सामग्री का भार और आचार्य की मर्यादा
आचार्यत्व या आयोजन-प्रबंधन? एक आवश्यक पुनर्विचार
प्रातःकाल का समय है।
एक आचार्य अपने घर से निकल रहे हैं। एक हाथ में पूजन-सामग्री का भारी थैला, दूसरे में कलश, वाहन में हवन-सामग्री, फल, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुएँ रखी हैं। वे यजमान के घर पहुँचते हैं, सामग्री उतारते हैं, व्यवस्था करते हैं और फिर पूजन/अनुष्ठान आरम्भ करते हैं।
यह दृश्य आज सामान्य है।
परन्तु एक प्रश्न मन में उठता है—
क्या यही वह आचार्य है जिसकी कल्पना हमारे शास्त्रों ने की थी?
आज किसी भी पूजन, कथा, गृहप्रवेश, यज्ञ या संस्कार की चर्चा होते ही प्रायः पहला प्रश्न पूछा जाता है—
"पण्डित जी, आप सामग्री लेकर आ जाएंगे न?"
यह प्रश्न जितना साधारण प्रतीत होता है, उसके भीतर उतना ही गहरा सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तन छिपा हुआ है।
क्या पूजन-सामग्री की व्यवस्था करना वास्तव में आचार्य का कार्य है?
क्या यह परम्परा का अंग है?
क्या इससे आचार्य की सामाजिक और धार्मिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—
क्या हम अनजाने में आचार्यत्व के स्वरूप को बदल रहे हैं?
आचार्य कौन है?
भारतीय संस्कृति में आचार्य केवल कर्मकाण्ड कराने वाला व्यक्ति नहीं है।
आचार्य वह है जो स्वयं आचरण करके धर्म का उपदेश देता है। वह वेद और शास्त्र का ज्ञाता है, संस्कारों का संचालक है, समाज का मार्गदर्शक है और धार्मिक परम्पराओं का संरक्षक है।
उसकी प्रतिष्ठा उसके ज्ञान से है, उसकी वाणी से है, उसके आचरण से है।
किसी भी शास्त्र में आचार्य की महिमा इसलिए नहीं कही गई कि वह पूजन-सामग्री जुटाने में दक्ष है।
आचार्य का सम्मान उसके अध्यात्म, विद्वत्ता और धर्मनिष्ठा के कारण है।
सामग्री कौन उपलब्ध कराए?
यदि कार्यक्रम यजमान के घर पर हो रहा है, तो स्वाभाविक रूप से आवश्यक सामग्री की व्यवस्था भी यजमान द्वारा ही की जानी चाहिए।
आचार्य का कार्य है—
- सामग्री की सूची देना,
- आवश्यक निर्देश देना,
- विशेष सावधानियाँ बताना,
- और शास्त्रोक्त विधि से अनुष्ठान सम्पन्न कराना।
यही व्यवस्था परम्परा के अधिक निकट दिखाई देती है।
यजमान केवल दर्शक नहीं होता; वह अनुष्ठान का कर्ता होता है। इसलिए अनुष्ठान की तैयारी में उसकी सहभागिता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी उसकी उपस्थिति।
क्या सामग्री केवल आचार्य ही प्राप्त कर सकते हैं?
आज लगभग सभी पूजन-सामग्री बाजार में उपलब्ध है।
यदि कोई वस्तु दुर्लभ है, तो उसका नाम, स्वरूप और प्राप्ति-स्थान बताया जा सकता है।
आचार्य भी उसे अंततः किसी बाजार, विक्रेता या धार्मिक प्रतिष्ठान से ही प्राप्त करेंगे।
ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है—
यदि वही सामग्री यजमान भी प्राप्त कर सकता है, तो फिर यह दायित्व अनिवार्य रूप से आचार्य पर क्यों डाला जाए?
