Sunday, February 17, 2019

वास्तु के अनुसार सीढ़ियों का निर्माणConstruction of stairs according to Vastu

 वास्तु के अनुसार सीढ़ियों का निर्माण

Construction of stairs according to Vastu



गृह निर्माण के समय यदि सीढ़ियों को बनाते समय कुछ वास्तु सम्मत  बातों का ध्यान रखा जाए तो यही सीढ़ियां न केवल भवन की सुंदरता में चार चाँद लगाती हैं बल्कि हमे समृद्ध भी बनाती हैं।

1.सीढ़ियों का निर्माण भवन के दक्षिण या पश्चिम भाग में करना उत्तम रहता है।

2.सीढ़ियों का घुमाव दक्षिणावर्ती होना चाहिए।

3.सीढ़ियों के सामने कोई बन्द दरवाजा नहीं होना चाहिए।

4.सीढ़ियों के नीचे शौचालय कदापि नहीं होना चाहिए।

5.सीढ़ियां विषम संख्या में बनवानी चाहिए। 

6. सीढ़ी चढ़ते समय चेहरा या तो उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए।

7. सीढ़ी हमेशा दक्षिणावर्त दिशा में होनी चाहिए।

8. सीढ़ी के नीचे कोई कमरा नहीं बनाना चाहिए।

9. सीढ़ियों की नीचे और उपर द्वार रखना चाहिए। नीचे वाले दरवाजे से उपर वाला दरवाजा 12 भाग कम होना चाहिए।

10. यदि किसी मकान में सीढ़ियां पूर्व या उत्तर दिशा में बनी हों तो, उसके वास्तुदोष को कम करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कक्ष बनवाना देना चाहिए।

11.सीढ़ियों के नीचे किसी भी प्रकार का कबाड़, जूता-चप्पल आदि रखना परिवार के मुखिया के लिए अशुभकारी होता है।

12.वास्तुशास्त्र के नियम के अनुसार सीढ़ियों का निर्माण उत्तर से दक्षिण की ओर अथवा पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर करवाना चाहिए। जो लोग पूर्व दिशा की ओर से सीढ़ी बनवा रहे हों उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ी पूर्व दिशा की दीवार से लगी हुई नहीं हो। पूर्वी दीवार से सीढ़ी की दूरी कम से कम 3 इंच होने पर घर वास्तुदोष से मुक्त होता है।

13.सीढ़ी के लिए नैऋत्य यानी दक्षिण दिशा उत्तम होती है। इस दिशा में सीढ़ी होने पर घर प्रगति की ओर अग्रसर रहता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में सीढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए।

14. मकान की सीढ़ियां पूर्व से पश्चिम या उतर से दक्षिण की ओर जाने वाली होनी चाहिए। इस बात का ध्यान रखें सीढ़ियां जब पहली मंजिल की ओर निकलती हों तो हमारा मुख उतर-पश्चिम या दक्षिण-पूर्व में होना चाहिए।

15.सीढ़ियों के लिए भवन के पश्चिम, दक्षिण या र्नैत्य का क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त होता है। नैत्य कोण या दक्षिण-पश्चिम का हिस्सा सीढ़ियां बनाने के लिए अत्यंत शुभ एवं कल्याणकारी होता है।

16. सीढ़ियां कभी भी उतरी या पूर्वी दीवार से जुड़ी हुई नहीं होनी चाहिए। उतरी या पूर्वी दीवार एवं सीढ़ियों के बीच कम से कम 3’’ (तीन इंच) की दूरी अवश्य होनी चाहिए।

17. घर के उतर-पूर्व या ईशान कोण में सीढ़ियों का निर्माण कभी नहीं करवाना चाहिए। इस क्षेत्र में सीढ़ियां बनवाने से आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। व्यवसाय मंे नुकसान एवं स्वास्थ्य की हानि भी होती है तथा गृह स्वामी के दिवालिया होने की संभावना भी निरंतर बनी रहती है। घर के आग्नेय कोण अर्थात् दक्षिण-पूर्व में सीढ़ियां बनवाने से संतान के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

