकादश का मंगल जनपद का अधिकार जैसे विधायकादि को प्राप्त होता है
12.यदि मंगल व्ययस्थान में हो तो अनेक अनर्थों की उत्पत्ति तथा अनेक प्रकार की फिजूलखर्ची होती है।पित्त रोग तथा नेत्रविकार होता है।

बुध फलम्

1.जन्म राशि का बुध गोचर में अपने बन्धु बांधवों से कलह कराता है दुर्वचन कहने की प्रवृत्ति होती है।
2.द्वितीयस्थ बुध धन सम्पदा देता है
3.तृतीयस्थ बुध राजा तथा शत्रु से भय देता है
4.चतुर्थ होने से धनागम मित्र एवम् कुटुंब की वृद्धि होती है
5.पंचमस्थ बुध के कारण स्त्री तथा सन्तान से कलह
6.छठे बुध उन्नति विजय एवम् सौभाग्य
7.सप्तमस्थ बुध विग्रह कारक  होता है
8.अस्टम्स्थ बुध विजयी पुत्र धन वस्त्र एवम् कुशलता की प्राप्ति
9.गोचर में नवम का बुध रपग पीड़ा कारक
10.दशमस्थ बुध शत्रुनष्ट,धनलाभ,स्त्रिभोग,मधुरवाणी शुभ तथा उन्नति होति है।
11.एकादश भाव का बुध पत्नी पुत्र एवम् मित्रों का मिलन होता है तथा तुष्टि प्राप्त होती है।
12.बारहवे भाव का बुध शत्रुओं से पराजय तथा रोगों से पीड़ा देता है।
      
गुरु फलम्

1.यदि गोचरस्थ गुरु किसी को जन्म राशि का हो तो स्थानभ्रंश अर्थात या तो महत्वपूर्ण पद छिन जाता है निलम्बन हो जाता है या स्थानांतर हो जाता है। धन की हानि कलह बुद्धि की जड़ता आदि फल होते हैं
2.द्वितीयस्थ गुरु से धन का लाभ शत्रुओं का नाश रमणीय पदार्थों का भोग प्राप्त होता है।
3.तीसरे गुरु पदभ्रंश(व्यवसाय परिवर्तन) तथा कार्यबाधा होती है।
4.चतुर्थ गुरु के कारण मित्र एवम् बांधवों रिश्तेदारों से क्लेश प्राप्त होता है।
5.पंचमस्थ गुरु अश्व वाहन धन सन्तति स्वर्ण महंगी धातुएँ स्त्रीसुख तथा आवास की प्राप्ति होती है।
6.छठे गुरु से सुखप्राप्ति के साधन से भू सुख की प्राप्ति नही होती अर्थात अतृप्ति तथा असन्तुष्टि रहती है।
7.सप्तमभावस्थ गुरु गोचर में हो तो बुद्धि एवम् वाणी का प्रयोग चातुर्यपूर्वक होता है आर्थिक उन्नति होती है
कारोबार में सफलता मिलती है और स्त्री सुख मिलता है।
8.गोचरभ्रमण में स्वराशि से अष्टम राशि का गुरु तीव्र दुःख रोग पराधीनता तथा निरन्तर भटकना पड़ता है।
9.नवमस्थ गुरु से स्त्री पुत्र धन आदि का सुख प्राप्त होता है बुद्धि की प्रखरता रहती है कही हुई बातों का पालन होता है एवम् आज्ञा का उलंघन नही होता है।
10.जब गोचर में गुरु दशम में हो तो स्थाननाश तथा धननाश होता है।
11.गुरु ग्यारहवें होने पर इच्छाएं पूरी होती हैं धनलाभ होता है सभी कार्यों में सफलता मिलती है तथा नया स्थानादि प्राप्त होता है।
12.बारहवें होने पर दूर स्थानों की यात्रा बहुत दिनों तक करनी पड़ती है तथा उग्र दुःख प्राप्त होते हैं