अनुभव का प्रश्न
कई लोग कहते हैं कि आचार्य को सामग्री की गुणवत्ता का अनुभव होता है।
निस्संदेह अनुभव उपयोगी है। किन्तु यह अनुभव भी अनुष्ठानों में सामग्री के निरंतर प्रयोग से प्राप्त होता है।
यह कोई ऐसी गुप्त विद्या नहीं है जो केवल सामग्री खरीदने वालों को ही प्राप्त होती हो।
और यदि यही तर्क मान लिया जाए, तो नवोदित आचार्यों के पास तो प्रारम्भ में ऐसा अनुभव भी नहीं होता।
स्पष्ट है कि आचार्य की विशिष्टता सामग्री-ज्ञान नहीं, बल्कि शास्त्र-ज्ञान है।
सामग्री-व्यवस्था का एक अनदेखा पक्ष
इस विषय में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर सामान्यतः चर्चा नहीं होती।
जब किसी यजमान के घर पर अनुष्ठान होना है, तब प्रायः यह अपेक्षा की जाती है कि आचार्य स्वयं पूजन-सामग्री की व्यवस्था भी करें।
किन्तु विचार करने की बात है कि उस सामग्री को जुटाने में समय किसका लग रहा है?
बाज़ार कौन जा रहा है?
वस्तुओं का चयन कौन कर रहा है?
सामग्री को पैक और परिवहन कौन कर रहा है?
और उसका भार उठाकर यजमान के घर कौन पहुँच रहा है?
स्पष्ट है कि यह सब कार्य आचार्य कर रहे हैं।
दूसरी ओर यजमान अपने घर पर उपस्थित रहता है और अक्सर यह मान लेता है कि यह सब व्यवस्था आचार्य के कार्यक्षेत्र का ही भाग है।
श्रम का मूल्य कौन देगा?
यदि यजमान स्वयं सामग्री की व्यवस्था करता, तो उसे—
- समय देना पड़ता,
- बाजार जाना पड़ता,
- परिवहन की व्यवस्था करनी पड़ती,
- और चयन में श्रम करना पड़ता।
अर्थात उसे स्वयं इस कार्य का मूल्य चुकाना पड़ता।
किन्तु जब यही कार्य आचार्य करता है, तब प्रायः लोग यह अपेक्षा रखते हैं कि इसका कोई पृथक मूल्य न लिया जाए।
यहीं से एक व्यावहारिक समस्या उत्पन्न होती है।
क्योंकि कोई भी व्यक्ति—चाहे वह आचार्य हो या कोई अन्य—अपने समय, श्रम और व्यय की पूर्ण उपेक्षा करके निरंतर कार्य नहीं कर सकता।
फिर अतिरिक्त मूल्य कहाँ से आता है?
जब सामग्री-व्यवस्था का श्रम अलग से स्वीकार नहीं किया जाता, तब उसका मूल्य किसी न किसी रूप में जुड़ता ही है।
अक्सर यह मूल्य सामग्री के कुल खर्च में सम्मिलित हो जाता है।
फलस्वरूप लोग यह कहने लगते हैं—
"पण्डित जी सामग्री में अधिक पैसा ले रहे हैं।"
जबकि वास्तविकता यह भी हो सकती है कि उस राशि में केवल वस्तुओं का मूल्य नहीं, बल्कि उन्हें प्राप्त करने, एकत्र करने, लाने और व्यवस्थित करने का श्रम भी शामिल हो।
समस्या यह नहीं कि आचार्य अधिक ले रहे हैं।
समस्या यह है कि समाज ने श्रम और वस्तु के मूल्य को अलग-अलग समझना ही छोड़ दिया है।
पैकेज व्यवस्था: कहाँ उचित और कहाँ विचारणीय?
आजकल अनेक आचार्य किसी विशेष अनुष्ठान के लिए एक निश्चित राशि निर्धारित कर देते हैं।
"सामग्री सहित और दक्षिणा सहित कुल इतना व्यय होगा।"
व्यावहारिक दृष्टि से यह व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में उचित भी प्रतीत होती है।
कभी-कभी सामग्री और दक्षिणा अलग-अलग बताने पर यजमान को कुल व्यय अधिक प्रतीत होता है। एक समेकित राशि बताने पर उसे सुविधा रहती है।
कई बार केवल दक्षिणा की राशि सुनकर यजमान उसे अधिक मान लेता है, जबकि वही राशि सामग्री और अन्य व्यवस्थाओं सहित बताई जाए तो सहज स्वीकार कर लेता है।
इस दृष्टि से पैकेज व्यवस्था का एक व्यवहारिक पक्ष अवश्य है।
किन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद समझना आवश्यक है।
यदि अनुष्ठान आचार्य के अपने आश्रम, यज्ञशाला या व्यवस्था-स्थल पर हो, तो सामग्री सहित एक समेकित व्यवस्था स्वाभाविक प्रतीत होती है।
किन्तु यदि कार्यक्रम यजमान के घर पर हो रहा है, तो प्रश्न उठता है—
स्थान यजमान का, आयोजन यजमान का, सुविधा यजमान की—फिर सामग्री-संग्रह और प्रबंधन का भार भी आचार्य पर ही क्यों?
