क्या कथावाचक जीवन में कोई क्रान्ति लाने की क्षमता नहीं रखते?
कथा, कथावाचक और गुरु-शिष्य परम्परा का शास्त्रीय, दार्शनिक एवं सामाजिक विवेचन
आचार्य विजय कुमार शुक्ला
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥
(बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८)
भूमिका
भारतीय संस्कृति में कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मसंस्कार, चरित्र-निर्माण और लोकमंगल का सशक्त माध्यम रही है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत और पुराणों की ज्ञान-धारा केवल ग्रन्थों तक सीमित नहीं रही; उसे कथा, संवाद और गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से समाज तक पहुँचाया गया। इसीलिए भारतीय परम्परा में कथा का उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य के अन्तःकरण का परिष्कार है।
इसी संदर्भ में पूज्य श्रीमज्जगद्गुरु पुरी शङ्कराचार्यजी महाराज का यह कथन विचारणीय है—
"कथावाचक जीवन में कोई क्रान्ति लाने की क्षमता नहीं रखते, इसका अर्थ क्या हुआ? कथा में ही दिशाहीनता आ गयी है।"
इस कथन को किसी व्यक्ति या सम्पूर्ण कथा-परम्परा की आलोचना के रूप में नहीं, बल्कि आत्ममंथन के निमंत्रण के रूप में समझना चाहिए। यह प्रश्न उठाता है कि यदि कथा का उद्देश्य जीवन को धर्ममय बनाना है, तो व्यापक कथा-प्रवचनों के बावजूद समाज में अपेक्षित नैतिक और आध्यात्मिक परिवर्तन क्यों नहीं दिखाई देता?
क्रान्ति का वास्तविक अर्थ
यहाँ "क्रान्ति" का अर्थ राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर होने वाला आध्यात्मिक रूपान्तरण है। भारतीय दर्शन में वास्तविक क्रान्ति वह है जो—
- विचारों को शुद्ध करे,
- चरित्र को दृढ़ बनाए,
- जीवन में सत्य और धर्म की प्रतिष्ठा करे,
- अहंकार को विनम्रता में बदले,
- और मनुष्य को ईश्वराभिमुख बनाए।
यदि कथा सुनने के बाद भी मनुष्य का व्यवहार, दृष्टिकोण और जीवन-दृष्टि अपरिवर्तित रहे, तो प्रश्न केवल श्रोता पर नहीं, बल्कि कथा की प्रभावशीलता पर भी उठता है।
कथा का शास्त्रीय उद्देश्य
भारतीय शास्त्रों में कथा का उद्देश्य स्पष्ट है—धर्म की स्थापना, अधर्म का निवारण, भक्ति का विकास, विवेक का जागरण और आत्मोन्नति।
भागवत में कहा गया है—
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
(श्रीमद्भागवत ७.५.२३)
श्रवण केवल ध्वनि सुनने का नाम नहीं है; वह आत्मसंस्कार की प्रथम सीढ़ी है। इसलिए कथा का वास्तविक फल तब है जब वह श्रोता के जीवन में धर्म, संयम, करुणा और सदाचार का विकास करे।
रामकथा का उद्देश्य मर्यादा है, महाभारत का उद्देश्य धर्म-विवेक है और श्रीमद्भागवत का उद्देश्य भक्ति तथा वैराग्य का जागरण है। यदि कथा इन उद्देश्यों से दूर हो जाए, तो उसके स्वरूप पर पुनर्विचार आवश्यक है।
क्या कथा में दिशाहीनता आई है?
