श्रीमद्भागवत पूजन विधि
Shrimadbhagwat pujan vidhi
सप्ताह-यज्ञ एवं श्रीमद्भागवत महापुराण मूल पारायण/कथा के लिए पारंपरिक पूजन-विधान
भूमिका
भागवत पुराण अट्ठारह पुराणों में से एक है। इसे श्रीमद्भागवतम् अथवा भागवतम् भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत भक्तिरस तथा अध्यात्मज्ञान का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। इसे निगमकल्पतरु का स्वयं फल तथा सर्व वेदान्त का सार कहा गया है। उस रसामृत का पान करके जो तृप्त हो गया है, उसे अन्य किसी विषय में वैसा आनन्द प्राप्त नहीं होता।
श्रीमद्भागवत में भगवान् श्रीकृष्ण को सभी देवताओं के देव तथा स्वयं भगवान् के रूप में प्रतिपादित किया गया है। इसके साथ ही इसमें रसभावमयी भक्ति का भी विशद निरूपण मिलता है। परंपरागत रूप से इस पुराण के रचयिता महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं।
श्रीमद्भागवत सप्ताह-यज्ञ में केवल कथा-श्रवण ही नहीं, बल्कि भगवान्, भागवत-ग्रन्थ, व्यास, वक्ता, नारद तथा कथा से सम्बद्ध देवताओं का विधिपूर्वक पूजन भी किया जाता है। इसका पारंपरिक पूजन-विधान निम्न प्रकार है।
१. कथा प्रारम्भ से पूर्व की तैयारी
वक्ता को प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व स्नान आदि करके संक्षेप में सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म पूर्ण कर लेना चाहिए। कथा में कोई विघ्न न आए, इसके लिए नित्यप्रति गणेशजी का पूजन करना चाहिए।
सप्ताह के प्रथम दिन यजमान स्नान आदि से शुद्ध होकर नित्यकर्म पूरा करे और आभ्युदयिक श्राद्ध करे। आभ्युदयिक श्राद्ध पहले भी किया जा सकता है। यज्ञ में इक्कीस दिन पूर्व भी आभ्युदयिक श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।
इसके पश्चात्—
- गणेश
- ब्रह्मा आदि देवता
- नवग्रह
- षोडश मातृका
- सप्त चिरंजीवी
- कलश
- सर्वतोभद्र-मण्डल
आदि की स्थापना एवं पूजा की जाती है।
सप्त चिरंजीवी हैं—
- अश्वत्थामा
- राजा बलि
- वेदव्यास
- हनुमानजी
- विभीषण
- कृपाचार्य
- परशुरामजी
२. सर्वतोभद्र-मण्डल एवं कलश स्थापना
एक चौकी पर सर्वतोभद्र-मण्डल बनाकर उसके मध्यभाग में ताम्रकलश स्थापित करें। कलश के ऊपर भगवान् लक्ष्मी-नारायण की सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
कलश के समीप भगवान् शालिग्रामजी का सिंहासन स्थापित करें।
सर्वतोभद्र-मण्डल में स्थित समस्त देवताओं का पूजन करने के बाद निम्न देवताओं का भी आवाहन, स्थापन एवं पूजन किया जाता है—
- नर-नारायण
- गुरु
- वायु
- सरस्वती
- शेष
- सनकादि कुमार
- सांख्यायन
- पराशर
- बृहस्पति
- मैत्रेय
- उद्धव
इसके पश्चात् त्रय्यारुणि आदि छह पौराणिकों का स्थापन-पूजन करके अलग पीठ पर सुन्दर वस्त्र से आच्छादित देवर्षि नारद की स्थापना एवं पूजा करनी चाहिए।
इसके बाद—
- आधारपीठ
- श्रीमद्भागवत पुस्तक
- व्यास/वक्ता आचार्य
का यथाप्राप्त उपचारों से पूजन किया जाता है।
३. जप एवं पाठ के लिए ब्राह्मणों का वरण
कथा निर्विघ्न पूर्ण हो, इसके लिए अपनी शक्ति के अनुसार सात, पाँच अथवा तीन ब्राह्मणों का वरण किया जाता है।
इनके द्वारा—
- गणेश-मन्त्र जप
- द्वादशाक्षर-मन्त्र जप
- गायत्री-मन्त्र जप
- विष्णुसहस्रनाम पाठ
- श्रीमद्भगवद्गीता पाठ
कराया जाता है।
इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवत का एक पाठ अलग ब्राह्मण द्वारा कराने का विधान है।
४. कथामण्डप में पंचकलश स्थापना