18.सीढ़ियां यदि गोलाई में या घुमावदार बनवानी हों तो घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उतर तथा उतर से पूर्व दिशा में होना चाहिए। यदि घर के ऊपर का हिस्सा किराये पर देना हो और स्वयं मकान मालिक को नीचे रहना हो तो ऐसी स्थिति में ऊपर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां कभी भी घर के सामने नहीं बनवानी चाहिए। ऐसी स्थिति में किरायेदार को आर्थिक लाभ होता है तथा मकान मालिक को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है। सीढ़ियों के आरंभ एवं अंत द्वार अवश्य बनवाना चाहिए।

19.सीढ़ियों का द्वारा पूर्ण अथवा दक्षिण दिशा में ही होना चाहिए। एक सीढ़ी दूसरी सीढ़ी के मध्य लगभग 9’’ का अंतर होना चाहिए।

20. सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग लगी होनी चाहिए।

21. सीढ़ियों का प्रारंभ त्रिकोणात्मक रूप में नहीं करना चाहिए।

22. अक्सर लोग सीढ़ियों के नीचे जूते, चप्पल रखने की रैक या अलमारी बनवा देते हैं। यह सर्वथा अनुचित है। सीढ़ियों के नीचे का स्थान हमेशा खुला रहना चाहिए। इससे घर के बच्चों को उच्च शिक्षा ग्रहण करने में सहायता मिलती है।

23.सीढ़ियां संबंधी वास्तु दोषों को दूर करने के उपाय: यदि घर बनवाते समय सीढ़ियों से संबंधित कोई वास्तु दोष रह गया हो तो उस स्थान पर बारिश का पानी मिट्टी के कलश में भरकर तथा मिट्टी के ढक्कन से ढककर जमीन के नीचे दबा दें। ऐसा करने से सीढ़ियों संबंधी वास्तु दोषों का नाश होता है। यदि यह उपाय करना भी संभव न हो तो घर में प्रत्येक प्रकार के वास्तु दोषों को दूर करने के लिए घर की छत पर एक म्टिटी के बर्तन में सतनाजा तथा दूसरे बर्तन में जल भरकर पक्षियों के लिए रखें ।

24.मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही पहली सीढ़ी न दिखाई दे,यह धन हानि या गरीबी की निशानी मानी जाती है।

25. सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम होना चाहिए। या सीढ़ियों की संख्या इस प्रकार होनी चाहिए कि उसे 3 से भाग दें तो 2 शेष रहे। 
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Saturday, February 16, 2019

कूष्माण्डा kooshmaanda

                         प्राक्कथन 
श्री कूष्माण्डा चालीसा का प्रणयन संवत् २०१९ कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को पं.-श्री सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय 'संत'द्वारा हुआ.
यह वही समय है जब विश्व पर अष्टग्रही योग का प्रभाव व्याप्त था और भारत पर चीन का आक्रमण हुआ था.उस समय ये परास्नातक (हिन्दी) के विद्यार्थी थे.ये बचपन से ही शान्त एवं अध्यात्मिक विचारधारा के व्यक्ति रहे हैं.
उस समय तीन वर्ष घाटमपुर में प्रवास करने के दौरान माँ कूड़हा (कूष्माण्डा) देवी के प्रति लगन एवं उनके आशीर्वाद से इनके ह्रदय में ऐसी प्रेरणा हुई कि अपने कृतित्व द्वारा माँ के चरणों में कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित किये जायें.
इसी सन्दर्भ में माँ की चालीसा की रचना का विचार उत्पन्न हुआ,उस समय अपने जेब खर्च से इन्होंने इसकी रचना कर एक हजार प्रतियाँ छपवा कर वितरित की,इस क्रम से आज तक इसकी रचना का प्रसाद भक्तों में वितरित होता रहा.
उम्र के अनुभव और अंतर्मन की प्रेरणा से जीवन के उत्तरार्ध में इन्हें पुनः यह विचार आया कि इस रचना को वह पुनः प्रसाद रूप में वितरित करे,किन्तु आज की प्रति में संशोधन एवं कुछ और प्रकरण जो मूल प्रति में थे परन्तु बाद के संस्करणों में उनका अभाव देखा गया,इसलिये रचयिता द्वारा अन्य प्रतियो में छोड़े गये अंशो को पुनः प्रकाशित करना आवश्यक समझा गया साथ ही इसमें कूष्माण्डा पंचामृत,शिव शतनाम को जोड़ा गया है.
इस प्रकार यह संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण पुनः आपके सम्मुख माँ के प्रसाद के रूप में प्रस्तुत है.
                                                                                                                            -:निवेदक:-
                                                                                                                 विजय कुमार शुक्ल (आचार्य)
                                                                                                                  कानपुर (उत्तर प्रदेश )
                                                                                                                  मो_9936816114
                                                                                                                  vijay.shukla003@gmail.com


