शब्दों का चयन और सत्य का विवेक
Choice of words and discernment of truth
वाणी केवल ध्वनि नहीं, व्यक्तित्व का दर्पण है।
मनुष्य के विचार उसके मन में जन्म लेते हैं, पर उसकी पहचान उसके शब्दों से होती है। हम जो बोलते हैं, सामने वाला व्यक्ति प्रायः उन्हीं शब्दों के आधार पर हमारे व्यक्तित्व, संस्कार, उद्देश्य और दृष्टिकोण का अनुमान लगा लेता है। इसलिए एक असावधानी से निकला हुआ शब्द, वर्षों से बने विश्वास को भी क्षणभर में कमजोर कर सकता है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में वाणी को तप और शब्द को शक्ति कहा गया है।
आज के समाज में अनेक बुद्धिजीवी यह कहते हुए मिल जाते हैं कि—"बिना झूठ बोले समाज में काम नहीं चलता, इसलिए परिस्थितिवश झूठ बोलना पड़ता है।" यह कथन अनुभवजन्य हो सकता है, परन्तु इसे जीवन का सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता।
समस्या सत्य बोलने में नहीं है, बल्कि सत्य को उचित समय, उचित शब्द और उचित भाव से व्यक्त करने में है। कई बार लोग कठोर वाणी को सत्यवादिता समझ लेते हैं, और चतुराई को व्यवहार-कुशलता। जबकि वास्तविक व्यवहार-कुशलता वह है जिसमें सत्य भी सुरक्षित रहे और संबंध भी।
सनातन परंपरा का अमूल्य संदेश है—
> "सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।"
अर्थात् सत्य बोलो, प्रिय बोलो, पर ऐसा सत्य भी न बोलो जो केवल अनावश्यक पीड़ा पहुँचाने वाला हो।
इसका अर्थ सत्य को छिपाना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण वाणी का प्रयोग करना है। हर सत्य हर समय और हर व्यक्ति के सामने एक ही प्रकार से नहीं कहा जाता। वाणी में संवेदनशीलता, मर्यादा और समय की समझ भी उतनी ही आवश्यक है जितना स्वयं सत्य।
निस्संदेह जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ भय, स्वार्थ, सामाजिक दबाव या तत्काल लाभ के कारण व्यक्ति असत्य का सहारा ले लेता है। परन्तु यदि यह प्रवृत्ति आदत बन जाए, तो सबसे पहले विश्वास नष्ट होता है। और जिस व्यक्ति पर विश्वास समाप्त हो जाए, उसके शब्दों का मूल्य भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
वास्तविक बुद्धिमत्ता केवल सत्य बोलने में नहीं, बल्कि ऐसा सत्य बोलने में है जो स्पष्ट हो, संयमित हो, हितकारी हो और संबंधों को भी सुदृढ़ बनाए।
निष्कर्ष
शब्द हमारे विचारों के दूत हैं। एक सही शब्द सम्मान दिला सकता है, और एक गलत शब्द वर्षों की प्रतिष्ठा को धूमिल कर सकता है। इसलिए बोलने से पहले केवल यह न सोचें कि "मैं क्या कह रहा हूँ?", बल्कि यह भी विचार करें कि "मेरे शब्द सामने वाले के मन में कैसी धारणा उत्पन्न करेंगे?"
सत्य, विवेक और मधुरता—इन तीनों का समन्वय ही श्रेष्ठ वाणी का लक्षण है। यही स्वस्थ समाज, सुदृढ़ संबंध और श्रेष्ठ व्यक्तित्व की आधारशिला है।।
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