कथामण्डप में चारों दिशाओं अथवा कोणों में एक-एक कलश और मध्यभाग में एक कलश—इस प्रकार पाँच कलश स्थापित करने चाहिए।
चारों दिशाओं के कलशों में क्रमशः—
- पूर्व — ऋग्वेद
- दक्षिण — यजुर्वेद
- पश्चिम — सामवेद
- उत्तर — अथर्ववेद
की स्थापना एवं पूजा करनी चाहिए।
एक अन्य परंपरा में मध्यभाग में केवल एक ताम्रकलश स्थापित करके उसके चारों ओर सर्वतोभद्र-मण्डल की चौकी के चारों ओर चारों वेदों की स्थापना की जाती है।
मध्य कलश के ऊपर भगवान् लक्ष्मी-नारायण की सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करके षोडशोपचार-विधि से पूजा करनी चाहिए।
५. देवपूजा का प्रारम्भिक क्रम
सबसे पहले रक्षादीप प्रज्वलित करें।
एक पात्र में घी भरकर रूई की फूलबत्ती जलाकर उसे सुरक्षित स्थान पर अक्षत के ऊपर स्थापित करें। दीप वायु आदि से बुझ न जाए, इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।
इसके बाद भगवत्सम्बन्धी स्तोत्रों एवं पदों द्वारा मङ्गलाचरण एवं वन्दना करें।
फिर—
- आचमन
- प्राणायाम
- शान्तिपाठ
- स्वस्तिवाचन
करें।
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः
व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥
इसके पश्चात् पवित्री, अक्षत, पुष्प, जल एवं द्रव्य हाथ में लेकर महासंकल्प किया जाता है।
६. श्रीमद्भागवत सप्ताह-यज्ञ का महासंकल्प
संकल्प में देश, काल, संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, गोत्र, प्रवर, यजमान का नाम तथा सप्ताह-यज्ञ का उद्देश्य आदि का उल्लेख किया जाता है।
संकल्प का मूल पाठ इस प्रकार है—
ॐ तत्सद्य श्रीमहाभगवतो विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते विष्णुप्रजापतिक्षेत्रे वैवस्वतमनुभोग्यैकसप्ततियुगचतुष्टयान्तगताष्टाविंशतितमकलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे अमुकसंवत्सरे अमुकायने अमुककर्तौ अमुकराशिस्थिते भगवति सवितरि अमुकामुकराशिस्थितेषु चान्येषु ग्रहेषु महामाङ्गल्यप्रदे मासानामुत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकमुहूर्तकरणादियुतायाम् अमुकतिथौ अमुकगोत्रे अमुकप्रवरः अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं पूर्वातीतानेक जन्मसंचिताखिल दुष्कृत निवृत्तिपुरस्सरैहिकाध्यात्मिकादि विविधताप पापापनोदार्थं दशाश्वमेधयज्ञजन्य सम्यगिष्ट-राजसूययज्ञ सहस्रपुण्यसमपुण्य चन्द्रसूर्यग्रहणकालिक बहुब्राह्मण सम्प्रदानकसर्वसस्य पूर्णसर्वरत्नोपशोभित महींदान पुण्यप्राप्तये श्रीगोविन्दचरणारविन्द युगले निरन्तरमुत्तरोत्तरमेधमाननिस्सीमप्रेमोपलब्धये तदीयपरमानन्दमयोलोकधाम्नि नित्यनिवासपूर्वकतत्परिचर्यारसास्वादनसौभाग्यसिद्धये च अमुकगोत्रामुकप्रवरामुकशर्मब्राह्मणवदनारविन्दाच्छ्रीकृष्णवाङ्मयमूर्तीभूतं श्रीमद्भागवतमष्टादशपुराण प्रकृतिभूतमनेकश्रोतृश्रवणपूर्वक ममुकदिनादारभ्यामुकदिनपर्यन्तं सप्ताहयज्ञरूपतया श्रोष्यामि प्राप्स्यमानेऽस्मिन् सप्ताहयज्ञे विघ्नपूगनिवारणपूर्वकं यज्ञरक्षाकरणार्थं गणपतिब्रह्मादिसहितनवग्रह षोडशमातृका सप्तचिरजीविपुरुष सर्वतोभद्रमण्डलस्थदेवकलशाद्यर्चनपुरस्सरं श्रीलक्ष्मीनारायणप्रतिमाशालग्राम नरनारायण गुरु वायु सरस्वती शेष सनत्कुमारसांख्यायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवत्रय्यारुणिकश्यपरामशिष्याकृतव्रणवैशम्पायनहारीतनारदपूजनमाधारपीठपुस्तकव्यासपूजनं च यथालब्धोपचारैः करिष्ये।
संकल्प के बाद पूर्वोक्त देवताओं का चित्रपट अथवा अक्षत-पुंज पर आवाहन-स्थापन करके वैदिक पूजा-पद्धति के अनुसार पूजन करें।