                           कूष्माण्डा महात्म्य 

 या देवी  सर्व भूतेषु  मात्र रूपेण संस्थिता.
                       नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः.
 सुरा  सम्पूर्ण  कलशं  रूधिराप्लुतमेव  च .
                दधाना हस्त पद्माभ्याम कूष्माण्डा शुभदास्तुमे.


माँ भगवती दुर्गा के चौथे स्वरुप का नाम कूष्माण्डा हैं.अपनी मंद हल्की हँसी द्वारा अंड अर्थात ब्रम्हाण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है.
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था चारो ओर अन्धकार ही अन्धकार परिव्याप्त था  तब इन्ही देवी ने अपने ईषत हास्य से ब्रम्हाण्ड की रचना की थी.अतः यही सृष्टि की आदि स्वरूपा शक्ति है.
इनका निवास सूर्य मण्डल के भीतर के लोक में है सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्ही में है,इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही देदीप्यमान और भास्वर है,इनके तेज की तुलना इन्ही से की जा सकती है.
इनकी आठ भुजायें है,अतः यह अष्टभुजी देवी के नाम से भी विख्यात है,इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु,धनुष,बाण,कमल-पूष्प,अमृत पूर्ण कलश,चक्र,तथा गदा है आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है,इनका वाहन सिंह है,बलियों में इन्हें कुम्हड़े की बलि सर्वाधिक प्रिय है इसलिये भी इन्हें कूष्माण्डा कहा जाता है.
नवरात्र पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरुप की पूजा की जाती है,इस दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' में अवस्थित होता है,इनकी भक्ति से आयु,यश,बल,और आरोग्य की वृद्धि होकर समस्त रोग-शोक विनष्ट हो जाते है,यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से माँ के शरणागत हो जाये तो उसे अत्यन्त सुगमता से परमपद की प्राप्ति हो जाती है,अतः लौकिक,पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिये.


                  श्री कूष्माण्डा   चालीसा

                                     दोहा 

         अम्बे पद चित लाय करि विनय करहुँ कर जोरि,
         बरनऊ तव मै विशद यश करहु विमल मति मोरि.
         दीन  हीन  मुझ   अधम   को  आप  उबारो आय,
         तुम   मेरी    मनकामना    पूर्ण   करो   सरसाय.
                                                                                                                  चौपाई