शुक्र फलम्

1.जन्म राशि पर शुक्र का गोचर भर्मण हो तब मिष्ठान्न भोजन प्रेयसि की संगति कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थों की प्राप्ति शयनसुख सामग्री सुंदर वस्त्रादि का भोग मिलता है और आनन्दाभूति होती है।
2.द्वितीयस्थ शुक्र धन-धान्य आभूषण वस्त्र भूषा गन्धमाल्य तथा सम्मान देता है परिवार में आज्ञा का पालन होता है,शासन पक्ष से सहयोग मिलता है परिवार के लोग प्रसन्न रहते है तथा पर्याप्त सुख मिलता है।
3.तृतीय स्थान पर शुक्र होने पर आदेश की अवज्ञा होती है धन सम्मान भौतिक सामग्री वस्त्रादि का नाश होता है एवम् शत्रु नष्ट होते हैं।
4.जन्मराशि से चतुर्थ होने पर बंधुजनों का सुख स्त्री सुख तथा इंद्र के समान वैभव प्राप्त होता है।
5.पंचम राशिगत गोचर का शुक्र धन मित्र तथा गुरुजनो द्वारा तुष्टि प्रदान करता है।
6.जन्मराशि से 6ठे शुक्र मुकदमे तथा विवाद में पराजित कराता है दबे दबे में कमी होती है।
7.सप्तम में शुक्र स्त्री से भय या स्त्री के कारण कष्ट होता है।
8.अष्टम का शुक्र गृहस्थी का सुख देता है घरेलू उपकरणों का संग्रह होता है घर में साजसज्जा आदि का सामान एकत्रित होता है और स्त्री तथा रत्नादि भोग प्राप्त होते हैं।
9.जन्मराशि से नवम राशि में गोचर का शुक्र धन की प्राप्ति तथा व्यय धर्मकार्य(दान परोपकार आदि)में होता है पत्नी का सुख एवं सहयोग मिलता है।
10.दशवें शुक्र जातक की जन्मराशि से हो तो लड़ाई झगड़ा मुकदमेबाजी आदि में उलझना पड़ता है एवम् अपमान झेलना पड़ता है।
11.यदि गोचर भर्मण करता हुआ शुक्र जन्मराशि से लाभस्थान में हो तो सुगन्धित एवम् मनोहारी पदार्थ मिलते हैं तथा बन्धुओं का सुख मिलता है।
12.जन्मराशि से बारहवें स्थान पर शुक्र का गोचर धन वाहन वस्त्र आदि से सुखी करता है।

शनि फलम्

1.गोचर में जन्मराशि का शनि विष तथा अग्नि विजली आदि से भय होता है बन्धुजनों की हानि होती है तथा स्थान छोड़ना पड़ता है पुत्र एवम् परिवारजनो जो दूर जाना पड़ता है।
2.दुसरे शनि धन सौख्य शरीर की कांति तथा सम्भोग शक्ति कमजोर होती है इन तत्वों की हानि होती है।
3.तीसरे शनि होने पर शुभ फल होता है भैंस आदि तथा भारी वाहनों का सुख ट्रैक्टर ट्रक हाथी मिलता है और धन आरोग्य की प्राप्ति एवम् मनोकामना की पूर्ति होती है
4.चौथे शनि मन में कुटिलता रहती है पत्नी तथा प्रियजनों का वियोग होता है यह शनि की ढैया कहलाती है।
5.पंचमस्थ शनि से सभी से लड़ाई झगड़ा तथा पुत्र से वियोग होता है।
6.छठे शनि के गोचर में होने पर शत्रु शांत हो जाते हैं तथा रोग भी शांत होते हैं
7.सातवें शनि दूर की यात्रा कराता है तथा स्त्रीजनो से निकटता बढ़ाता है।
8.आठवें स्थान पर गोचर का शनि हो तो अपने लोगों से मनमुटाव होता है और दीनता आती है।
9.नवम भाव के शनि लोगों से अकारण वैर हो जाता है बन्धन होता है अर्थात कारावास या अन्य प्रकार से पराधीनता होती तथा अपना नियम धर्म आदि छूट जाता है।
10.दशम भाव में स्वराशि से गोचर शनि के भर्मण करने पर विद्या कीर्ति धन की हानि होती है एवम् नवीन कारोबार प्रारम्भ होता है।
11.एकादश भाव के शनि से परस्त्री का सान्निध्य प्राप्त होता है वाहन का सुख मिलता है प्रताप रौब दाब दबदबा बढ़ता है तथा अधिकार प्राप्त होता है।
12.द्वादश भाव के शनि से निरन्तर एक के बाद एक दुःख प्राप्त होता रहता है तथा जलराशि में डूबने या विपत्तियों के सागर में मग्न होने का भय रहता है।।