७. गौरी-गणेश पूजन
एक पात्र में चावल भरकर उसमें मौली से लपेटी हुई हल्दी-सुपारी रखें और उसमें गौरी-गणेश का आवाहन करें—
ॐ भूर्भुवः स्वः गौरी-गणपते इहागच्छ इह तिष्ठ मम पूजां गृहाण।
इसके बाद ‘गणानां त्वा०’ आदि मन्त्रों का पाठ तथा—
गजाननं भूतगणादिसेवितं
कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं
नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
आदि ध्यानपूर्वक पूजन करें।
प्रतिष्ठा के लिए—
ॐ मनो जूतिः०
आदि मन्त्रों का प्रयोग करें।
इसके बाद पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पंचामृत-स्नान, शुद्धोदक-स्नान, वस्त्र, रक्षासूत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, रोली, सिन्दूर, अक्षत, पुष्प, माला, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, ताम्बूल, दक्षिणा आदि उपचार अर्पित करें।
गणेश प्रार्थना
ॐ लम्बोदरं परमसुन्दरमेकदन्तं
रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम्।
उद्यद्दिवाकरकरोज्ज्वलकायकान्तं
विघ्नेश्वरं सकलविघ्नहरं नमामि॥
त्वां देव विघ्नदलनेति च सुन्दरेति
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति
तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव॥
इसके बाद—
अनया पूजया गौरी-गणपतिः प्रीयतां न मम।
कहकर पुष्पाञ्जलि दें।
८. ब्रह्मा-विष्णु-शिव सहित नवग्रह पूजन
आवाहन—
ॐ भूर्भुवः स्वः भो ब्रह्मविष्णुशिवसहितसूर्यादिनवग्रहा इहागच्छतेह तिष्ठत मम पूजां गृह्णीत।
नाम-मन्त्र—
ॐ ब्रह्मणे नमः।
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ शिवाय नमः।
ॐ सूर्याय नमः।
ॐ चन्द्रमसे नमः।
ॐ भौमाय नमः।
ॐ बुधाय नमः।
ॐ बृहस्पतये नमः।
ॐ भार्गवाय नमः।
ॐ शनैश्चराय नमः।
ॐ राहवे नमः।
ॐ केतवे नमः।
प्रार्थना
ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी
भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः
सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु॥
इसके बाद—
अनया पूजया ब्रह्मविष्णुशिवसहितसूर्यादिनवग्रहाः प्रीयन्तां न मम।
कहकर पुष्पाञ्जलि अर्पित करें।
९. षोडश मातृका पूजन
आवाहन—
ॐ भूर्भुवः स्वः भो गौर्यादिषोडशमातर इहागच्छत मम पूजां गृह्णीत।
नाम-मन्त्रों द्वारा पाद्य, अर्घ्य आदि षोडशोपचारों से षोडश मातृकाओं का पूजन करें।
१०. सप्त चिरंजीवी पूजन
आवाहन—
भो अश्वत्थामादिसप्तचिरजीविन इहागत्य मम पूजां गृह्णीत।
नाम-मन्त्र—
१. ॐ अश्वत्थाम्ने नमः।
२. ॐ बलये नमः।
३. ॐ व्यासाय नमः।
४. ॐ हनुमते नमः।
५. ॐ विभीषणाय नमः।
६. ॐ कृपाय नमः।
७. ॐ परशुरामाय नमः।
प्रार्थना
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः।
यजमानगृहे नित्यं सुखदाः सिद्धिदाः सदा॥
इसके बाद—
अनया पूजया अश्वत्थामादिसप्तचिरजीविनः प्रीयन्तां न मम।
कहकर पुष्प अर्पित करें।
११. सर्वतोभद्र-मण्डल एवं चारों वेदों की स्थापना
सर्वतोभद्र-मण्डलस्थ देवताओं का आवाहन एवं पूजन करके मध्य में ताम्रकलश स्थापित करें।
कलश के—
पूर्व भाग में ऋग्वेद
ॐ अग्निमीळे०
दक्षिण भाग में यजुर्वेद
ॐ इषे त्वोर्जत्वा०
पश्चिम भाग में सामवेद
ॐ अग्न आयाहि वीतये०
उत्तर भाग में अथर्ववेद
ॐ शन्नो देवी०
आदि मन्त्रों द्वारा स्थापना करें।
यदि पाँच कलश हों तो चारों वेदों की स्थापना पृथक्-पृथक् कलशों पर करें।
कलश में गणेश एवं वरुण का आवाहन करें—
ॐ गणानां त्वा०
तथा
ॐ तत्त्वायामि०
आदि मन्त्रों से।
इसके बाद षोडशोपचार से पूजन करें।
१२. लक्ष्मी-नारायण एवं शालिग्राम पूजन