                                जय जय जय कुड़हा महरानी,           त्रिविध ताप नाशक तिमुहानी. १.
                                  आदि शक्ति अम्बिके  भवानी,            तुम्हरी महिमा अकथ कहानी .२.
                                  रवि सम तेज तपै चहुँ  ओरा,              करहु कृपा जनि होंहि निहोरा .३.
                                  धवल धाम मंह वास तुम्हारो,              सब मंह सुन्दर लागत न्यारो .४.
                                  तिनकै रचना बरनि न जाई,                 सुन्दरता लखि मन ठग जाई.५.
                                  सोहत  इहां  चारि दरवाजा,              विविध भॉंति चित्रित छवि छाजा.६.
                                 चवँर घंट बहु भॉंति विराजहिं,           मठ पर ध्वजा अलौकिक लागहिं.७.
                                  शीश मुकुट अरु कानन कुण्डल,              अरुण बदन से प्रगटै तव बल.८.
                                  रूप   अठ्भुजी   अद्भुत  सोहे,                     होय  सुखी  जो  मन से जोहै.९.
                                  तन पर शुभ्र वसन हैं राजत,                     कर कंकन पद नूपुर छाजत.१०.
                                  विविध भॉंति मन्दिर चहुँ ओरा,                   चूमत गगन हवै सब ओरा.११.
                                  शंकर महावीर  को  वासा,                       औरहु  सुर  सुख पावहिं पासा.१२.
                                  सरवर सुन्दर जहाँ सुहाई,                       तेहि कै महिमा बरनि न जाई.१३.
                                  घाट  मनोहर  सुन्दर  सोहैं,                           पडत दृष्टि तुरतै मन मोहैं.१४.  
                                  नीर मोति अस निर्मल तासू ,                      अमृत आनि कपूर सुवासू .१५.
                                 पीपल नीम आछि अमराई,                            औरहु तरुवर इहां सुहाई .१६.
                                 बहु भांतिन ध्यावैं नर नारी,                    मन वांछित फल पावहिं चारी.१७.
                                 तुम्हरो ध्यान करहिं जे प्रानी,                     होहिं मुक्त रहि जाइ कहानी.१८.
                                 जोगी जती ध्यान जो लावें,                          तुरतै सिद्ध पुरुष होई जावै.१९.
                                 नेत्र हीन तव आवहिं पासा,                          पूजा करहिं होइ तम नासा.२०.
                                  दिव्य दृष्टि तिनकै होइ जाई,                        होहिं सुखी जब होउ सहाई.२१.
                                  पुत्रहीन  कहुं  ध्यान  लगावै,                         तुरतै  पुत्रवान  होइ  जावै.२२.
                                  रंक आइ सब नावहिं माथा,                     पावहिं धन अरु होंहिं सनाथा.२३.
                                  नाम लेत दुःख दरिद नसाहीं,                   अक्षत से अरिगन हटी जाहीं.२४.
                                 नित प्रति आइ करहिं जो दर्शन,             मनवांछित फल पावै सो जन.२५.
                                 जो सरवर मंह मज्जन करहीं,                 कलुष  नसाइ  जात  हैं सबहीं.२६.
                                 जो जन मन से ध्यावहिं तुमही,               सब विपत्ति से छूटहिं  तबहीं.२७.
                                 सोम  शुक्र  दिन  आवहिं प्रानी,                    पूजा करहिं प्रेम रस सानी.२८.
                                 कार्तिक माह पूर्णिमा आवत,                  तेहि दिन मेला सुन्दर लागत.२९.
                                 लेत नाम भव भय मिटि जाई,                        भूत प्रेत सब भजै पराई.३०.
                                पूजा जो जन मन से करहीं,                       होहिं सुखी मुद मंगल भरहीं.३१.
                                दूर  दूर  से  आवहिं  प्रानी,                      करहिं सुदर्शन मन सुख मानी.३२.
                                तुम्हरी कीर्ति रही जग छाई,                     तेहिते सब जन आवत भाई.३३.
                                दरश परश कर मन हरषाहीं,                 जग दुर्लभ तिनकहु कछु नाहीं.३४.
                                जो ध्यावें पद मातु तुम्हारे,                   भव बन्धन मिटि जाइ सकारे.३५.
                                बालक प्रमुदित करहिं जो ध्याना,           आइ करहिं बहु विनती नाना.३६.
                                तिन कहँ अवसि सफलता देहू,                    बुद्धि बढ़ाइ सुखी करि देहू.३७.
                                आवहिं नर अरु नावहिं शीशा,                    होहिं सुखी पावहिं आशीषा.३८.
                                जो यह पाठ करै मन लाई,                           अम्बे ता कहूँ होहिं सहाई.३९.
                               'सन्त' सदा चरनन तव दासा,                 आय करहु मम ह्रदय निवासा.४०.
                                                                                                              दोहा


         मातु तुम्हारी भक्ति से सुख उपजै मन माहि.
         करहु कृपा हम दीन पर आयहु चरनन माहि..
         मंगलमय तुम मातु हो    सदा करहु कल्यान.
          गावहिं सुनहिं जे प्रेम से पावहिं सुन्दर ज्ञान..



