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Monday, June 2, 2014
पूजा worship
पूजा worship
पूजा के पाँच अंग — अभिगमन, उपादान, स्वाध्याय, इज्या और योग
पूजा केवल देवता की आराधना नहीं, बल्कि उपासना की एक क्रमबद्ध साधना है।
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
भारतीय उपासना-पद्धति में पूजा का अपना विशिष्ट महत्व है। सामान्य रूप से पूजा का अर्थ भगवान के समक्ष विभिन्न उपचार अर्पित करना समझा जाता है, लेकिन शास्त्रीय परम्परा में पूजा को केवल उपचारों तक सीमित नहीं माना गया है।
पूजा के पाँच प्रमुख अंग बताए गए हैं— १. अभिगमन २. उपादान ३. स्वाध्याय ४. इज्या ५. योग
इन पाँचों अंगों के माध्यम से पूजा का क्रम बाहरी शुद्धता और तैयारी से प्रारम्भ होकर अन्ततः इष्टदेव की आन्तरिक भावना तक पहुँचता है। --- १. अभिगमन — देवस्थान की शुद्धि
देवता के स्थान को साफ करना, लीपना तथा निर्माल्य को हटाना आदि कर्म अभिगमन के अन्तर्गत आते हैं। जिस स्थान पर आराध्य देव की पूजा की जानी है, उस स्थान को स्वच्छ एवं व्यवस्थित करना पूजा की प्रारम्भिक प्रक्रिया है। देवस्थान की सफाई, लीपन तथा पूर्व पूजा के निर्माल्य को हटाना आदि कर्म अभिगमन कहलाते हैं। इस प्रकार पूजा का प्रथम अंग है— > देवस्थान की शुद्धि और पूजा के लिए पवित्र वातावरण की तैयारी। --- २. उपादान — पूजन-सामग्री का संग्रह
गन्ध, पुष्प आदि पूजन-सामग्री का संग्रह करना उपादान कहलाता है।
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री को पहले से एकत्र करना और उसे उचित रूप से व्यवस्थित करना उपादान है। गन्ध, पुष्प आदि सामग्री पूजा के विभिन्न उपचारों में प्रयुक्त होती है। इसलिए पूजा से पूर्व सामग्री का संग्रह और व्यवस्था भी पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग मानी गई है। --- ३. स्वाध्याय — जप, स्तोत्र और नाम-स्मरण
जप करना, सूक्त एवं स्तोत्र आदि का पाठ करना तथा भगवान के नाम और गुणों का स्मरण करना स्वाध्याय है। पूजा में केवल बाहरी सामग्री का ही महत्व नहीं है। भगवान के नाम, गुण और स्वरूप का स्मरण भी उपासना का महत्वपूर्ण पक्ष है।
मन्त्र-जप, सूक्त-पाठ, स्तोत्र-पाठ तथा आराध्य के नाम और गुणों का स्मरण—इन सभी को स्वाध्याय के अन्तर्गत रखा गया है। --- ४. इज्या — उपचारों द्वारा आराधना
विभिन्न उपचारों के द्वारा आराध्य देव की पूजा करना इज्या कहलाता है।
पूजा में भगवान को विभिन्न उपचार समर्पित किए जाते हैं। गन्ध, पुष्प आदि के साथ विधि के अनुसार आराध्य देव की पूजा करना इज्या है।
सामान्य रूप से जिसे हम पूजा का मुख्य दृश्य स्वरूप देखते हैं, वह इसी इज्या के अन्तर्गत आता है। --- ५. योग — इष्टदेव की आत्मरूप से भावना
पूजा का पाँचवाँ और अत्यन्त सूक्ष्म अंग है— योग
इष्टदेव की आत्मरूप से भावना करना योग कहलाता है। यहाँ उपासना केवल बाहरी कर्म तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साधक अपने इष्टदेव का अपने भीतर आत्मरूप से चिन्तन करता है।
अर्थात् पूजा की प्रक्रिया बाहरी देवस्थान से प्रारम्भ होकर अन्ततः अन्तःकरण में स्थित इष्टदेव की भावना तक पहुँचती है। पूजा में सरलता और वैभव
पूजा के इन पाँच अंगों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात कही गई है।
एक ओर भगवान की पूजा में अपार समारोह, राजोपचार तथा विशाल वैभव के साथ अनेक प्रकार के उपचारों का प्रयोग किया जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर सरलता की दृष्टि से केवल जल, अक्षत आदि से भी पूजा की परिपूर्णता मानी जाती है।
इसका अर्थ यह है कि पूजा की पूर्णता केवल बाहरी वैभव या सामग्री की अधिकता पर निर्भर नहीं है।
जिसके पास अधिक साधन हैं, वह विधिपूर्वक अनेक उपचारों के साथ पूजा कर सकता है और जिसके पास सीमित साधन हैं, वह उपलब्ध सामग्री से भी श्रद्धापूर्वक आराधना कर सकता है।
इसलिए पूजा का यह स्वरूप अत्यन्त सुंदर है— > वैभव हो तो भगवान के चरणों में समर्पित करें, और सरलता हो तो उसी सरलता में श्रद्धा से आराधना करें। पाँच अंग — एक सम्पूर्ण पूजा-दृष्टि इन पाँच अंगों को एक साथ देखें तो पूजा का क्रम स्पष्ट हो जाता है— अभिगमन — देवस्थान को तैयार करना। उपादान — पूजन-सामग्री को तैयार करना। स्वाध्याय — मन्त्र, सूक्त, स्तोत्र एवं नाम-गुण का स्मरण करना। इज्या — उपचारों के द्वारा आराध्य देव की पूजा करना। योग — इष्टदेव की आत्मरूप से भावना करना।
परम्परागत वर्णन में इन पाँचों अंगों को सारूप्य-मुक्ति देने वाला कहा गया है।
अतः पूजा केवल सामग्री और उपचारों का नाम नहीं है। पूजा में स्थान की शुद्धि, सामग्री की तैयारी, मन्त्र एवं नाम का स्मरण, आराधना और इष्टदेव की आन्तरिक भावना—इन पाँचों का अपना-अपना महत्व है।
यही पूजा के पाँच अंगों का सुन्दर और क्रमबद्ध स्वरूप है। प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर
शास्त्रसम्मत मार्गदर्शन एवं आध्यात्मिक संतुलन “वैदिक ज्ञान द्वारा जीवन में संतुलन एवं सही दिशा”
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