कलश के ऊपर सुवर्णमयी लक्ष्मी-नारायण प्रतिमा का संस्कार करके स्थापना करें।
पुरुषसूक्त के षोडश मन्त्रों द्वारा षोडशोपचार से पूजन करें। साथ ही शालिग्रामजी की भी पूजा करें।
प्रार्थना
ब्रह्मसूत्रं करिष्यामि तवानुग्रहतो विभो।
तन्निर्विघ्नं भवेद्देव रमानाथ क्षमस्व मे॥
इसके बाद—
अनया पूजया लक्ष्मीसहितो भगवान्नारायणः प्रीयतां न मम।
कहकर पुष्पाञ्जलि अर्पित करें।
१३. नर-नारायण पूजन
ॐ नरनारायणाभ्यां नमः।
इस मन्त्र से भगवान् नर-नारायण का आवाहन एवं पूजन करें।
प्रार्थना
यो मायया विरचितं निजमात्मनीदं
खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय।
एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य
प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै॥
सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्
सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः।
दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन
यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम्॥
इसके बाद—
अनया पूजया भगवन्तौ नरनारायणौ प्रीयेतां न मम।
१४. वायु देवता पूजन
वक्ता एवं श्रोताओं के विकारों की निवृत्ति के लिए वायुदेवता का आवाहन एवं पूजन करें।
ॐ वायवे सर्वकल्याणकत्रे नमः।
प्रार्थना
अन्तः प्रविश्य भूतानि यो विभर्त्यात्मकेतुभिः।
अन्तर्यामीश्वरः साक्षात् पातु नो यद्वशे स्फुटम्॥
इसके बाद—
अनया पूजया सर्वकल्याणकर्ता वायुः प्रीयतां न मम।
१५. गुरु पूजन
ॐ गुरवे नमः।
प्रार्थना
ब्रह्मस्थानसरोजमध्यविलसच्छीतांशुपीठस्थितं
स्फूर्जत्सूर्यरुचिं वराभयकरं कर्पूरकुन्दोज्ज्वलम्।
श्वेतस्रग्वसनानुलेपनयुतं विद्युद्रुचा कान्तया
संश्लिष्टार्धतनुं प्रसन्नवदनं वन्दे गुरुं सादरम्॥
इसके बाद—
अनया पूजया गुरुदेवः प्रीयतां न मम।
१६. सरस्वती पूजन
ॐ सरस्वत्यै नमः।
प्रार्थना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
इसके बाद—
अनया पूजया भगवती सरस्वती प्रीयतां न मम।
१७. शेष, सनत्कुमार आदि पूजन
निम्न मन्त्रों से पूजन करें—
ॐ शेषाय नमः।
ॐ सनत्कुमाराय नमः।
ॐ सांख्यायनाय नमः।
ॐ पराशराय नमः।
ॐ बृहस्पतये नमः।
ॐ मैत्रेयाय नमः।
ॐ उद्धवाय नमः।
प्रार्थना
शेषः सनत्कुमारश्च सांख्यायनपराशरौ।
बृहस्पतिश्च मैत्रेय उद्धवश्चात्र कर्मणि॥
प्रत्यूहवृन्दं सततं हरन्तां पूजिता मया॥
इसके बाद—
अनया पूजया शेषसनत्कुमारसांख्यायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवाः प्रीयन्तां न मम।
१८. छह पौराणिकों का पूजन
ॐ त्रय्यारुणये नमः।
ॐ कश्यपाय नमः।
ॐ रामशिष्याय नमः।
ॐ अकृतव्रणाय नमः।
ॐ वैशम्पायनाय नमः।
ॐ हारीताय नमः।
प्रार्थना
त्रय्यारुणिः कश्यपश्च रामशिष्योऽकृतव्रणः।
वैशम्पायनहारीतौ षड् वै पौराणिका इमे॥
सुखदाः सन्तु मे नित्यमनया पूजयार्चिताः॥
इसके बाद—
अनया पूजया त्रय्यारुणिप्रभृतयः षट् पौराणिकाः प्रीयन्तां न मम।
१९. व्यासदेव पूजन
ॐ भगवते व्यासाय नमः।
प्रार्थना
नमस्तस्मै भगवते व्यासायामिततेजसे।
पपुर्ज्ञानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम्॥
इसके बाद—
अनया पूजया भगवान् व्यासः प्रीयतां न मम।
२०. भगवान् सूर्य का पूजन
सप्ताह-यज्ञ के उपदेशक भगवान् सूर्य की स्थापना करके प्रतिदिन उनकी पूजा करनी चाहिए।
ॐ सूर्याय नमः।
प्रार्थना
लोकेश त्वं जगच्चक्षुः सत्कर्म तव भाषितम्।
करोमि तच्च निर्विघ्नं पूर्णमस्तु त्वदर्चनात्॥
इसके बाद—
अनया पूजया सप्ताहयज्ञोपदेष्टा भगवान् सूर्यः प्रीयतां न मम।
२१. दशावतार एवं शुकदेव पूजन
