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Tuesday, September 20, 2011
नवरात्र - प्रकार एवं पूजन विधान
नवरात्र - प्रकार एवं पूजन-विधान
Navratri - Types and Worship Rituals
उपासना, व्रत और शक्ति-साधना का शास्त्रीय क्रम
प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर शास्त्रसम्मत मार्गदर्शन एवं आध्यात्मिक संतुलन
नवरात्र सनातन परम्परा का अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत एवं उपासना-पर्व है। सामान्यतः नौ रात्रियों तक व्रत एवं उपासना करने से ‘नवरात्र-व्रत’ पूर्ण माना जाता है। नवरात्र केवल देवी-पूजन का पर्व नहीं, बल्कि साधना, संयम, उपवास और अपने अभीष्ट देवता के प्रति श्रद्धा का अवसर भी है। शास्त्रीय परम्परा में मुख्यतः वासंती (चैत्र) नवरात्र और शारदीय (आश्विन) नवरात्र का विशेष महत्व बताया गया है। वासंती नवरात्र में विष्णु-उपासना तथा शारदीय नवरात्र में शक्ति-उपासना का विशेष प्राधान्य माना गया है। परन्तु दोनों ही नवरात्र व्यापक उपासना-पर्व हैं; इसलिए दोनों में विष्णु एवं शक्ति—दोनों की उपासना का विधान और परम्परा मिलती है। इनमें वर्ण, उपासना-विधान अथवा देवता के आधार पर कोई संकीर्ण भेद नहीं माना गया है। साधक अपनी श्रद्धा, परम्परा और अभीष्ट देवता के अनुसार उपासना कर सकता है।
--- 🌼 नवरात्र-व्रत के विभिन्न प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए पूरे नौ दिनों तक व्रत करना सम्भव हो, यह आवश्यक नहीं है। ऐसी स्थिति में परम्परा में नवरात्र के विभिन्न प्रकार के व्रतों का उल्लेख मिलता है। १. सप्तरात्र व्रत प्रतिपदा से सप्तमी तक सात रात्रियों का व्रत किया जाता है। इसे ‘सप्तरात्र’ कहा गया है। २. पञ्चरात्र व्रत पञ्चमी से नवमी तक पाँच रात्रियों का व्रत किया जाता है। इसे ‘पञ्चरात्र’ कहा जाता है। ३. त्रिरात्र व्रत सप्तमी से नवमी तक तीन रात्रियों का व्रत किया जाता है। इसे ‘त्रिरात्र’ कहा जाता है। ४. युग्मरात्र व्रत नवरात्र के आरम्भ और समाप्ति के दो व्रतों द्वारा किया जाने वाला व्रत ‘युग्मरात्र’ कहलाता है। ५. एकरात्र व्रत नवरात्र के आरम्भ अथवा समाप्ति में किसी एक दिन का व्रत करने को ‘एकरात्र’ कहा गया है। इस प्रकार सामर्थ्य के अनुसार किए गए इन व्रतों को भी नवरात्र-उपासना की परम्परा में स्थान प्राप्त है। मुख्य बात है—श्रद्धा, नियम, संयम और उपासना के प्रति निष्ठा।
--- 🌹 दुर्गा पूजा में नवरात्र का क्रम दुर्गा-उपासना में नवरात्र के प्रत्येक दिन के लिए विशेष पूजन-सामग्री एवं उपासना का क्रम बताया गया है। इसका उद्देश्य केवल सामग्री अर्पित करना नहीं, बल्कि क्रमशः देवी के प्रति श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करना है। 🌺 प्रतिपदा — केश संस्कार द्रव्य प्रथम दिन देवी को केश-संस्कार से सम्बन्धित द्रव्य, जैसे आँवला आदि अर्पित करने का विधान बताया गया है। 🌺 द्वितीया — रेशमी डोरी द्वितीया को बाल बाँधने के लिए रेशमी डोरी अर्पित की जाती है। 🌺 तृतीया — सिन्दूर एवं दर्पण तृतीया को सिन्दूर और दर्पण अर्पित करने का विधान है। 🌺 चतुर्थी — मधुपर्क, तिलक एवं नेत्रांजन चतुर्थी को देवी को मधुपर्क, तिलक तथा नेत्रांजन अर्पित किया जाता है। 🌺 पंचमी — अंगराग एवं अलंकार पंचमी को अंगराग एवं अलंकार अर्पित किए जाते हैं। 🌺 षष्ठी — पुष्पादि षष्ठी को पुष्प आदि से देवी का पूजन किया जाता है। 🌺 सप्तमी — गृह-मध्य पूजा सप्तमी को गृह के मध्य देवी की पूजा करने का विधान बताया गया है। 🌺 अष्टमी — उपवासपूर्वक पूजन अष्टमी को उपवासपूर्वक देवी का पूजन किया जाता है। नवरात्र साधना में अष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। 🌺 नवमी — महापूजा एवं कुमारी पूजा नवमी को महापूजा तथा कुमारी पूजा का विधान है। इस दिन नवरात्र की साधना को विशेष रूप से पूर्णता की ओर ले जाया जाता है। 🌺 दशमी — नीराजन एवं विसर्जन दशमी को नीराजन करके देवी की पूजा का समापन तथा विसर्जन किया जाता है।
--- 🪔 नवरात्र का वास्तविक उद्देश्य नवरात्र का अर्थ केवल नौ दिनों तक किसी प्रकार का व्रत कर लेना नहीं है। व्रत के साथ मन, वाणी और आचरण में संयम, उपासना में श्रद्धा तथा अपने कर्मों के प्रति सजगता भी आवश्यक है। व्रत की अवधि व्यक्ति को अपनी दिनचर्या को अनुशासित करने, इन्द्रियों पर संयम रखने और ईश्वर-उपासना के लिए समय निकालने का अवसर देती है। इसलिए नवरात्र की साधना में बाहरी पूजा-विधान के साथ-साथ आन्तरिक शुद्धि और आध्यात्मिक अनुशासन को भी महत्व देना चाहिए।
--- 🌺 निष्कर्ष नवरात्र सनातन परम्परा में व्रत, उपासना, संयम और साधना का पर्व है। सामर्थ्य के अनुसार नौ, सात, पाँच, तीन, दो अथवा एक रात्रि का व्रत किया जा सकता है। देवी-पूजन में प्रत्येक दिन की अपनी विशिष्ट सामग्री और पूजा-परम्परा है, जिसका क्रम प्रतिपदा से दशमी तक चलता है। नवरात्र की सार्थकता केवल पूजा सम्पन्न करने में नहीं, बल्कि श्रद्धा और संयम के साथ अपने जीवन को भी साधना की दिशा में ले जाने में है। 🙏 प्राकृत भविष्य दर्शन ज्योतिष एवं अनुष्ठान केन्द्र, कानपुर शास्त्रसम्मत मार्गदर्शन एवं आध्यात्मिक संतुलन जीवन को समझें • दिशा को पहचानें • उचित कर्म करें x
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