                   कूष्माण्डा पञ्चामृत
जग के जंजाल माहि जकड़े हुये को मातु,
आप ही छुडाय कर दुःख दूर करती हो .
संतन की रक्षा हित धरती हो रौद्र रूप,
दुष्टों का विनाश कर शान्ति बसा देती हो.
सिंह पै सवार हो कंपाती दल असुरन के,
भक्तों के ह्रदयों में मोद सुधा भरती हो.
करती हो सभी का कुशल मातु जगदम्बा तुम,
नाम की महिमा मातु कुशला बता देती हो ..१..
असहायों अनाथों का सहारा हो मातु तुम,
गिरे हुये जनमन को तुम ऊपर उठा देती हो.
करती हो पूर्ण तुम मनोरथ सभी के मातु,
जीवन की कटुता में मृदुता भर देती हो .
आता जो भी है शरण तुम्हारी माँ,
उसको निज गोद में तुरत उठा लेती हो.
देती हो मनः शान्ति दुःख से उबार कर,
उसके फिर मन में आनन्द बसा देती हो..२..
तुमने ही बड़े-बड़े दुष्टों को संहारा मातु,
किसने नहीं जानी तुम्हारी यह महिमा है.
गूँज रही त्रिभुवन में तुम्हारी गुण गाथा एक,
उसके समान 'सन्त' किसकी और महिमा है.
तुम नहीं होती यदि मातु जगदम्बा तो,
शव समान शिव की न होती यह महिमा है.
जग की हो आदि अन्त मातु कूष्माण्डा जी,
पाता न कोई नर तुम्हारी शक्ति सीमा है..३..
तुम हो निष्शीम और अक्षय जगदम्बिके,
पुत्र वत्सलता की रखती एक सानी हो.
आँख भी उठाता यदि कोई दुष्ट नीच व्यक्ति,
एक ही बार में बनाती काल की कहानी हो.
देखा सुना हमने भी अरियों को जलते हुए,
कोई न बचा जिसने तुमसे रांर ठानी हो.
करती हो चूर्ण अभिमान अहंकारी का,
पाखण्डी के पाप की मिटाती निशानी हो..४..
मधु और कैटभ का किया है मान-मर्दन भी,
महिषासुर की कुमहिमा की मिटाई निशानी है.
सेनापति धूम्रलोचन का किया है अन्त आपने ही,
चन्ड-मुन्ड के जीवन की अन्त की कहानी है.
रक्त-बीज वंशजों को किया है काल-कवलित,
शुम्भ और निशुम्भ बध माँ की मनमानी है.
माँ का बल विक्रम-पराक्रम देख देवों नें,
बार-बार वाणी से माँ की महिमा बखानी है..५..


                          शिव शतनाम  

जय महादेव शिव शंकर शम्भो उमाकान्त त्रिपुरारी,
चंद्रमौलि गंगाधर सोमेश्वर भूतनाथ कामारी ..१..

हर-हर शूलपाणि गिरिजापति बाघाम्बर धारी,
पंचानन कालेश्वर नागेश्वर आशुतोष प्रलयंकारी..२..

तीननेत्र भुजगेन्द्र्हार कर्पूरगौर करुणावतार,
केदारनाथ देवाधिदेव गिरिईश रूद्र संसार सार..३..

घुष्मेश जटाधर विश्वरूप श्री विरूपाक्ष श्री शिवाधार,
सर्वशक्ति श्मशानवास पशुपति भोला तन लसित छार..४..

नीलकंठ वृषकेतु महेश्वर विश्वनाथ अवढर दानी,
कैलाशनाथ डमरूधर गौरी पति गुणातीत गुणखानी..५..

वेधषे दिगम्बर वेदगीत गोपत कपोत मंगलदानी,
लिंगरूप परमार्थरूप अव्यय त्रिदेव सर्वज्ञानी ..६..

लालाबन्ध सरूप सिंह अज्ञात ज्ञात विज्ञानी,
लोहित नील व्याघ्र गर्वकित श्री सुरेश परमात्म बखानी..७..

भीमशंकर मल्लिकार्जुन हे कपर्दिन मुण्डमाली,
सिद्धिदा परमेष्टिने हे महीधर मरीचिमाली..८..

हे व्यालप्रिय मृत्युंजयी हे दीर्घरूप हे दीर्घनाम,
हे बुद्धिनाथ हे जगत्पिता हे व्योमकेश करते प्रणाम..९..

रंगदेव रामेश्वर जागेश्वर हे अजगव धारी,
त्र्यम्बक प्रभाव हे अर्थरूप श्री महेश प्रतिवास बिहारी..१०..

हे चन्द्रचूड शशि-शेखर नन्दीश्वर अवलेश्वर ललाम,
हे तपोरूप दुर्गा दुर्गेश्वर करते चरणों में शत-शत प्रणाम..११..