इसके बाद दशावतारों तथा शुकदेवजी की यथास्थान स्थापना करके पूजा करनी चाहिए।
२२. नारदपीठ एवं पुस्तकपीठ पूजन
नारदपीठ और पुस्तकपीठ दोनों की एक साथ पूजा करें।
पहले दोनों पीठों का जल से अभिषेक करके चन्दन आदि से अष्टदल कमल बनाएं।
आधारशक्ति आदि की पूजा—
ॐ आधारशक्तये नमः।
ॐ मूलप्रकृतये नमः।
ॐ क्षीरसमुद्राय नमः।
ॐ श्वेतद्वीपाय नमः।
ॐ कल्पवृक्षाय नमः।
ॐ रत्नमण्डपाय नमः।
ॐ रत्नसिंहासनाय नमः।
चारों दिशाओं में—
ॐ धर्माय नमः।
ॐ ज्ञानाय नमः।
ॐ वैराग्याय नमः।
ॐ ऐश्वर्याय नमः।
मध्यभाग में—
ॐ अनन्ताय नमः।
ॐ महापद्माय नमः।
२३. महापद्म की भावना एवं पूजा
महापद्म का कन्द आनन्दमय, उसकी नाल संवित्स्वरूप, दल प्रकृतिमय, केसर विकृतिरूप तथा बीज पञ्चाशत् वर्णस्वरूप माने जाते हैं।
कर्णिका में अर्कमण्डल, सोममण्डल और वह्निमण्डल तथा सत्त्व, रज और तम की स्थिति की भावना करनी चाहिए।
मन्त्र—
ॐ आनन्दमयकन्दाय नमः।
ॐ संविन्नालाय नमः।
ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः।
ॐ विकृतिमयकेसरेभ्यो नमः।
ॐ पञ्चाशद्वर्णबीजभूषितायै कर्णिकायै नमः।
ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः।
ॐ सं सोममण्डलाय नमः।
ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः।
ॐ सं प्रबोधात्मने सत्त्वाय नमः।
ॐ रं रजसे नमः।
ॐ तं तमसे नमः।
इसके बाद आठों दिशाओं में आठ शक्तियों की पूजा करें—
ॐ विमलायै नमः।
ॐ उत्कर्षिण्यै नमः।
ॐ ज्ञानायै नमः।
ॐ क्रियायै नमः।
ॐ योगायै नमः।
ॐ प्रह्लादिन्यै नमः।
ॐ सत्यायै नमः।
ॐ ईशानायै नमः।
मध्यभाग में—
ॐ अनुग्रहायै नमः।
२४. श्रीमद्भागवत पुस्तक की स्थापना
सम्पूर्ण पद्मपीठ का पूजन—
ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय।
पद्मपीठात्मने नमः।
कहकर करें।
पीठ पर सुन्दर वस्त्र बिछाएं। श्रीमद्भागवत की पुस्तक हाथ में लेकर—
ॐ ध्रुवा द्योर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवा सा पर्वता इमे।
ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामसि॥
मन्त्र पढ़ते हुए पुस्तक को पीठ पर स्थापित करें।
फिर—
ॐ मनो जूतिः०
मन्त्र से पुस्तक की प्रतिष्ठा करें।
इसके बाद पुरुषसूक्त के षोडश मन्त्रों द्वारा षोडशोपचार से पूजा करें।
स्थापना मन्त्र
तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शंय्योस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्।
अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय॥
२५. श्रीमद्भागवत के षोडशोपचार पूजन-मन्त्र
आवाहन
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। आवाहयामि।
आसन
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। आसनं समर्पयामि।
पाद्य
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। पाद्यं समर्पयामि।
अर्घ्य
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। अर्घ्यं समर्पयामि।
आचमन
ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। आचमनं समर्पयामि।
स्नान
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्।
पशूंस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। स्नानं समर्पयामि।
वस्त्र
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। वस्त्रं समर्पयामि।
यज्ञोपवीत
ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। यज्ञोपवीतं समर्पयामि।
गन्ध
ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। गन्धं समर्पयामि।
तुलसीदल एवं पुष्प
ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः।
तुलसीदलं च पुष्पाणि समर्पयामि।
धूप
ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। धूपमाघ्रापयामि।
दीप
ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। दीपं दर्शयामि।
नैवेद्य
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। नैवेद्यं निवेदयामि।
नैवेद्य के बाद—
मध्ये पानीयं समर्पयामि।
उत्तरापोशनं समर्पयामि।
कहकर तीन-तीन बार जल अर्पित करें।
ताम्बूल
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः।
एलालवङ्गपूगीफलकर्पूरसहितं ताम्बूलं समर्पयामि।
दक्षिणा
ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिःसप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। दक्षिणां समर्पयामि।
नमस्कार
ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसस्तु पारे।
सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। नमस्कारं समर्पयामि।
प्रदक्षिणा
ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्रदिशश्चतस्रः।
तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। प्रदक्षिणां समर्पयामि।
पुष्पाञ्जलि
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। मन्त्रपुष्पं समर्पयामि।
२६. श्रीमद्भागवत के प्रति प्रार्थना
वन्दे श्रीकृष्णदेवं मुरनरकभिदं वेदवेदान्तवेद्यं
लोके भक्तिप्रसिद्धं यदुकुलजलधौ प्रादुरासीदपारे।
यस्यासीद्रूपमेवं त्रिभुवनतरणे भक्तिवच्च स्वतन्त्रं
शास्त्रं रूपं च लोके प्रकटयति मुदा यः स नो भूतिहेतुः॥
श्रीभागवतरूपं तत् पूजयेद्भक्तिपूर्वकम्।
अर्चकायाखिलान् कामान् प्रयच्छति न संशयः॥
२७. देवर्षि नारद पूजन
द्वितीय पीठ को श्वेत वस्त्र से आच्छादित करके उस पर देवर्षि नारद की स्थापना करें।
ॐ सुरर्षिवरनारदाय नमः।
प्रार्थना
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते ज्ञानवैराग्यशालिने।
नारदाय सर्वलोकपूजिताय सुरर्षये॥
इसके बाद—
अनया पूजया देवर्षिनारदः प्रीयतां न मम।
२८. कथावाचक आचार्य का वरण
यजमान पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, वस्त्र, दक्षिणा, सुपारी तथा रक्षासूत्र हाथ में लेकर कथावाचक आचार्य का वरण करे—
ॐ अद्यामुकगोत्रममुकप्रवरममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिर्वरणद्रव्यैः सर्वेष्टदश्रीमद्भागवतवक्तृत्वेन भवन्तमहं वृणे।
कथावाचक व्यास—
वृतोऽस्मि।
कहकर वरण स्वीकार करें।
इसी प्रकार जप एवं पाठ करने वाले ब्राह्मणों का वरण करें।
वरण-संकल्प
अद्याहममुकगोत्रानमुकप्रवरानमुकशर्मणो यथासंख्याकान् ब्राह्मणानेभिर्वरणद्रव्यैर्गाथाविघ्नापनोदार्थं गणेश गायत्री वासुदेवमन्त्रजपकर्तृत्वेन गीताविष्णुसहस्रनामपाठकर्तृत्वेन च वो विभज्य वृणे।
ब्राह्मण—
वृताः स्मः।
कहकर वरण स्वीकार करें।
२९. रक्षासूत्र एवं तिलक
कथावाचक आचार्य को रक्षासूत्र बाँधते समय—
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥
मन्त्र का पाठ करें।
इसके बाद यजमान आचार्य के ललाट पर रोली एवं अक्षत से तिलक करे। जपकर्ता ब्राह्मणों के हाथ में भी रक्षा बाँधकर तिलक करें।
यजमान चारों दिशाओं में पीले अक्षत बिखेरे और कहे—
पूर्वे नारायणः पातु वारिजाक्षश्च दक्षिणे।
पश्चिमे पातु गोविन्द उत्तरे मधुसूदनः॥
ऐशान्यां वामनः पातु चाग्नेय्यां च जनार्दनः।
नैर्ऋत्यां पद्मनाभश्च वायव्यां माधवस्तथा॥
ऊर्ध्वं गोवर्धनधरो ह्यधस्ताच्च त्रिविक्रमः।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं तत्सर्वं रक्षतां हरिः॥