नोट-जन्मराशि से चौथे तथा आठवें भाव मे शनि का गोचर ढैय्या शनि कहलाता है इसी प्रकार द्वादश भाव जन्मलग्न तथा द्वितीयभाव में शनि का गोचर शनि साढ़ेसाती कहलाता है।

इस प्रकार सूर्यादि ग्रह जन्मराशि से अनेक भावों में गोचर भ्रमण करते हुए उपरोक्त फल प्रदान करते हैं।

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मौली/कलावा का धार्मिक महत्व Religious importance of Mauli / Kalava

मौली का धार्मिक महत्व
Religious importance of Mauli 


मौली हमारे वैदिक पूजन परम्परा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परम्परा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई बनाकर उसके हाथों में अपने पति भगवान विष्णु की मुक्ति के लिए यह बंधन बांधा था(यह वामन अवतार की कथा है)। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है।

मौली का अर्थ Meaning of Molly


'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है।
मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी कई प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।

मौली बांधने का मंत्र Molly mantra


"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।"


मौली का स्वरूप Form of mauli


मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 का अर्थ है त्रिदेव और 5 का मतलब पंचदेव।

कहां-कहां बांधते हैं मौली?Where do you bind Molly?


मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु में भी बांधा जाता है।

मौली बांधने के नियम Rule of tying Molly 


● शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

● कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और सिर ढका होना चाहिए।

● मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि व मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए।

मौली को किन अवसरों पर बांधा जाता है?
On what occasions are Molly tied?


● पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए  रविवार मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।

● हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।

● प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।

● मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। 

● किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।

● किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।

● मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।

● किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।

● हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।

● इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

संकटों से रक्षा करती है मौली Molly protects from crisis


मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है। 

इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है, जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है।

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Saturday, June 15, 2019

त्राटक Tratak

त्राटक Tratak


कहा गया है कि त्राटक साधना सिद्धियों का द्वार है,भौतिक जगत की सभी उपलब्धियों की प्राप्ति इसके माध्यम से की जा सकती है।
त्राटक का अर्थ है किसी वस्तु पर मन और मस्तिष्क को एकाग्र करना। त्राटक का लाभ केवल एकाग्रता बढ़ाने में ही नहीं मिलता बल्कि इससे मनुष्य के नेत्रों में आकर्षण शक्ति  बढ़ जाती है।
क्योंकि इससे दृष्टि स्थिर होती है और मस्तिष्क विचारशून्य हो जाता है जिससे उसकी क्षमता में वृद्धि होती है। त्राटक को सम्मोहन की प्रारंभिक क्रिया भी कहा जाता है, क्योंकि सम्मोहन में सबसे पहले त्राटक का ही अभ्यास किया जाता है।
हठयोग प्रदीपिका में त्राटक को योग के छह कर्मों में से एक कहा गया है। ये कर्म हैं वस्ति, द्योति, नौलि, नेति, कपालभाति और त्राटक। इन षटकर्मों में त्राटक को सर्वोपरि स्थान दिया गया है ।

निकट त्राटक Nikat Tratak


इसके लिए किसी शांत कमरे या शांत वातावरण में सुखासन में बैठें। नेत्रों को दाएं-बाएं, उपर-नीचे चलाकर आंखों का हल्का व्यायाम करें। त्राटक के लिए सबसे अच्छा समय प्रातः 4 बजे से सूर्योदय तक होता है। अब सुखासन में बैठकर अपने सामने दो फुट की दूरी पर स्फटिक का शिवलिंग या सफेद पत्थर का गोल टुकड़ा रखकर उस पर ध्यान केंद्रित करें। एकटक उसे देखें। जितनी देर हो सकते पलक न झपकाएं। प्रारंभ में परेशानी होती लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा। आंसू निकलने लगे तो आंखें बंद कर लें। कुछ समय बाद दोबारा ऐसा ही करें। कुछ दिनों तक ऐसा करते रहें इससे अभ्यास होने लगेगा। फिर समय बढ़ाते जाएं।
शिवलिंग पर दृष्टि स्थिर होने के बाद मोमबत्ती की लौ से अभ्यास करें। जब लौ पर दृष्टि स्थिर हो जाए तो अपनी नाक पर दृष्टि जमाएं।
इसके बाद दोनों भौंहों के बीच में दृष्टि स्थिर करें। इस प्रयास में कई महीने का समय भी लग सकता है। इससे साधक को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।