                            शान्ति पाठ

जै जै अम्बे जय जगदम्बे        जय कुशले कल्याण करो,
जय कूष्माण्डा जय कल्याणी        सदबुद्धि का दान करो.
उग्रवाद  आतंकवाद  का       माँ  समूल  तुम नाश करो ,
पुत्र  पुकारें  जय  जगदम्बे      जग का माँ उत्थान करो.
नैतिकता  का  पाठ  पढ़ाकर     माँ  चरित्र निर्माण करो,
साहस शील शिष्टता संयम से      मानव का उत्थान करो.
दैहिकादि त्रिविध तापों से  माँ    जग का तुम उद्धार करो,
शान्ति-शान्ति माँ शान्त रूप से जग को शान्ति प्रदान करो..

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● जानें- कब होती है कुष्मांडा देवी की पूजा, क्या है पूजा विधि? Know- When is the worship of Kushmanda Devi, what is the worship method?
 

Tuesday, February 12, 2019

कमर दर्द के उपाय Waist Pain Remedies

                    कमर दर्द

आजकल शरीर में दर्द की समस्या बढ़ती जा रही है,इसमें एक है कमरदर्द।
यह समस्या आम हो गई है। सिर्फ बड़ी उम्र के लोग ही नहीं बल्कि युवा भी कमर दर्द की शिकायत करते रहते हैं। इसकी मुख्य वजह खानपान का ध्यान नहीं रखना,अनियमित जीवनशैली और शारीरिक श्रम न करना है।

अधिकतर लोगों को कमर के मध्य या निचले भाग में दर्द महसूस होता है। यह दर्द कमर के दोनों और तथा कूल्हों तक भी फ़ैल सकता है। बढ़ती उम्र के साथ कमर दर्द की समस्या बढ़ती जाती है।
कुछ आदतों को बदलकर इससे काफी हद तक बचा जा सकता है। साथ ही कुछ घरेलू नुस्खों को अपनाकर आप कमर दर्द से छुटकारा पा सकते हैं।

कमर दर्द के कुछ मुख्य कारण हैं।
There are some main causes of back pain.
जैसे:-

मांसपेशियों पर अत्यधिक तनाव।
Excessive stress on the muscles

अधिक वजन।Overweight

गलत तरीके से बैठना।
Sit in the wrong way

हमेशा ऊंची एड़ी के जूते या सेंडिल पहनना।
Always wear high heels or sandals.

गलत तरीके से अधिक वजन उठाना।
Wrong weight lifting

शरीर में लम्बे समय से बीमारियों का होना।
Disease in the body for a long time

अधिक नर्म गद्दों पर सोना।
Gold on more soft mattresses.

 कमर दर्द से बचने के घरेलू उपाय
Home remedies to avoid back pain

1. रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल  गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।

2. नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।

3. कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।

4. अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है।

5. अधिक देर तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम न करें। हर चालीस मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहल लें।

6. नर्म गद्देदार सीटों से परहेज करना चाहिए। कमर दर्द के रोगियों को थोड़ा सख्ते बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए।

7. योग भी कमर दर्द में लाभ पहुंचाता है। भुन्ज्गासन, शलभासन, हलासन, उत्तानपादासन, आदि कुछ ऐसे योगासन हैं जो की कमर दर्द में काफी लाभ पहुंचाते हैं। कमर दर्द के योगासनों को योगगुरु की देख रेख में ही करने चाहिए।

8. कैल्शियम की कम मात्रा से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, इसलिए कैल्शियमयुक्त चीजों का सेवन करें।

9. कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।

10. कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं|

11. कार चलाते वक्त सीट सख्त होनी चाहिए, बैठने का पोश्चर भी सही रखें और कार ड्राइव करते समय सीट बेल्ट टाइट कर लें।

12. ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता है।
साभार:-

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Monday, February 11, 2019

जानें- कब होती है कुष्मांडा देवी की पूजा, क्या है पूजा विधि? Know- When is the worship of Kushmanda Devi, what is the worship method?


माँ कूष्माण्डा देवी  भगवती दुर्गा का चौथा स्वरुप हैं।अपनी हल्की हंसी के द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा हुआ। ये अनाहत चक्र को नियंत्रित करती हैं।
मां की आठ भुजाएं हैं।
अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं. संस्कृत भाषा में कुष्मांडा  को कुम्हड़ कहते हैं और इन्हें कुम्हड़ा विशेष रूप से प्रिय है. ज्योतिष में इनका सम्बन्ध बुध नामक ग्रह से है।

जानें- कब होती है कूष्माण्डा देवी की पूजा, क्या है पूजा विधि?