इसके बाद आचार्य यजमान को रक्षा बाँधते हुए—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
मन्त्र का पाठ करें।
तिलक के लिए—
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।
तिलकं ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये॥
३०. व्यासासन पूजन एवं कथा प्रारम्भ
यजमान व्यासासन की पूजा करे—
ॐ व्यासासनाय नमः।
कथावाचक आचार्य ब्राह्मणों एवं वृद्धजनों की आज्ञा लेकर विप्रवर्ग को नमस्कार करें, गुरुचरणों का ध्यान करें और व्यासासन पर विराजमान हों।
मन-ही-मन गणेश एवं नारदादि का स्मरण एवं पूजन करें।
इसके बाद यजमान—
ॐ नमः पुराणपुरुषोत्तमाय।
मन्त्र से श्रीमद्भागवत पुस्तक की गन्ध, पुष्प, तुलसीदल, दक्षिणा आदि से पुनः पूजा करे।
वक्ता का पूजन करते हुए—
जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः।
यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत्पिबति॥
३१. कथा से पूर्व प्रार्थना
शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय॥
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे।
कर्मग्राहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात्॥
इसके बाद श्रीमद्भागवत पर पुष्प, चन्दन एवं नारियल आदि चढ़ाएं—
श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि।
स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे॥
मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव॥
३२. कथा-मण्डप की विशेष व्यवस्था
कथा-मण्डप में वायुरूपधारी आतिवाहिक शरीर वाले जीवविशेष के लिए सात गाँठ वाला बाँस भी स्थापित करने का विधान है।
इसके बाद वक्ता भगवान् का स्मरण करके प्रथम दिन श्रीमद्भागवतमाहात्म्य की कथा श्रोताओं को सुनाए।
३३. प्रतिदिन की कथा-व्यवस्था
सन्ध्या को कथा समाप्त होने के बाद भी प्रतिदिन—
- श्रीमद्भागवत पुस्तक का पूजन
- वक्ता का पूजन
- आरती
- प्रसाद वितरण
- तुलसीदल वितरण
- भगवन्नाम-कीर्तन
- शंखध्वनि
करनी चाहिए।
कथा के प्रारम्भ में तथा बीच-बीच में कथा-विराम के समय भी यथानुसार भगवन्नाम-कीर्तन किया जाना चाहिए।
वक्ता को प्रतिदिन पाठ प्रारम्भ करने से पूर्व १०८ बार
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
द्वादशाक्षर-मन्त्र का अथवा—
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।
गोपाल-मन्त्र का जप करना चाहिए।
३४. श्रीमद्भागवत पाठ का विनियोग
दाहिने हाथ की अनामिका में कुश की पवित्री धारण करें। हाथ में जल लेकर विनियोग करें—
ॐ अस्य श्रीमद्भागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य नारद ऋषिः। बृहती छन्दः। श्रीकृष्णः परमात्मा देवता। ब्रह्म बीजम्। भक्तिः शक्तिः। ज्ञानवैराग्ये कीलकम्। मम श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्धयर्थे पाठे विनियोगः।
३५. ऋष्यादिन्यास
नारदर्षये नमः शिरसि।
बृहतीछन्दसे नमः मुखे।
श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः हृदि।
ब्रह्मबीजाय नमः गुह्ये।
भक्तिशक्तये नमः पादयोः।
ज्ञानवैराग्यकीलकाभ्यां नमो नाभौ।
श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्धयर्थकपाठविनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।
३६. करन्यास
द्वादशाक्षर मन्त्र के अनुसार—
ॐ क्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ क्लूं मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ क्लैं अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ क्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