दूरस्थ त्राटक Doorasth Tratak


जब निकट त्राटक का अच्छे से अभ्यास हो जाए तो साधक किसी पहाड़ की चोटी, मंदिर का गुंबद या पेड़ की टहनी पर दृष्टि जमाने का अभ्यास करे।
इन चीजों पर दृष्टि स्थिर हो जाए तो चंद्रमा पर दृष्टि जमाने का अभ्यास करे। इसके बाद तारे और फिर सूर्य पर दृष्टि जमाने क प्रयास करे।
प्रारंभ में सूर्य पर दृष्टि जमाना कठिन होता है इसलिए पानी में सूर्य के प्रतिबिंब पर दृष्टि जमाए। उसके बाद दर्पण पर सूर्य के प्रतिबिंब पर और फिर सूर्य पर। इस तरह जब 32 मिनट से अधिक दृष्टि स्थिर हो जाए तो व्यक्ति दूर त्राटक में माहिर जो जाता है।

अन्तः त्राटक Antah Tratak


परोक्त दोनों त्राटक बाह्य पदार्थों पर त्राटक है। अंतर त्राटक में साधक को आंखें बंद कर अपने मनोबल पर ध्यान लगाना पड़ता है। इसके लिए साधक आंखें बंद कर भौहों के बीच में ध्यान लगाए। अभ्यास के बाद धीरे-धीरे साधक को आंखें बंद करने पर तीन, पांच सा सात बिंदु दिखाई देंगे। जो सफेद, नीले, पीले रंग के हो सकते हैं। कुछ समय बाद ये बिंदु दिखाई नहीं देंगे और ज्योति से जगमग नेत्र दिखाई देगा। प्रारंभ में यह नेत्र हिलता हुआ नजर आएगा। इसके बाद सूर्य, चंद्र, तारे आदि दिखने का अनुभव होगा। इसके बाद आकाश के मध्य तीसरा नेत्र दिखाई देगा। यही पूर्ण अवस्था है।

नोट:- सर्वप्रथम त्राटक की क्रिया किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। सिर्फ पढ़कर या अपने मन से कुछ न करें।

Friday, June 14, 2019

घर मे अलमारी रखने का सही स्थान The right place to keep the cupboard in the house

घर मे कहाँ रखें अलमारी?
Where to keep a cupboard in the house?
वास्तु के अनुसार आलमारी को रखने की सही दिशा कौन सी है?
According to Vastu, what is the right direction to keep the cupboard?


अलमारी हमारे घर का एक अंग होती है।घर चाहे जैसा भी हो,छोटा हो या बड़ा उसमे अलमारी होती ही है।
आप ने अलमारी को घर के किस कोने में रखा हैं, अलमारी के अन्दर कौन कौन सा सामान हैं, अलमारी का रंग कौन सा हैं, इन सभी बातों का असर पड़ता हैं. आसान शब्दों में कहा जाय तो अलमारी को वास्तु के हिसाब से रखने पर आपके घर धन की वर्षा हो सकती हैं लेकिन यदि आप ने  वास्तु नियमों का पालन नहीं किया तो आपके घर दरिद्रता प्रवेश कर सकती हैं।

1. घर की अलमारी के दरवाजे कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं खुलने चाहिए. जिन अलमारियों के दरवाजे दक्षिण दिशा की ओर खुलते हैं वो पैसो के मामले में हमेशा खाली ही रहती हैं।

2. अलमारी को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए. उसके नीचे लकड़ी के पटिए या स्टैंड लगा देना चाहिए।
चाहे तो अलमारी के नीचे पेपर, पन्नी या कपड़ा भी बिछा सकते हैं।