Know- When is the worship of Kushmanda Devi, what is the worship method?

नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के 9 रूपों की पूजा की जाती है।ये माँ का चौथा रूप है अतः चौथे दिन नवरात्रि में इनका पूजन होता है।

क्या है देवी कूष्माण्डा की पूजा विधि?

What is Goddess Kushmanda worship method?

- हरे वस्त्र धारण करके मां कूष्माण्डा का पूजन करें।
- पूजा के दौरान मां को हरी इलाइची, सौंफ,या कुम्हड़ा अर्पित करें।
- इसके बाद उनके मुख्य मंत्र "ॐ कूष्माण्डा देव्यै नमः" का 108 बार जाप करें।
- सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें।

बुध को मजबूत करने के लिए  करें मां कूष्माण्डा की पूजा?

To strengthen Mercury, worship of Mother Kushmanda?

- मां कूष्माण्डा को  अपने उम्र के वर्षों की सँख्या के अनुसार हरी इलायची अर्पित करें।
- हर इलाइची अर्पित करने के साथ "ॐ बुं बुधाय नमः" और "ॐ कूष्माण्डाय नमः" कहें।
- सारी इलाइचियों को एकत्र करके हरे कपड़े में बांधकर रख लें।
- इन्हें अपने पास अगली नवरात्रि तक सुरक्षित रखें।
-पुनः अगले नवरात्रि में यही क्रिया करें, और पुरानी इलायची को किसी को दान कर दें।

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जाने राशि के अनुसार क्या खरीदें धनतेरस पर According to the amount of money to buy on Dhanteras

जाने राशि के अनुसार क्या खरीदें धनतेरस पर
According to the amount of money to buy on Dhanteras


हमारे मुख्य त्यौहार दीपावली की शुरुआत धनतेरस से होती है।
धनतेरस के दिन हर कोई माँ लक्ष्मी, गणेश और धन के देवता कुबेरऔर धन्वन्तरि की पुजा करता है। यह मान्यता है कि इस दिन हर व्यक्ति को कुछ न कुछ जरूर खरीदना चाहिए क्योंकि इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है,और उनकी कृपा वर्ष भर हमें प्राप्त होती है।
ऐसे में हम अन्य वस्तुओं की खरीदारी अपनी राशि के अनुसार करें तो यह पूरे वर्ष शुभ-मङ्गल कारी होता है।


● मेष राशि के जातकों को धनतेरस के दिन पीतल के बर्तन खरीदने चाहिए।


● वृष राशि के जातकों के लिए धनतेरस के दिन चांदी का कलश या अपने जीवन साथी के लिए सोने की अंगूठी या सोने की कोई वस्तु खरीदना शुभ माना जाता है।


● मिथुन राशि के जातकों के लिए धनतेरस के दिन सफेद धातु का श्रीयंत्र या गणेश जी खरीदना काफी शुभ माना जाता है।


● कर्क राशि के जातकों के लिए धनतेरस के दिन पारद का शिवलिंग खरीदना काफी शुभ माना जाता है।


● सिंह राशि के जातकों के लिए धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मी या विष्णु जी की मूर्ति खरीदना काफी शुभ माना जाता है।


● कन्या राशि के जातकों को धनतेरस के दिन चांदी के लक्ष्मी गणेश जी अथवा सोने के श्रीयंत्र खरीदने चाहिए।


● तुला राशि के जातकों के लिए धनतेरस के दिन चांदी का श्रीयंत्र या शंख खरीदना काफी शुभ माना जाता है।


● वृश्चिक राशि के जातकों के लिए धनतेरस के दिन तांबे की कलश खरीदना काफी शुभ माना जाता है।


● धनु राशि के जातकों को पीली धातु में या मूंगे का सामान लेना काफी ज्यादा शुभ रहेगा।


● मकर राशि के जातकों को धनतेरस के दिन बेडरूम के लिए सफेद धातु में मेज इत्यादि चीजें खरीदनी चाहिए।


● कुंभ राशि के जातकों को धनतेरस के दिन अपने घर के पूजा घर के लिए सफेद धातु या चांदी का दीप खरीदना चाहिए।


● मीन राशि के जातकों को धनतेरस के दिन सफेद धातु या चांदी का पिरामिड और गणेश, सरस्‍वती की प्रतिमा और तांबे का कलश खरीदना चाहिए।


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