यह प्रश्न अत्यन्त सावधानी से समझने योग्य है। इसका अर्थ यह नहीं कि शास्त्र दिशाहीन हो गए हैं। शास्त्र सनातन हैं और उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्रों वर्ष पूर्व था।
दिशाहीनता वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ कथा का केन्द्र शास्त्र से हटकर प्रदर्शन, लोकप्रियता या केवल भावनात्मक प्रभाव तक सीमित हो जाए। यदि कथा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण के स्थान पर केवल मनोरंजन बन जाए, यदि तत्त्वचिन्तन की अपेक्षा चमत्कारों और अलंकारिक वर्णनों पर अधिक बल दिया जाए, या यदि श्रोता केवल भाव-विभोर होकर लौट जाएँ और जीवन में कोई परिवर्तन न आए, तो आत्ममंथन आवश्यक है।
कथावाचक और श्रोता : दोनों का उत्तरदायित्व
भारतीय परम्परा में केवल कथावाचक ही उत्तरदायी नहीं है। श्रोता का दायित्व भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
भगवद्गीता कहती है—
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
(गीता ४.३४)
ज्ञान तभी फलित होता है जब उसमें श्रद्धा, जिज्ञासा और अभ्यास हो।
उपनिषदों ने ज्ञान की प्रक्रिया को श्रवण–मनन–निदिध्यासन के रूप में प्रतिपादित किया है। केवल सुनना पर्याप्त नहीं; सुने हुए पर विचार करना और उसे जीवन में उतारना ही कथा की सफलता है।
इसी प्रकार कथावाचक के लिए भी आवश्यक है कि वह शास्त्रनिष्ठ, सदाचारी, निष्काम और जीवन से जुड़ा हुआ हो। उसका आचरण उसके उपदेश का सबसे बड़ा प्रमाण होता है।
समकालीन परिप्रेक्ष्य
आज धार्मिक कथाओं का प्रसार अभूतपूर्व है। दूरदर्शन, धार्मिक चैनलों, यूट्यूब और सामाजिक मीडिया के माध्यम से कथा करोड़ों लोगों तक पहुँच रही है। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है।
किन्तु इसके साथ एक चुनौती भी है। अनेक घरों में धार्मिक चैनल दिनभर चलते रहते हैं, परन्तु कथा कई बार पृष्ठभूमि की ध्वनि बनकर रह जाती है। लोग अन्य कार्य करते हुए कथा सुनते हैं, किन्तु उस पर मनन करने और उसे जीवन में उतारने का प्रयास अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
कथा का प्रभाव उसके प्रसारण की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके सजग श्रवण और आचरण से निर्धारित होता है। यदि कथा केवल कानों तक पहुँचे तो वह सूचना है; यदि बुद्धि तक पहुँचे तो वह ज्ञान है; और यदि जीवन में उतर जाए तो वही धर्म बनती है।
गुरु-शिष्य परम्परा का प्रश्न
कथा-परम्परा की भाँति गुरु-शिष्य परम्परा भी आत्ममंथन की अपेक्षा रखती है। उपनिषद् कहते हैं—
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।
(मुण्डकोपनिषद् १.२.१२)
गुरु शास्त्रज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ हो, तथा शिष्य श्रद्धावान और जिज्ञासु—यही भारतीय परम्परा का आदर्श है।
आज भी अनेक संत, आचार्य और गुरु इस आदर्श को जीवित रखे हुए हैं। किन्तु जहाँ गुरु केवल लोकप्रिय व्यक्तित्व और शिष्य केवल प्रशंसक बनकर रह जाए, वहाँ गुरु-शिष्य परम्परा का मूल स्वरूप दुर्बल होने लगता है।
समाधान की दिशा
समस्या का समाधान आलोचना में नहीं, आत्ममंथन में है।
कथा पुनः शास्त्र-केंद्रित बने।
कथावाचक अध्ययन, साधना और आचरण को समान महत्त्व दें।
श्रोता श्रद्धापूर्वक श्रवण के साथ मनन और आचरण को अपनाएँ।
गुरु-शिष्य सम्बन्ध पुनः विश्वास, सेवा, अनुशासन और साधना पर आधारित हों।
धार्मिक आयोजनों का मूल्यांकन भीड़ या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उनके द्वारा उत्पन्न संस्कारों और चरित्र-निर्माण से किया जाए।
उपसंहार
भारतीय परम्परा में कथा का उद्देश्य केवल सुनाना नहीं, बल्कि जगाना है। गुरु का कार्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि जीवन का निर्माण करना है। शिष्य का धर्म केवल सुनना नहीं, बल्कि सत्य को अपने आचरण में प्रतिष्ठित करना है।
अतः पूज्य श्रीमज्जगद्गुरु पुरी शङ्कराचार्यजी महाराज का कथन कथा-परम्परा का निषेध नहीं, बल्कि उसके मूल उद्देश्य की पुनर्स्मृति है। यदि कथा से चरित्र, गुरु से संस्कार और शिष्य से साधना का सम्बन्ध पुनः सुदृढ़ हो जाए, तो वही कथा समाज में वास्तविक आध्यात्मिक क्रान्ति का माध्यम बन सकती है।
अंततः कथा की सफलता श्रोताओं की संख्या से नहीं, बल्कि उन जीवनों से मापी जानी चाहिए जिनमें उसके प्रभाव से सत्य, धर्म, करुणा, संयम और ईश्वराभिमुखता का उदय हुआ। यही भारतीय कथा-परम्परा की आत्मा है और यही उसकी शाश्वत प्रासंगिकता।
आचार्य विजय कुमार शुक्ला
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र
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