3. घर के उत्तर- पूर्वी कोने में भूलकर भी अलमारी ना रखे. इस कोने में अलमारी रखना अशुभ माना जाता हैं।

4. घर के दक्षिण पश्चिम का कोना या सिर्फ पश्चिम दिशा में अलमारी को रखना शुभ होता हैं. इस जगह रखी गई अलमारी में कभी भी धन की कमी नहीं होती हैं।

5. अलमारी के अन्दर बनी तिजोरी को कभी खाली ना रखे. इसके अन्दर कुछ ना कुछ पैसे और गहने अवश्य रखे. इस तरह घर में बढ़ोत्तरी होती रहती हैं।

6. अलमारी के अन्दर गणेश जी और लक्ष्मी जी की तस्वीर जरूर रखे. इसे आप अलमारी के अंदरूनी या बाहरी हिस्से में चिपका सकते हैं. ऐसा करने से अलमारी के अन्दर धन की वृद्धि होती हैं।

7. अलमारी के अन्दर 5 या 7 चांदी के सिक्के जरूर रखे. ऐसा करने से घर में अचानक धन लाभ के आसार बढ़ जाते हैं।

8. घर के अन्दर रखी अलमारी का रंग क्रीम या हल्का पीला होना चाहिए. भूलकर भी घर में हरे या लाल रंग की अलमारी ना रखे।

9. घर के दक्षिण पश्चिम कोने या पश्चिम दिशा में अलमारी रखने से पहले उस स्थान पर यानी अलमारी के ठीक नीचे स्वस्तिक का निशान बना दे. एक स्वस्तिक का चिह्न आप अलमारी के ऊपर भी बना सकते हैं. ऐसा करने से घर में धन चोरी होने का खतरा टल जाता हैं।

10. अलमारी के उपर धूल की परत ना जमने दे. इसकी साफ़ सफाई का ध्यान रखे,तभी लक्ष्मी इसके अन्दर आएगी।

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Thursday, June 13, 2019

माँ कात्यायनी देवी ma katyayani devi

आजकल कन्या के विवाह की समस्या प्रायः प्रत्येक गृहस्थ के समक्ष उपस्थित होती है।इसके लिए माता-पिता को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
शास्त्रों में वर्णित 'कात्यायनी देवी' का अनुष्ठान बड़ा ही अनुभूत व सिद्धिप्रद है।जनसाधारण की जानकारी व जनहित में इस मंत्र के अनुष्ठान की विधि दी जा रही है।इसके नियम व श्रद्धा पूर्वक करने या कराने से कन्या के विवाह में आने वाले विघ्न दूर होते हैं व विवाह सकुशल सम्पन्न हो जाता है।

                            माँ कात्यायनी

"चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलावरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानव घातिनी॥"

श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है। इनकी आराधना से भक्त का हर काम सरल एवं सुगम होता है।

इनकी चार भुजाओं मैं अस्त्र शस्त्र और कमल का पुष्प है । इनका वाहन सिंह है।
ये बृजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, गोपियों ने कृष्ण की प्राप्ति के लिए इनकी पूजा की थी। विवाह सम्बन्धी मामलों के लिए इनकी पूजा अचूक होती है , योग्य और मनचाहा पति इनकी कृपा से प्राप्त होता है।
इनकी पूजा से इन मनोकामनाओं की पूर्ति होती है?
कन्याओं के शीघ्र विवाह के लिए इनकी पूजा अद्भुत मानी जाती है
मनचाहे विवाह और प्रेम विवाह के लिए भी इनकी उपासना की जाती है
वैवाहिक जीवन के लिए भी इनकी पूजा फलदायी होती है
अगर कुंडली में विवाह के योग क्षीण हों तो भी विवाह हो जाता है
महिलाओं के विवाह से सम्बन्ध होने के कारण इनका भी सम्बन्ध बृहस्पति से है
दाम्पत्य जीवन से सम्बन्ध होने के कारण इनका आंशिक सम्बन्ध शुक्र से भी है
शुक्र और बृहस्पति , दोनों देवत्व प्राप्त तेजस्वी ग्रह हैं , इसलिए माता का तेज भी अद्भुत और सम्पूर्ण है
माता का सम्बन्ध कृष्ण और उनकी गोपिकाओं से रहा है , और ये बृज मंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं।