अङ्गन्यास
ॐ क्लां हृदयाय नमः।
ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लूं शिखायै वषट्।
ॐ क्लैं कवचाय हुम्।
ॐ क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ क्लः अस्त्राय फट्।
३७. श्रीकृष्ण ध्यान
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुः करे कङ्कणम्।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
अस्ति स्वस्तरुणीकराग्रविगलत्कल्पप्रसूनाप्लुतं
वस्तु प्रस्तुतवेणुनादलहरीनिर्वाणनिर्व्याकुलम्।
स्रस्तस्रस्तनिबद्धनीविविलसद्गोपीसहस्रावृतं
हस्तन्यस्तनतापवर्गमखिलोदारं किशोराकृतिः॥
इस प्रकार ध्यान के पश्चात् कथा प्रारम्भ करनी चाहिए।
३८. कथा-पाठ की पारंपरिक समय-सारिणी
पारंपरिक विधान के अनुसार सूर्योदय से कथा प्रारम्भ करके प्रतिदिन साढ़े तीन प्रहर तक कथा का पाठ करना चाहिए।
मध्याह्न में दो घड़ी कथा का विराम रखा जाता है।
परंपरा में—
प्रातःकाल से मध्याह्न तक — श्रीमद्भागवत के मूल पाठ का वाचन।
मध्याह्न से सन्ध्या तक — मूल कथा का संक्षिप्त भावार्थ अपनी भाषा में।
मध्याह्न विश्राम एवं रात्रि में भगवन्नाम-कीर्तन की व्यवस्था करनी चाहिए।
३९. सप्ताह-समापन एवं हवन
कथा समाप्ति के दूसरे दिन स्थापित सम्पूर्ण देवताओं का पुनः पूजन करें।
हवन-वेदी पर—
- पञ्चभूसंस्कार
- अग्निस्थापन
- कुशकण्डिका
करके विधिपूर्वक वरण किए हुए ब्राह्मणों द्वारा हवन, तर्पण एवं मार्जन कराएं।
इसके बाद श्रीमद्भागवत की शोभायात्रा निकालकर ब्राह्मण-भोजन कराएं।
४०. श्रीमद्भागवत सप्ताह-यज्ञ का हवन
मधुमिश्रित खीर एवं तिल आदि से श्रीमद्भागवत के श्लोकों का दशांश अर्थात् १८०० आहुति देने का विधान बताया गया है।
खीर उपलब्ध न हो तो—
- तिल
- चावल
- जौ
- मेवा
- शुद्ध घी
- चीनी
मिलाकर हवनीय पदार्थ तैयार किया जा सकता है।
इसमें सुगन्धित पदार्थ जैसे—
- कपूर-काचरी
- नागरमोथा
- छड़छड़ीला
- अगर
- तगर
- चन्दनचूर्ण
आदि मिलाने का विधान है।
१८०० आहुति गायत्री मन्त्र अथवा दशमस्कन्ध के प्रति श्लोक से देने का विधान बताया गया है।
४१. हवन के पश्चात् कर्म
हवन के अन्त में—
- दिक्पाल आदि के लिए बलि
- क्षेत्रपाल पूजन
- छायापात्रदान
- हवन का दशांश तर्पण
- तर्पण का दशांश मार्जन
करना चाहिए।
इसके पश्चात् आरती करें।
फिर किसी नदी, सरोवर अथवा कूप आदि पर जाकर अवभृथ-स्नान अर्थात् यज्ञान्त-स्नान करने का विधान है।
४२. असमर्थता की स्थिति में यथाशक्ति विधान
जो व्यक्ति पूर्ण हवन करने में असमर्थ हो, वह अपनी शक्ति के अनुसार हवनीय पदार्थ का दान कर सकता है।
अन्त में कम-से-कम बारह ब्राह्मणों को मधुयुक्त खीर का भोजन कराने का विधान है।
व्रत की पूर्ति के लिए—
- सुवर्णदान
- गोदान
करना चाहिए।
सुवर्ण-सिंहासन पर विराजित सुन्दर अक्षरों में लिखित श्रीमद्भागवत की पूजा करके उसे दक्षिणासहित कथावाचक आचार्य को दान करने का विधान है।
४३. पूर्णता एवं क्षमा-प्रार्थना
अन्त में सभी प्रकार की त्रुटियों की पूर्ति के लिए कथावाचक आचार्य के द्वारा विष्णुसहस्रनाम का पाठ सुनना चाहिए।
विरक्त श्रोताओं को श्रीमद्भगवद्गीता सुननी चाहिए।
इस प्रकार श्रीमद्भागवत सप्ताह-यज्ञ में देवपूजन, ग्रन्थपूजन, व्यासपूजन, आचार्य-वरण, मूल-पाठ, भावार्थ, नामकीर्तन, हवन, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण-भोजन एवं दान आदि के माध्यम से सम्पूर्ण अनुष्ठान की पूर्णता मानी जाती है।
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