क्या यजमान अपने धार्मिक उत्तरदायित्व से दूर होता जा रहा है?
पहले अनुष्ठान की तैयारी स्वयं एक धार्मिक प्रक्रिया मानी जाती थी।
सामग्री एकत्र करना, पात्रों को शुद्ध करना, मंडप की व्यवस्था करना—यह सब केवल प्रबंधन नहीं था; यह यजमान की सहभागिता थी।
आज धीरे-धीरे यह भावना बढ़ रही है—
"हमें केवल बैठना है, बाकी सब कोई और कर देगा।"
यह प्रवृत्ति केवल आचार्य के कार्यभार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यजमान के धार्मिक उत्तरदायित्व से दूरी का भी प्रश्न है।
आचार्य और ग्राहक का संबंध?
परम्परा में संबंध "यजमान और आचार्य" का था।
आज कई स्थानों पर वह अनजाने में "ग्राहक और सेवा-प्रदाता" जैसा होता जा रहा है।
जब चर्चा शास्त्र, संस्कार और धर्म से हटकर पैकेज, व्यवस्था और दरों पर अधिक केन्द्रित हो जाती है, तब संबंध की आत्मा बदलने लगती है।
क्या इससे आचार्य का अध्ययन प्रभावित होता है?
यह एक अत्यंत गंभीर प्रश्न है।
आचार्य का समय सीमित है।
यदि उसका समय—
- बाजार जाने में,
- सामग्री जुटाने में,
- परिवहन करने में,
- पैकेज तैयार करने में,
व्यतीत होगा, तो अध्ययन, स्वाध्याय और शास्त्र-चिंतन के लिए समय कहाँ बचेगा?
फिर समाज शिकायत करेगा कि पहले जैसे विद्वान आचार्य क्यों नहीं रहे।
परंतु शायद हमने यह नहीं सोचा कि हमने उनसे अपेक्षा क्या-क्या कर ली है।
एक आवश्यक पुनर्विचार
यह आवश्यक नहीं कि हर आचार्य सामग्री-व्यवस्था से पूर्णतः अलग रहे।
और यह भी आवश्यक नहीं कि हर स्थिति में सम्पूर्ण भार उसी पर डाल दिया जाए।
आवश्यकता संतुलन की है।
यजमान अपने धार्मिक उत्तरदायित्व को समझे।
आचार्य अपनी विद्वत्-भूमिका को केंद्र में रखें।
और दोनों मिलकर अनुष्ठान को केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक संस्कार के रूप में देखें।
उपसंहार
इस पूरे विमर्श में उद्देश्य किसी व्यक्ति या वर्ग की आलोचना करना नहीं है।
प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम अपनी परम्पराओं में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका को सही रूप में समझ रहे हैं?
यदि अनुष्ठान यजमान का है, स्थान यजमान का है, आयोजन यजमान के घर में हो रहा है, तो क्या उसकी तैयारी और सामग्री-व्यवस्था में यजमान की भी कोई धार्मिक भागीदारी नहीं होनी चाहिए?
और यदि यह सम्पूर्ण उत्तरदायित्व आचार्य पर डाल दिया जाता है, तो क्या हम उनसे वही कार्य नहीं करवा रहे जो कोई भी अन्य व्यक्ति कर सकता है?
जब यजमान अपने अनुष्ठान की सामग्री तक स्वयं जुटाने के लिए तैयार न हो और आचार्य अपने अध्ययन का समय छोड़कर व्यवस्था में लग जाए, तब प्रश्न केवल सुविधा का नहीं रह जाता; वह परम्परा की दिशा का प्रश्न बन जाता है।
आचार्य का कार्य धर्म का मार्ग दिखाना है, धर्म का भार उठाना है; सामग्री का भार उठाना नहीं।
सामग्री का भार कोई भी उठा सकता है,
किन्तु शास्त्र का भार उठाने वाले आचार्य दुर्लभ होते हैं।
इसलिए समाज को यह निर्णय करना होगा कि वह आचार्य के कंधों पर क्या देखना चाहता है—
सामग्री का बोझ या परम्परा का दायित्व।
॥ इति विचारः ॥
लेखक -आचार्य विजय कुमार शुक्ल
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र कानपुर
Releted topic:-

No comments:
Post a Comment