विवाह के बाद भी वैवाहिक जीवन में समस्या कई कारणों से हो सकती है ,
Even after marriage, there can be a problem in marital life for many reasons,
जैसे –
गुण मिलान किये बगैर विवाह करना
मांगलिक दोष का निवारण किये बिना विवाह करना
सप्तमेश की स्थिति कुंडली में ख़राब हो और उसका निदान ना करना
सप्तम भाव में शनि , राहू जैसे क्रूर ग्रह या किसी शुभ ग्रह का पाप भाव में होकर बैठना इत्यादि
यदि आपकी शादी में आ रही देरी, या रिश्ते टूट जाना
विवाह के बाद की समस्याएं, पति-पत्नी के रिश्ते में समस्या के कारण वैवाहिक जीवन यदि सुखमय नहीं है तो जीवन अत्यंत ही कठिन हो जाता है , इससे केवल पति – पत्नी ही परेशान नहीं होते बल्कि उनका पूरा परिवार इस समस्या से प्रभावित हो जाता है ।
कई बार देखा जाता है कि कुंडली में एक से अधिक दोष उपस्थित हैं तो ऐसे में एक ही प्रश्न सामने आता है कि क्या समाधान किया जाए?
यदि विवाह से पूर्व दोष की जानकारी हो जाये तो जिस ग्रह के कारण समस्या उत्पन्न हो उसकी शांति कराना पर्याप्त होता है , परन्तु यदि विवाह हो चुका है या एक से अधिक कारण हों तो माँ कात्यायनी का अनुष्ठान , विवाह बाधा को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है।

माँ कात्यायनी का अनुष्ठान कब प्रारम्भ करें?
When to start the Mother Katyayani ritual

माँ कात्यायनी का अनुष्ठान किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर नवमी तिथि के बीच प्रारम्भ किया जा सकता है इसके अलावा प्रत्येक षष्ठी तिथि व शुक्रवार के दिन से भी अनुष्ठान प्रारंभ कर सकते हैं तथा नवरात्र का समय भी उत्तम होता है ।

शीघ्र विवाह के लिए करें माँ कात्यायनी की पूजा/अनुष्ठान?
Do the worship / ritual of Mother Katyayani for prompt marriage?

जिसे यह अनुष्ठान संपन्न करना है उसे पीला या लाल रंग का वस्त्र पहनकर 21 दिन अर्थात् जपकाल तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
यह जप केले के सूखे पत्ते की आसनी पर बैठ कर कमलगट्टे की माला से किया जाता है।जप के मध्य में सरसों के तेल का दीपक जलते रहना चाहिए।
गोधूलि वेला के समय यानी जब सूर्यास्त हो रहा हो, तब इनकी पूजा करना सबसे अच्छा होता है
इस मंत्र का जप जपकर्ता को पान खाते हुए करना चाहिए।
इस जप का पुरश्चरण 41000 है।प्रथम दिन 1000 जाप करें व उसके बाद 20 दिनों तक प्रतिदिन 2000 मंत्र का जाप करें।
जपकाल में प्रतिदिन केले के पेड़ का पूजन पञ्चोपचार विधि से करें।साथ ही गाय के साथ में वंशी बजाते हुए भगवान श्री कृष्ण के चित्र का भी पूजन करें।
पूजन और भोग  में पीली वस्तुओं का प्रयोग  करना चाहिए।यथा-पीला चन्दन, पीला चावल, पीला फूल,पीली मिठाई आदि।
इसके बाद 3 गाँठ हल्दी की भी चढ़ाएं
माँ कात्यायनी के मन्त्र का जाप करें

माँ कात्यायनी मन्त्र Maa Katyayani Mantra

"कात्यायनी महामाये , महायोगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।"

अनुष्ठान सम्पन्न होने पर हल्दी की गांठों को अपने पास सुरक्षित रख लें
माँ कात्यायनी को चांदी या मिटटी के पात्र में शहद अर्पित करें,इससे आपका प्रभाव बढेगा और आकर्षण क्षमता में वृद्धि होगी
अनुष्ठान के अन्त में दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए।भोजन में पीली वस्तुओं का प्रयोग करें।

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